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‘भारत परिक्रमा यात्रा’ विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा का अनुवर्तन है जिसके माध्यम से गाय, ग्राम और प्रकृति संरक्षण को लेकर जनजागरण करने का काम किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व अखिल भारतीय सेवा प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारक सीताराम केदिलाय ने ७१ वर्ष की आयु में गांव को जगाने और गांव की संस्कृति को बचाने के लिए पैदल भारत भ्रमण किया। इसी का यह प्रेरणास्पद लेखा-जोखा है।
आठ अगस्त २०१२ को ‘भारत परिक्रमा यात्रा’ कन्याकुमारी से प्रारम्भ हुई इस यात्रा के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व अखिल भारतीय सेवा प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारक सीताराम केदिलाय ने ७१ वर्ष की आयु में गांव को जगाने और गांव की संस्कृति को बचाने के लिए पैदल भारत भ्रमण किया। सीताराम केदिलाय का स्पष्ट मानना है कि हमारे ग्रामों का विकास सरकारों के भरोसे नहीं हो सकता, यह कार्य ग्रामवासियों को ही स्वयं करना होगा। देश में सैंकडों ऐसे गांव हैं जो गांववालों की पहल पर आज आदर्श ग्राम बन गए हैं। इसलिए इस यात्रा के माध्यम से श्री केदिलाय ग्रामवासियों की सुसुप्त शक्ति को जगाने का प्रयास कर रहे है। यात्रा के दौरान वे प्रतिदिन १० से १२ किमी पैदल चल कर एक गांव से दूसरे गांव पहुंचते है और भिक्षा मांग कर सिर्फ एक समय भोजन करते है। पूर्ण समय ग्राम चिंतन, गांव के युवकों, बुजुर्गों, मातृशक्ति तथा गांव के कारीगरों से मिल कर उन्हें अपने गांव के विकास हेतु प्रोत्साहित करने में ही उनका पूरा समय बीतता है। यात्रा को लेकर उनके अनुभवों तथा ग्राम विकास के उनके चिंतन पर यात्रा से प्रारंभ से ही जुड़े प्रमोद कुमार ने उनसे बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:
पैदल भारत भ्रमण का कैसा अनुभव रहा?
किसी भी राज्य में अभी तक एक भी विरोधात्मक, नकारात्मक या तिरस्कारात्मक अनुभव नहीं आया। सभी मत, पंथ एवं सम्प्रदायों और भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के लोगों के साथ मिलना और बातचीत हुई। किसी के द्वारा भी प्रतिकूलात्मक टिप्पणी नहीं की गई। सभी ने इस प्रयास का अभिनन्दन किया और अपना सहयोग व्यक्त किया।
जिस उद्देश्य को ध्यान में रख कर यह यात्रा शुरू हुई थी, क्या वह अब पूरा होता नजर आ रहा है?
यदि गहराई से सोचें तो इस यात्रा का कोई उद्देश्य नहीं है। जब व्यक्ति उद्देश्य रख कर कोई काम करता है तो उससे अपेक्षा रहती है और जहां अपेक्षा रहती है वहां निराशा स्वत: आ जाती है जिसके कारण कार्य प्रभावित होता है। इसीलिए हमारे यहां भारतीय चिंतन में कहा गया है कि कर्म कामनारहित होना चाहिए। इसे निष्काम कर्मयोग भी कहते हैं। हमारे यहां एक और बात कही गई है कि मनुष्य जो भी कर्म करता है उसका फल निश्चित है। इसलिए कार्य का परिणाम भी निश्चित है। अच्छा काम करेंगे तो अच्छा परिणाम मिलेगा और बुरा काम करेंगे तो बुरा परिणाम मिलेगा। यह कर्म सिद्धांत का नियम है। इसलिए मैं एक दृष्टि से कहता हूं कि यह यात्रा उद्देश्यरहित है और दूसरी दृष्टि से कहता हूं कि इससे जो भी परिणाम प्राप्त होगा वह निश्चित रूप से अच्छा ही होगा। इसका मुझे पूरा भरोसा है। कुछ परिणाम तुरन्त मिल जाता है; लेकिन कुछ परिणाम दीर्घगामी होता है। यात्रा का परिणाम इसका उपयोग करने वाले लोगों की शक्ति और भक्ति पर भी निर्भर करता है। नदी किसी उद्देश्य से नहीं बहती है। बहना उसकी प्रवृत्ति और स्वभाव है। किन्तु नदी के जल को जो व्यक्ति अपनी बुद्धि और शक्ति के अनुसार जैसा उपयोग करता है उसे वैसा ही परिणाम मिल जाता है। कोई जलपान करता है तो कोई स्नान और कोई विद्युत उत्पादन। यह यात्रा विश्वमंगल गो ग्राम यात्रा का अनुवर्तन है जिसके माध्यम से गाय, ग्राम और प्रकृति संरक्षण को लेकर जनजागरण करने का काम किया गया था। जिन लोगों ने उसका लाभ उठाने का प्रयास किया उन्हें इसका लाभ मिला है।
यात्रा के दौरान आपने ‘इंडिया’ और ‘भारत’ को निकट से देखा। यह अनुभव कैसा रहा?
