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       याद है आपको हम खेलों पर आधारित फिल्मों को गंभीरता से कब से लेने लगे? ठीक से विचार करें तो २००१ में आई ‘लगान’ के बाद से। इस बार खेल आधारित फिल्मों के विषय में बात करने का विशेष अवसर है।

      इस वर्ष क्रिकेट पर आधारित ‘अजहर’, ‘एम.एस.धोनी की जीवनी पर ‘द अनटोल्ड स्टोरी’, कुश्ती पर आधारित ‘सुलतान’ तथा ‘दंगल’ आदि खेलों पर आधारित फिल्में हमारे सामने आईं।

      खेलों पर आधारित फिल्मों में भी दो प्रकार हैं। एक केवल फिल्मी (अर्थात काल्पनिक) तथा दूसरा ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसी फिल्में जो वास्तविकता दिखाती हैं। पुरानी खेल फिल्में काल्पनिक क्यों लगती थीं? क्योंकि उन मनोरंजनात्मक फिल्मों के एक भाग के रूप में खेलों को दिखाया जाता था।

      क्या आप यकीन करेंगे कि ‘लव मैरिज’ नामक फिल्म में देव आनंद एक क्रिकेटर थे? वे क्रिकेटर की पोशाक में ही माला सिन्हा के लिए गाना गाते हैं…‘एक नजर में दिल बेचारा हो गया एलबीडब्ल्यू….।’ उस समय दर्शक भी ये सब टाइम पास के रूप में देखते थे।

      रामन्ना द्वारा निर्देशित ‘हमजोली’ में जितेन्द्र और लीना चंदावरकर को टेनिस कोर्ट पर गाना गाते हुए और रैकेट उछालते हुए हम सभी ने देखा है।

      मनमोहन देसाई द्वारा निर्देशित ‘नसीब’ में ॠषि कपूर और किम पर ‘कबड्डी कबड्डी’ गीत फिल्माया गया था। परंतु गाना देख कर ऐसा लगता है जैसे उसका उद्देश्य केवलकिम को शॉर्ट पहने दिखाना था। फिल्म ‘हमराज’ में राजकुमार को गोल्फ खेलते दिखाना केवल उनकी अमीरी दिखाने के लिए ही था। ‘हनीमून’ फिल्म में ॠषि कपूर और वर्षा उसगांवकर पर फिल्माए गए गाने के पहले तो वर्षा ने कभी टेनिस खेला ही नहीं था।

      कई अन्य मसालेदार मनोरंजक फिल्मों में भी खेलों के कुछ दृश्य देखने को मिले और कुछ क्रिकेटरों ने भी फिल्मों का रुख किया। सलीम दुरानी साठ-सत्तर के दशक में क्रिकेट के मैदान पर छक्के जड़ने वाले बल्लेबाज के रूप में प्रसिद्ध थे। उन्होंने बी.आर.इशारा की ‘चरित्र’ फिल्म में काम किया था।

      सुनील गावस्कर ने ‘सावली प्रेमाची’ नामक मराठी फिल्म में मधुमती के प्रेमी की भूमिका निभाते हुए पेड़ों के इर्दगिर्द चक्कर लगाए। हालांकि उनके क्रिकेट प्रेमियों को यह कुछ खास पसंद नहीं आया। कंवल शर्मा द्वारा निर्देशित ‘मालामाल’ में एक अत्यंत धनी व्यक्ति(नसीरुद्दीन शाह) पैसे खर्च करने के अनेक तरीकों में से एक के लिए सुनील गावस्कर के साथ क्रिकेट खेलने का स्वप्न देखता है। संदीप पाटील (कभी अजनबी थे), पाकिस्तानी क्रिकेटर मोहसीन खान (गुनाहगार), अजय जडेजा (खेल) आदि क्रिकेटरों ने भी फिल्मों में अपने हाथ आजमाए परंतु यहां वे चौके-छक्के नहीं लगा सके। हालांकि नवजोत सिंह सिद्धू को कॉमेडी का तड़का जम गया और वे कपिल शर्मा के शो में धमाल कर रहे हैं।

