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 पक्षी घोंसलों में रहते हैं यह हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। परंतु वास्तव में पक्षी हमेशा घोंसलों में नही रहते। केवल जब उनका प्रजनन काल होता है उसी समय वे घोंसलों में रहते हैं। उसी समय वे घोंसले बनाते हैं। अर्थात पक्षीयों की घोंसले बनाने की प्रेरणा उनके प्रजनन की प्रेरणा से जुड़ी है। बुलबुल चिड़िया, तोता, भारद्वाज ऐसे पक्षियों से लेकर चील, गरूड़ इ. पक्षी भी हमेशा अंडो और उनमें से निकलने वाले छोटे बच्चों का संरक्षण हो इसलिये घोंसले बनाते हैं। परंतु पक्षियों में कुछ पक्षी ऐसे भी हैं जिन्हे प्रकृति ने घोंसले बनाने की कला दी ही नही है। वे हमेशा अपने अंडो और उनमें से बाहर निकलने वाले बच्चों के लिये गोद लेने वाले मां बाप ढूंढ़ते हैं।

ऐसे मां बाप ढूंढने वाले पक्षियों में सबसे अग्रक्रम पर है कोकिला। वही कोकिला जो अपनी मधुर आवाज में वसंत ऋतु आने की गवाही देती है। परंतु यही कोकिला कभी अपना स्वत: का घर नही बनाती है। नर कोकिला एवं मादा कोकिला की जब जोड़ी जम जाती है तब वे आसपास किसी कौवे का घोंसला है क्या एवं उसमें उनके अंडे हैं क्या यह ढूंढने लगते हैं। फिर उस घोंसले में अंडो की रक्षा करने वाले नर-मादा कौवे को अनेक युक्तियों के माध्यम से नर कोकिला घोंसला छोड़ने को मजबूर करती हैं। इस संधि का फायदा उठाकर मादा कोकिला वहां घुसकर अपने अंडे देती है। यह करते समय वह कौवे के अंडो में एक अंडे को घोंसले से धक्का देकर नीचे गिरा देती है। इसके बाद नर-मादा कौवा कोकिला के अंडे को अपना समझकर सेते हैं। उसमें से बाहर आनेवाला बच्चा कौवे के बच्चे से आकार में बड़ा होता है। इसलिये वह कौवे के बच्चों पर धौंस जमाकर अपने गोद लिये मां बाप से अपने लिये ज्यादा चारा प्राप्त करता है। इसके कारण वह जल्दी-जल्दी बड़ा होता है एवं घोंसला छोड़कर चला जाता है। कोकिला के वर्ग में आने वाले पक्षी कॉमन हॉक कक्कू इंडियन कक्कू, प्लेंटिव्ह कक्कु जैसे और भी पक्षी इसी प्रकार करते हैं। इसमें का कॉमन हॉक कक्कू दुसरे पक्षियों के घोंसले में अपने अंडे घुसाता है। इसके कारण जब इस कक्कू के बच्चे बड़े होते हैं तब वे आकार में अपने गोद लिये मां बाप से भी बड़े होते हैं। इसके कारण एक छोटा पक्षी दूसरे बड़े पक्षी को चारा खिला रहा है यह दृष्य भी देखने को मिलता है। साधारणत: पक्षियों में अपने बच्चों, घोंसलों को शिकारी पक्षी, साप, इ. भक्षकों से बचाने हेतु लड़ने की क्षमता होती है। परंतु इस कोकिला वर्ग के पक्षी अपने बच्चों की जिम्मेदारी दुसरे पक्षियों को सौंपकर निश्चित रहते हैं। प्रकृति अजीब है यही सच्चाई है।

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