शुद्ध सात्विक प्रेम हमारे गांवों में आज भी जीवित है। किसी भी गांव से यह सुनने को नहीं मिला कि हमारे गांव में आपको आने की जरूरत नहीं है। इसके विपरीत यह सुनने को मिला कि आइए, आपका स्वागत है, एक ही दिन क्यों और चार दिन रुकिए। सब कहते हैं कि हमारे घर भोजन करिए। यह भारत की विशेषता है। इस शुद्ध सात्विक प्रेम के पीछे किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत अपेक्षा नहीं है। इसी को निष्काम प्रेम कहा जाता है। यही प्रेम प्रत्येक ग्राम में देखने को मिला। दो प्रसंग आपके साथ बांटता हूं-
गुजरात के एक गांव में गए तो पता चला कि गांव का आधा हिस्सा ‘अमेरिका’ है और आधे हिस्से में मजदूरी करने वाले लोग रहते हैं। ‘अमेरिका’ यानि उन परिवारों के ज्यादातर लोग विदेशों में बसे हुए हैं। ९० प्रतिशत मकान खाली हैं, शेष मकानों में एक दो लोग रहते हैं। इन परिवारों के खेतों अथवा घरों में काम करने वाले लोग गांव के दूसरे हिस्से में रहते हैं। यात्रा के दौरान हम एक मजदूर की झोपड़ी में रुके। झोपड़ी के एक हिस्से में परिवार के लोग थे और दूसरे हिस्से में हम। अगले दिन भिक्षा के लिए हम इसी प्रकार की एक झोपडी में गए। परिवार के तीन लोग मजदूरी करते हैं। आधे दिन की मजदूरी ७० रुपये और पूरे दिन की मजदूरी १४० रुपये। उस दिन तीनों लोग मजदूरी करने नहीं गए थे। भोजन के दौरान घर की महिला से मैंने पूछा कि आज हमारे कारण आपका काफी नुकसान हो गया। आप तीनों लोग आज मजदूरी करने नहीं गए। एक तो पैसे का नुकसान और ऊपर से हम तीन लोग आपके घर भोजन करने आ गए। हमें लगता है कि हमने बड़ा अन्याय कर दिया। वह महिला आंखों में आंसू भर कर कहने लगी, ‘‘आप क्या कहत हैं बापूजी? आज नुकसान नहीं, हमने कितना पाया है इसका मूल्य आप नहीं आंक रहे।’’ मैंने पूछा, ’’क्या पाया आपने?’’ कहने लगी, ’’आनन्द। इसकी पैसे से तुलना नहीं की जा सकती। यह जीवन में कभी खर्च न होने वाली वस्तु है।’’ भारत के सर्वसामान्य गांव में रहने वाली एक महिला की सोच ये है।
दूसरा अनुभव हिमाचल प्रदेश का है। उत्तराखंड प्रवेश से दो दिन पहले एक गांव से दूसरे गांव में जाते समय पांच किमी का पहाड़ी जंगल पार करना था। जंगल से लकड़ी काटने वालों द्वारा बनाए गए रास्ते पर ही हम चल रहे थे। पांच किमी चलने के बाद हम उत्तमवाला गांव पहुंचे। हम अगले गांव चलने की सोच ही रहे थे कि एक पांच साल के छोटे बच्चे ने पुकारा, ‘‘ओ बाबाजी, हमारा भी एक छोटा घर है, यहां भी आइए।’’ उसे न तो यात्रा के बारे में कुछ पता था और न ही हमारे बारे में। फिर भी एक अपरिचित बालक इतने प्रेम से पुकारता है। यह उदाहरण है शुद्ध सात्विक प्रेम का। इससे यह भी सिद्ध होता है कि भारत की परिकल्पना किस प्रकार गांव में जिंदा है। यही सोच वास्तविक रूप में दुनिया को जोड़ने वाली है। हम सुनते हैं कि भारत ने प्राचीन काल में पूरी दुनिया को जोड़ा था। वह वास्तव में इसी शुद्ध सात्विक प्रेम के आधार पर जोड़ा था।
