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प्रकृति के सभी प्राणी, पशु, पक्षियों में जो एक समान भावना दिखाई देती है वह याने वात्सल्य। अपने बच्चों के विषय में प्रेम, उन्हे पालने पोसने की आत्मीयता मोर से लेकर गरूड़ तक सभी पशु पक्षियों में पाई जाती है। परंतु इसी प्रकृति के कुछ माता-पिता इतने अभागे होते है कि वे अपने बच्चों की चिंता करने को तो छोडिये, उनका जन्म देखने को भी जिंदा नही रहते। यह बात प्रमुखत: किटकों में दिखाई देती है। तितलियां हों या मक्खियां, अनेक किटकों का जीवित कार्य केवल पुनरूत्पादन ही होता है। इसके कारण अंडे देने के बाद ये कीटक मर जाते हैं। फिर उनके बच्चों की देखरेख कौन करता है? उन्हे कौन खिलाता है? इस विषय में प्रकृति कठोर जरूर नजर आती है परंतु उसकी व्यवस्था में प्रत्येक के लिये व्यवस्था होती है।

किटकों में यदि वात्सल्य का उत्कृष्ट उदाहरण यदि देखना हो तो वह है वॉटर वास्प, याने ऐसी मक्खी जो अपना घर बनाती है। इस मक्खी को कुम्हार मक्खी भी कहते हैं। ऐसा क्यों कहते है यह उसके द्वारा बनाये गए घर को देखने से पता चलता है। चाक पर घड़े एवं मिट्टी के बरतन बनाने वाले कुम्हार की तरह यह अपना घर मिट्टी से घड़े के आकार में तैयार करती है। यह घड़ा जो उसका घर होता है वह अपने बच्चों को जन्म देने के लिये तैयार करती है। इस घर में वह अंडे देती है एवं उसका घर मिट्टी से बंद कर देती है। परंतु घर का मुंह बंद करने के पहले वह जन्म होने वाले बच्चों के लिये दाना-पानी की व्यवस्था करना नही भूलती। उसके लिये कुम्हार-मक्खी किसी तितली या पतंगे की बड़ी इल्ली को पकड़ती है एवं अपने शरीर के घातक पदार्थ उसके शरीर में डालकर उसे अधमरा करके उस घर में रखती है। वह इल्ली मरी नही होती फिर भी हिलने- डुलने में असमर्थ होती है। जब मक्खी के बच्चे अंडे फोड़कर बाहर आते हैं तब उन्हे उनके पास ही ताजा भोजन उपलब्ध होता है, उसे खाकर वे बच्चे बड़े होते हैं और जब उनके पर निकल आते हैं तो वे घर फोड़कर बाहर आते हैं। अर्थात ‘मन उसका बच्चों के पास’ का अनुभव इससे भी होता है।

तितली एवं पतंगों में भी नर-मादा अपने बच्चों का ध्यान रखने हेतु जीवित नही रहते हैं। पतंगों की बात करें तो कुछ का जीवन मात्र 1-2 दिनों का होता है। अंडो से बाहर आने के बाद से ही नर तितली मादा तितली को खोजती रहती है। फूलों का रस पीते-पीते जब मादा मिलती है तब इस जोड़ी का मिलन होता है और नर तितली की मौत हो जाती है। बाद में मादा अंडे देकर अपनी जीवन यात्रा समाप्त करती है। परंतु अंडे में से बाहर आने वाली इल्ली को उसका भोजन मिलता रहे इसके लिये वह उसके विशिष्ट अन्न पौधे पर ही अंडे देती है। प्रत्येक तितली का निश्चित अन्न पौधा होता है। जैसे मॉरमॉन प्रकार की तितली नींबू या उस वर्ग के झाड़ पर या कढ़ी पत्ते के झाड़ पर ही अंडे देती है एवं अंडे से निकलकर ये इल्लीयां वही बढ़ती है। वह उन्हे प्रचुर मात्रा में उनका भोजन मिलता है। उसे खाकर वे अपनी खोल में जाती है, और उसमें से नई तितलियां बाहर आती हैं। कुल मिलाकर किटकों में माता-पिता के जीवित न रहते हुए भी वात्सल्य का स्पर्श बना रहता है।

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