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भारतीय सशस्त्र सेना ने देश की सुरक्षा हेतु सहर्ष अपना सर्वस्व बलिदान दिया है। अपने प्राणो का बलिदान देकर देश की रक्षा सुनिश्चित करने का मनोभाव- मनोबल भारतीय सैनिकों में कूट-कूट कर भरा हुआ है। जिसके बलबुते भारत विश्व की महाशक्ति बनने की ओर तेजी से अग्रसर होता जा रहा है। भारत की बढ़ती सैन्य शक्ति के आधार पर ही आज विश्व में भारत की तूती बोल रहीं है।

जिस तरह भारतीय सैनिक देश के लोगों तथा सरहदों की रक्षा हेंतु अपनी जान की बाजी लगाकर अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, उसी तरह सैनिकों के प्रति भी नागरिकों तथा समाज की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं।

भारतीय सशस्त्र सेना झंडा दिवस विशेष रूप से नागरिकों द्वारा सेना के प्रति सम्मान प्रकट करने का दिन है। हर वर्ष 7 दिसंबर को यह ‘झंडा दिवस’ पूरे जोश-खरोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। 23 अगस्त 1947 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की रक्षा समिति ने युध्द में प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों और उनके परिवार के कल्याण हेतु 07 दिसंबर को झंडा दिवस मनाने का निर्णय लिया था। समिति ने एकमत से यह निर्णय लिया था कि जल, थल और वायु, तीनों सेनाओं के सैनिकों के प्रति सम्मान, निष्ठा एवं समर्पण करने का दिन 7 दिसंबर होगा।

इस दिन नागरिकों से धनराशि संग्रहित की जाती है। यह धन लोगों को झंडे का एक स्टीकर देकर एकत्रित किया जाता है। नीले रंग व गहरे लाल रंग के झंडे के स्टीकर द्वारा राशि निर्धारित होती है। देशभक्ति से ओत-प्रोत राष्ट्रभक्त नागरिक तय राशि को देकर स्टीकर खरीदते है और उसे पिन से अपने सीने पर लगाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं और सेना के प्रति अपनी पूरी निष्ठा का परिचय देते हैं। इस तरह से बलिदान, घायल व अपंग हुए सैनिकों के प्रति नागरिक सम्मान भावना प्रकट करते हैं। जो राशि संग्रहित होती है वह झंडा दिवस कोष में जमा कर दी जाती है। इस राशि का उपयोग युद्धों में बलिदान हुए सैनिकों के परिवार अथवा घायल, अपंग हुए सैनिको के कल्याण व पुनर्वास में खर्च किए जाते हैं। सैनिक कल्याण बोर्ड के माध्यम से उक्त राशि खर्च की जाती है।

देश के प्रत्येक नागरिक का यह परम कर्तव्य है कि अपनी क्षमतानुसार वह झंडा दिवस कोष में आर्थिक योगदान दे, जिससे हमारे देश का ध्वज आकाश की बुलंदियों पर सदैव सम्मान के साथ फहराता रहे। भारत की जात, थल, वायु इन तीनों सेनाओं द्वारा यह दिन विशेष रूप से मनाया जाता है।

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