आप अभी तक २३ राज्यों का भ्रमण कर चुके हैं। सबसे अच्छा अनुभव किस राज्य का रहा?
तुलना करना सही नहीं है। प्रत्येक राज्य में कार्यकर्ता अपनी शक्ति एवं भक्ति के अनुसार कार्य करते ही हैं। जिन राज्यों में शक्ति ज्यादा है, वहां ज्यादा अच्छा परिणाम दिखाई देता है और जहां शक्ति कम है वहां थोड़ा कम दिखाई देता है। इसलिए मेरा कहना है कि सभी राज्यों में अच्छा रहा। यदि यह कहा जाए कि किन राज्यों ने इस यात्रा का अधिक उपयोग करने का प्रयास किया तो कहा जा सकता है कि केरल, कर्नाटक, गुजरात, पंजाब एवं बिहार ने इसका अधिक उपयोग किया। पंजाब में यात्रा के प्रवेश से करीब आठ महीने पहले ही विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा की टोली ने मिल कर तय किया कि इस यात्रा के माध्यम से राज्य के गांव-गांव में कार्य विस्तार करना है। इसलिए उन्होंने पहले ही स्वागत समिति बना ली। यात्रा की समाप्ति पर उस स्वागत समिति को ही ग्राम विकास समिति घोषित करके ग्राम विकास की गतिविधियां शुरू कर दीं। यात्रा की सफलता के लिए उन्होंने काफी तैयारियां की थीं। साहित्य, प्रचार व संगठन की दृष्टि से उन्होंने काफी योजनाबद्ध तरीके से काम किया। इसलिए जैसे ही यात्रा वहां पहुंची सभी लोगों ने इसका भरपूर उपयोग किया। अब ग्राम संकुल योजना आदि के माध्यम से इसे और भी संगठित और मजबूत करने का प्रयास हो रहा है।
बिहार का अनुभव और भी अच्छा है। यदि हम कहें कि यात्रा ने सबसे अधिक जनस्पंदन बिहार में किया तो गलत नहीं होगा। दो सप्ताह पहले ही प्रचार साहित्य बांट कर व ध्वनिविस्तारक यंत्र से लोगों को जाग्रत किया। इसलिए प्रात: ६ बजे ही हजारों की संख्या में लोग यात्रा की प्रतीक्षा करते हुए दिखाई देते थे। उत्तर बिहार के एक गांव में तो ५००० से अधिक लोग एकत्र हो गए थे। प्रांरभ से लेकर आखिर तक पूरे बिहार में जनसहभागिता बहुत उत्साहवर्धक थी। सायंकाल की ग्राम सभा में भी आसपास के पांच-सात ग्रामों से तीन से चार हजार लोग एकत्र होते थे। यही नहीं प्रात:काल यात्रा चलते समय भी तीन सौ से चार सौ लोग साथ चलते थे और उनमें भी ६० से ७० मातृशक्ति होती थी। किशनगंज जिले में यात्रा की तैयारी कर रहे अपने कार्यकर्ताओं को भय था कि पता नहीं सबकुछ कैसे होगा। लेकिन वहां भी ऐसी ही उत्साहवर्धक सभाएं हुईं।
दक्षिण की बात करें तो जिस प्रकार पंजाब में तैयारी की गई थी उसी प्रकार कर्नाटक में भी अच्छी तैयारी की गई है। वहां मुस्लिम समाज के बंधुओं ने भी मस्जिदों के बाहर खड़े होकर बड़ी संख्या में यात्रा का स्वागत किया। रात्रि विश्राम स्थल पर भी मुस्लिम समाज के बंधु बड़ी संख्या में मिलने आते थे।
प्रारंभ में आप अकेले ही चले थे। अब तो काफी लोग जुड़ गए हैं। यात्रा की सारी व्यवस्थाएं कौन देखता है?
