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डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी का जीवन चरित्र इतना महान है कि वर्तमान समय में भी उनकी विचार क्रांति की गुंज प्रत्येक क्षेत्र में सुनाई देती है। उनकी विचारधार आज भी वैसे ही प्रासंगीक है जैसे कि उस समय थी। इसलिए लगभग सभी राजनीतिक पार्टिया डॉ. बाबासाहेब के नाम पर अपनी-अपनी राजनीति चमकाने का प्रयास करते दिखाई देते है। आखिर एैसी क्या खास विशेषताएं बाबासाहेब में थी, जिसके चलते पुरा विश्व उन्हे नमन करता है?

 आइए जानते है उनका जीवन परिचय

बाबासाहेब एक विधिवेता, राजनीतिज्ञ, भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता, समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के प्रथम कानुन मंत्री थे। उन्होने विशेष रूप से सामाजिक स्तर पर पिछडे हुए बहुजन समाज, मजदुर वर्ग और महिलाओ के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद की तथा अनेक स्तरो पर अभियान चलाए।

राष्ट्र के प्रति उनका बहुमूल्य योगदान है और उल्लेखनीय भी है। वह एक ऐसे व्यक्ति थे जो समय से आगे चला करते थे। भारत के विभाजन के समय बाबा साहेब ने अपना मत स्पष्ट रूप से रखते हुए कहा था कि यदि धर्म के आधार पर ही भारत राष्ट्र का विभाजन किया जा रहा है तो धर्म आधारित आबादी की पूर्ण रूप से अदला-बदली हो किंतु गांधी-नेहरू के चलते एैसा नही हो पाया और आज जगह जगह इसके दुष्परिणाम दिखाई दे रहे है, जिसका ज्वलंत उदाहरण है जम्मु और कश्मीर।

सामाजिक भेदभाव की बुराइयों को दुर करने तथा शिक्षा को सबसे अधिक महत्व देने के लिए वह सदैव स्मरणीय रहेंगे। ‘सीखो, संघठीत हो और संघर्ष करो’ के उनके प्रेरणामयी नारो से पिछड़े, शोषित, वंचित आदि समाज के लोगों में एक नई चेतना जागृत हुई। तब डॉ. बाबासाहेब पिछड़े लोगो एवं शोषितो, मजदुरो की सबसे बड़ी बुलंद आवाज बन कर उभरे थे। उनकी सोच और उच्च आदर्श हमें समानता-न्याय पर आधारित समाज बनाने हेतु अग्रसर होने का संदेश देते है, यदि हम एैसा आदर्श समाज निर्माण कर पाए तो यही हमारी ओर से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी को सच्ची श्रध्दांजली होगी।

बाबासाहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के एक छोटे से गाँव में हुआ था। डॉ. भीमराव आंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का नाम भीमाबाई था। अपने माता-पिता की चौदहवी संतान के रूप में जन्मे डॉ. भीमराव जन्मजात प्रतिभा संपन्न थे। उनके एक ब्राहमण शिक्षक महादेव आंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह करते थे, के कहने पर उन्होने अपना उपनाम सकपाल से बदल कर आंबेडकर कर दिया था। आंबेडकर उपनाम उनके गाँव के नाम “अंबावडे” पर आधारित था।

1956 में बाबासाहेब ने ऐतिहासिक निर्णय लिया। भेदभाव, छुआछुत, जात-पात और ऊंच-नीच जैसी समस्याओ का निर्मुलन करने तथा पिछड़े समाज का सामाजिक, आर्थिक, व्यवहारिक जीवन स्तर ऊँचा उठाने हेतु 14 अक्टूंबर 1956 को अशोक विजयादशमी के दिन नागपुर में अपने 5 लाख साथियों के साथ बौध्दधर्म में दीक्षित होकर उन्होने बौध्द धर्म स्वीकार कर लिया। आज भले ही बाबासाहेब हमारे बीच नही है पर उनके विचार हमारे लिए आज भी उपयोगी है। जाती विहिन भारत तथा समानता-न्याय आधारित सामाजिक व्यवस्था बनाने का सच्चा और सीधा मार्ग उन्होने हमें दिखलाया है, अब उनकी अभिलाषा पुरी करने की जिम्मेदारी समस्त भारतवासी की है

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