हम अकेले नहीं चले थे। कन्याकुमारी से चलते समय समुद्र तट पर अनेक समाज बंधु एवं भगिनी एकत्र हुए थे। उस समय मैंने कहा था कि यह यात्रा किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं है, बल्कि पूरे भारत की यात्रा है। भारत की परिक्रमा भारत ही कर रहा है। कुछ लोग शारीरिक रूप से तो कुछ लोग मानसिक रूप से यात्रा के साथ चल रहे हैं। शुरू के दिन ही कम से कम ५० लोग हमें अगले गांव तक छोड़ने आए थे। वह परम्परा अभी तक सभी राज्यों में चलती आ रही है। प्रतिदिन एक गांव के लोग दूसरे गांव तक यात्रा को छोड़ने के लिए आते हैं। फिर अगले गांव के लोग लेकर जाते हैंं। चूंकि यह यात्रा विश्व मंगल गौ ग्राम यात्रा का अनुवर्ती प्रयास है, इसलिए उस यात्रा में जिन्होंने सहयोग किया वे आज भी कर रहे हैं।
यात्रा के दौरान आप कहते रहे हैं कि गांव का विकास गांव के लोगों को स्वयं करना है। क्या ये सोच कहीं मजबूत होती दिखी?
बहुत सारे गांवों में इस सोच के अनुसार काम हुआ है। हम महाराष्ट्र में अण्णा हजारे के गांव रालेगण सिद्दी की अक्सर चर्चा सुनते हैं। वहां गांव के लोगों ने ही अपने गांव को खड़ा किया है। राजस्थान के राजसमंद जिले में एक पीपलांतरी गांव है जो गांव के लोगों ने ही खड़ा किया है। वहां के कार्यकर्ता श्यामसुंदर पालीवाल ने गांव के तीन विद्यालयों के छात्रों एवं शिक्षकों को केन्द्रबिन्दु बना कर काम खड़ा किया है। कर्नाटक के बेलगाम जिले में एक विधायक ने केवल गांव के लोगों के सहयोग से ही अपने गांव को आदर्श ग्राम बनाया है। जहां-जहां भी गांव के लोगों ने स्वयं आगे बढ़ कर काम किया है वहां-वहां गांव स्वाभाविक रूप से खड़े हो गए हैं।
ग्राम विकास की दृष्टि से यात्रा के दौरान आप किन बिन्दुओं पर अधिक जोर दे रहे हैं?
हम प्रारम्भ से ही आठ बिन्दुओं पर जोर देते आए हैं। भगवान ने प्रत्येक गांव में छह चीजें दी हैं- जमीन (भूसम्पदा), जल सम्पदा, जीव सम्पदा, वन सम्पदा, गौ सम्पदा एवं जन सम्पदा। जन सम्पदा को गांव में बचाने के लिए व्यक्तियों ने ही तीन सम्पदाओं को गांव में विकसित किया। पहला है हर हाथ को काम। पहले बाहर जाकर नौकरी करने की परम्परा नहीं थी। इसलिए गांव के लिए आवश्यक वस्तु घर-घर में तैयार होती थी। नमक के अलावा कोई भी वस्तु बाहर से खरीद कर लाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। ग्राम उद्योग ग्रामों में बड़ी मात्रा में उपलब्ध थे। इसलिए ग्राम स्वावलम्बी, स्वतंत्र एवं स्वाभिमानी थे।
दूसरा बिन्दु है स्वास्थ्य। पहले अस्पताल में जाने की परम्परा नहीं थी। इसके लिए गृह वैद्य और ग्राम वैद्य की परम्परा थी। गृह वैद्य यानि प्रत्येक गृहणी अपनी रसोई व घर के आंगन में उपलब्ध चीजों यानि छिलके, फूल व जड़ से सभी को स्वस्थ रखती थी। किस मौसम में कौन सा आहार ग्रहण करना है यह उन्हें पता होता था। वह स्वस्थ आहार से सभी को स्वस्थ रखती थी। ग्राम वैद्य परम्परा के अनुसार ग्राम के कुछ लोग स्त्री हों या पुरुष जंगल की जड़ी-बूटियों से लोगों के स्वास्थ्य की चिंता करते थे। वे पूरे गांव को स्वस्थ रखना अपना धर्म समझते थे।
तीसरा बिन्दु है प्रत्येक व्यक्ति मानव की तरह जिए न कि पशु अथवा दानव की भांति। इसलिए मनुष्य को मानवता से दैवत्व की ओर उठाने लायक संस्कार देने का काम। इसे लोक संस्कृति भी कहा जाता है। इसमें लोक नाटक, लोक नृत्य, लोक गीत, संगीत, कीर्तन, कथावाचन, क्रीड़ा, लोक न्याय व्यवस्था आदि के साथ गुरूकुल शिक्षा पद्धति शामिल है। इन सबके माध्यम से बिना धन और गांव से बाहर जाए बगैर लोगों को मानवता से ऊपर उठाने लायक शिक्षा व संस्कार मिलते थे। इस प्रकार उद्योग, वैद्य एवं विद्या के माध्यम से ग्रामवासियों की मानव सम्पदा को तैयार किया जाता था। यदि इस सम्पदा को आज भी बचाने का काम होगा तो गांव वास्तविक रूप में विकसित, सुंदर एवं प्रेरक गांव बनेंगे।
यात्रा के बाद इन सभी विषयों में वहां प्रयास प्रारम्भ हों क्या इसकी व्यवस्था अनुवर्ती प्रयास के रूप में कुछ हुई है?
नदी का काम केवल बहना है। बहते हुए पानी का कैसे उपयोग करना है यह गांव के लोगों की बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है। इसलिए इस शक्ति का कैसे उपयोग हो इसकी चिंता उन्हें ही करनी चाहिए। जिन राज्यों का मैंने जिक्र किया उन्होंने इस यात्रा से अधिकतम लाभ उठाने के लिए पहले से ही स्वागत समिति बना कर रखी थी। इसलिए यात्रा सम्पन्न होने के तुरन्त बाद उन्होंने वहीं घोषणा कर दी कि यात्रा में जो बिंदु बताए गए हैं उन्हें आगे बढ़ाने के लिए यही समिति ग्राम समिति के रूप में काम करती रहेगी। इस प्रकार वहां इस कार्य को आगे बढ़ाने का काम प्रारम्भ हो गया है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ग्राम संकुल योजना बनाई जा रही है। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके डॉ. महेश शर्माजी इस काम को देख रहे हैं। जिन राज्यों ने विचार किया है वहां काम हो रहा है।
आज़ादी के बाद देश ने तो विकास किया है लेकिन ग्राम पिछड़ते गए हैं। क्या कारण लगता है?
इसका कारण है कि देश का नेतृत्व करने वाले लोगों के दिमाग में ‘भारत’ नहीं बल्कि ‘इंडिया’ रहा है। इंडिया यानि विदेशों की नकल। इसलिए शहर का जीवन इंडिया का जीवन यानि नकली है और ग्राम का जीवन भारत का जीवन यानि असली जीवन है। इसलिए नकली जीवन जीने वालों को असली जीवन क्या है यह भी पता नहीं है। यह बहुत दुख की बात है। जब तक उस असली जीवन को नहीं देखेंगे तब तक उन्हें उसका पता नहीं चलेगा। वर्तमान शिक्षा भी इस नकली जीवन को ही बढ़ावा दे रही है। इसलिए देश का नेतृत्व करने वालों को चाहिए कि हमारी विकास की परिकल्पना ग्राम आधारित, कृषि आधारित और कृषि के पूरक उद्योग आधारित हो। इसे ही महात्मा गांधी ने ग्राम आधारित कुटीर उद्योग कहा था। इसलिए विकास की संकल्पना पर ही हमें फिर से सोचने की जरूरत है। आज तो विकास के बदले ग्राम का विनाश ही हो रहा है। देश का नेतृत्व एवं नीति निर्माता ही आज ग्राम जीवन को नष्ट कर रहे हैंं। ग्राम की पूरी सम्पदा को समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है। विदेशी खाद एवं बीज कंपनियां ग्राम की जमीन को नष्ट करने पर आमादा है। अनियंत्रित खनन भी नुकसान पहुंचा रहा है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक कह रहे हैं कि रासायनिक खेती को छोड़ कर भारतीय गो आधारित कृषि को बढ़ावा देने की जरूरत है। लेकिन हम फिर भी रासायनिक खेती को ही बढ़ावा दे रहे हैं। मानने के बावजूद वे आगे बढ़ने के लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा जल, जंगल और जैव विविधता पर क्या अत्याचार हो रहे हैं यह भी किसी से छुपा नहीं है। गोहत्या निषेघ कानून तो है लेकिन उसे लागू कराने का प्रयास नहंी हो रहा है। यह बहुत दुख की बात है। विदेशी नौकरी परम्परा के कारण गांव की जवानी और उद्योग नष्ट हो गए हैं। बहुत सारे ग्रामों में मैंने लुहार, कुम्हार आदि से पूछा कि आपने यह काम अपने बच्चों को क्यों नहीं सिखाया, तो कुम्हार ने प्रतिप्रश्न पूछा कि हम बर्तन बनाते रहें ओर लोग हमारे बर्तन खरीदने की बजाए सिर्फ फ्रिज ही खरीदेंगे तो हमारा पेट कैसे भरेगा? कितने दुख से वे प्रश्न पूछते हैं। हम विकास के नाम पर ग्रामों को मारने का काम करते जा रहे हैंं। बाहर की दुनिया फ्रिज को फेंक रही है और हम घर-घर पर उसे रखवा रहे हैंं। इसी प्रकार विदेशी स्वास्थ्य पद्धति से हमारे ग्रामीण स्वास्थ्य पद्धति समाप्त हो गई। ग्राम वैद्य अब अनेक ग्रामों में मिलते ही नहीं हैं। एक गृहणी को भी घर की गृह वैद्य परम्परा का ज्ञान नहीं है। एक षड्यंत्र के तहत भारत के ग्रामों को विकास के नाम से मारने का काम हो रहा है। विकास एक आकर्षणीय शब्द है इसलिए इस आकर्षणीय शब्द के माध्यम से ही हमेें मारने का षड्यंत्र चल रहा है। आधुनिकीकरण से लोकसंस्कृति समाप्त हो गई है।
इसमें गांव के लोगों की मानसिकता भी कहीं दोषी है क्या?
गांव के लोगों की मानसिता दोषी तो है लेकिन इसे दोषी बनाया किसने इस पर सोचना चाहिए। दुनिया का सुख व असयंमित उपभोग के पीछे शहरी लोग भागे। उसी को टेलीविजन ने गांव-गांव में पहुंचा दिया। उससे गांव के लोग भी मानवीय स्वभाव के कारण आकर्षित होने लगे।
आपकी यात्रा का अनुभव क्या कहता है?
विकास के नाम पर हो रहे आक्रमण एवं कष्टमय जीवन जीने के बावजूद गांव के लोगों ने अपनी ग्राम संस्कृति को बचा कर रखा हुआ है। यह हम सब को समझना चाहिए। राजस्थान के पीपलांतरी गांव में सातवीं कक्षा पास व्यक्ति श्याम सुंदर पालीवाल ने विकास का अद्भुत कार्य किया है। आसपास के ग्रामों में विनाश ही विनाश दिखाई देता है लेकिन इस एक व्यक्ति की लगन व मेहनत के कारण वहां हर कदम पर विकास दिखाई देता है। जो लोग कई-कई महीने तक स्नान नहीं कर पाते थे वे रोज स्नान करने लगे हैंं। लेकिन जल की एक बूंद भी खराब नहीं की जाती। जल का सदुपयोग करना उन्होंने लोगों को सिखा दिया है। गांव का प्रत्येक व्यक्ति अपने गांव के पुनरूत्थान में लगा है। सरकारी विद्यालय के अध्यापक निजी विद्यालयों से भी अधिक समर्पण भाव से काम करते हैंं। एक और मजेदार बात यह है कि पालीवाल के साथ सभी सरकारी विभागों के लोग मिल कर काम करते हैंं। सरकार के धन और गांव के सहयोग से उन्होंने अपने गांव को एक आदर्श ग्राम बना दिया है। जल संरक्षण का वहां बहुत अच्छा काम हुआ है।
यह काम उन्होंने किया कैसे?
वह पहाड़ी गांव है। बारिश के पानी को उन्होंने स्थान-स्थान पर तालाब बना कर रोका। दो पहाड़ियों के बीच में छोटे-छोटे बांध बना कर उसे रोकने का काम किया। पहाड़ी के नीचे भी बड़ा तालाब बना कर पानी को रोका गया। इसका परिणाम यह हुआ कि गांव के तालाब व कुओं में जलस्तर बढ़ गया। एक प्रयोग यह हुआ कि मिडिल स्कूल के बच्चे झूलों पर खेलते रहते हैं और तालाब से पानी टेंक में ऊपर भर जाता है। यह सब कार्य सरकारी व ग्रामवासियों के सहयोग से हुआ है।
देश के नीति निर्माताओं एवं नेताओं के दिमाग में भी यह बात आए इसके लिए आपने क्या सोचा है?
प्रत्येक राज्य में यात्रा पूरा करने के पश्चात् मैं उस राज्य के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल को एक पत्र लिखता हूं। राज्य में जो कुछ देखा व महसूस किया उसका पत्र में विस्तार से जिक्र होता है। इसमें अच्छाई एवं कमियों सभी का जिक्र किया जाता है।
अभी तक आपने जिन मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है उनमें से कितनों का जवाब आया है?
अभी तक केवल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का जवाब आया जिसमें उन्होंने मात्र इतना लिखा कि आपका पत्र मिला और उचित कार्यवाही के लिए संबंधित विभाग को भेज दिया है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को दो पत्र लिखे थे। उनकी ओर से भी स्वीकृती आई है।
ग्राम विकास का मतलब शहरी सुविधाएं वहां पहुंचाना है अथवा कुछ और?
पहला काम गांव की सभी प्राचीन जीवन पद्धतियों को बचाना होना चाहिए। कुछ आधुनिक सुविधाएं उसमें जोड़ेंगे तो नुकसान नहीं है। उद्योग की यदि बातें करें तो प्राचीन के साथ-साथ आधुनिक उद्योग भी चाहिए। जैसे पहले बिजली की जरूरत नहीं थी लेकिन आज जरूरी है। लेकिन बिजली के काम के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इसी प्रकार यातायात की सुविधा चाहिए। लेकिन वाहन की मरम्मत के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। कहने का मतलब है कि आज की शहरी सुविधाओं के पीछे भागना मुश्किल होगा। इसलिए प्राचीनता एवं आधुनिकता को मिला कर चलना होगा। अमेरिका में पिछले दिनों आर्थिक मंदी आई थी। वहां के कुछ आर्थिक विद्वानों का कहना है कि इसका समाधान भारत में प्रचलित प्राचीन ‘‘बार्टर’ व्यवस्था यानि बिना पैसे के वस्तुओं का लेन-देन है। इसलिए भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नोट सिस्टम को समाप्त करके सिक्के की व्यवस्था लानी चाहिए। गुजरात के सांकवां गांव में (अहमदाबाद से करीब ८० किमी) धीरेन्द्र सोनी नाम का एक गांधीवादी व्यक्ति है। आज भी उसके गांव में बार्टर सिस्टम है। वह शहर में रहता था और अरबपति था। पति-पत्नी दोनों इंजीनियर थे। अमेरिका में भी रहे। लेकिन बाद में अहमदाबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने लगे। लेकिन नौकरी छोड़ने के बाद करीब ३० साल से इस गांव में वह काम कर रहे हैं। नमक को छोड़ कर शहर की एक भी वस्तु वे खरीदते नहीं है। बिजली के लिए सोलर सिस्टम है। उनके दो बेटे हैं लेकिन वे एक दिन भी स्कूल में नहीं गए। किन्तु हर विषय में अच्छी जानकारी रखते हैं। अनुभव विद्या से सब कुछ सीखा है। जब मैं वहां गया उस समय ३७५ प्रकार का खाद्यान्न वहां पैदा होता था।
आज जब ‘ग्लोबल विलेज’ की बात हो रही है तो यह कैसे व्यावहारिक हो सकता है?
जिस ‘ग्लोबल विलेज’ की बात आज हो रही है क्या हमारे यहां यह पहले से नहीं है? प्राचीन पद्धति से जीते हुए भी हमने ग्लोबल विलेज का चिंतन किया था। वसुधैव कुटुम्बकम आखिर है क्या? यह सारा चिंतन गांव के श्रीमुख से ही तो निकला है। अमेरिका ओर दूसरे पश्चिमी देश जब जंगली जीवन जी रहे थे तब से हम ग्लोबल विलेज की कल्पना को साकार कर रहे हैं। ग्लोबल विलेज दिखावे से नहीं, बल्कि अंदर के प्रेम से दिखता है। ग्लोबल विलेज की वर्तमान सोच गांवों को तोड़ रही है, लेकिन हम दुनिया को जोड़ने का काम कर रहे हैं। श्री श्री रविशंकर, बाबा रामदेव, गायत्री परिवार, इस्कॉन, चिन्मय मिशन, रामकृष्ण मिशन, सत्य साई बाबा, माता अमृतानन्दमयी देवी, मुरारी बापू, स्वामिनारायण आदि सभी यही काम कर रहे हैं।
७१ साल की आयु में पैदल चलने में कठिनाई तो महसूस हुई होगी?
बिल्कुल नहीं। इसका कारण यह है कि यात्रा के दौरान चलने वाला वास्तव में अंदर वाला है, और अंदरवाले की न कभी आयु होती है और न ही वह कभी बीमार होता है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक सत्यनारायण बाबा पिछले तीस साल से खुले खेत में बैठे हुए हैंं। वे कभी न बीमार हुए और न ही कभी कोई अन्य तकलीफ हुई। इसी प्रकार आज तेलंगाना के महबूबनगर में अप्पलपाडू नामक जिस गांव में हम हैं वहां भी एक बूढ़ी अम्मा, जो महाराष्ट्र से आई हैं, वह भी बीस साल से एक पेड़ के नीचे बैठी हुई है। आज उनकी आयु ९० साल है। आज तक वह कभी बीमार नहीं हुई है।
भारत सरकार ने ग्राम विकास को लेकर कुछ प्रयोग शुरू किए हैं। क्या उनसे कोई उम्मीद जगी है?
यात्रा के दौरान ही मैंने कुछ पत्र प्रधान मंत्री जी को लिखे थे। उनमें जो बिन्दु हमने उठाए थे उनमें से अनेक बिन्दुओं को ध्यान में रख कर काम शुरू हुआ है। अब किसान और ग्राम सरकारी योजनाओं का फोकस प्वाइंट बन गए हैं। उन्होंने सांसद आदर्श ग्राम योजना शुरू की है। ये सभी अच्छे प्रयास हैं।

 

 

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