      आमिर खान द्वारा निर्मित और आशुतोष गोवारीकर द्वारा निर्देशित ‘लगान’ इन सभी से काफी अलग थी। ‘जिसके मन में सच और साहस होता है जीत उसी की होती है’ इस सूत्र के आस-पास फिल्म में क्रिकेट की कहानी गढ़ी गई थी। आशुतोष को ‘पहला नशा’ और ‘बाजी’ की असफलता के बाद कुछ बड़ा करना था। पिरिऑडिकल फिल्म के रूप में उसे एक नया मार्ग मिला। जब वे इतिहास में झांक रहे थे तो उन्हें क्रिकेटर रणजीत सिंह के क्रिकेटर बनने की कथा पढ़ने को मिली और यहीं उन्हें ‘लगान’ क्लिक हो गई।

      गुजरात के एक गांव में अंग्रेजों और भुवन व उसके साथियों के बीच क्रिकेट मैच की बाजी लगती है। इसके अनुसार अगर भुवन और उसके साथी मैच जीत जाते हैं तो उनका लगान माफ हो जाएगा। भुवन तथा उसके दस साथी कभी क्रिकेट नहीं खेले परंतु वे खेल सीखते हैं और अंग्रेजों के इस खेल में उनको हरा देते हैं। बारिश न होने के कारण फसल अच्छी नहीं होती और गांव वालों को लगान भरने में समस्या होती है और फलस्वरूप गांव वालों और अंग्रेजों में क्रिकेट मैच की बाजी लगती है।

      ‘लगान’ को मिली सफलता और उसके ऑस्कर की रेस तक पहुंचने के कारण खेलों पर आधारित फिल्मों के प्रति विश्लेषकों और दर्शकों का नजरिया बदल गया। वे इस प्रकार की फिल्मों की सफलता पर विश्वास करने लगे।

      शाहरुख खान की अलग भूमिका वाली फिल्म ‘चक दे इंडिया’ महिला हॉकी खिलाडियों केे जीवन तथा उनके प्रशिक्षक के संघर्ष को दिखाने वाली थी। इसे लोगों ने बहुत पसंद किया। इसमें फिल्म के ‘रियलस्टिक प्रेजेंटेशन’ की अहम भूमिका थी।

      पिछले कुछ समय में खेलों पर आधारित फिल्मों में बहुत बदलाव आया है। लोगों को इन पर विश्वास भी है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित ‘भाग मिल्खा भाग’ (जो धावक मिल्खा सिंह के जीवन पर आधारित थी और इस भूमिका के लिए अभिनेता फरहान अख्तर ने बहुत मेहनत भी की थी), ओमांग कुमार द्वारा निर्देशित ‘मेरी कॉम’ (इस बॉक्सर की भूमिका निभाने के लिए प्रियंका चोपड़ा स्वयं पूर्वोत्तर जाकर मेरी कॉम से मिली थी। वहां जाकर उन्हें पता चला कि उस क्षेत्र में हिंदी फिल्में प्रदर्शित ही नहीं होती। ओह! किसी कलाकार को इस तरह से भी समाज रचना समझ में आती है।), एकता कपूर निर्मित तथा मिलन लूथरिया निर्देशित ‘अजहर’ (मैच फिक्सिंग के कारण विवादों में रहीं परंतु मूलत: उत्तम क्रिकेटर रहे मोहम्मद अजहरुद्दीन के जीवन पर आधारित फिल्म को दर्शकों ने नकार दिया। अजहर की भूमिका इमरान हाशमी ने निभाई थी। अजहर से अब लोग भी उतना प्रेम नहीं करते इसका फिल्म पर असर हुआ।), नीरज पांडे द्वारा निर्देशित ‘एम.एस. धोनी-द अनटोल्ड स्टोरी’ को लोगों ने बहुत पसंद किया। नीरज पांडे की ‘वेन्सडे’, ‘स्पेशल छब्बीस’ आदि अलग शैली की फिल्मों के कारण उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है। उन्होंने ‘धोनी’ फिल्म में भी अपनी विशेष कल्पनाशीलता का परिचय दिया है। धोनी ने जिस तरह झारखंड के छोटे से शहर रांची से आकर विपरीत परिस्थितियों से झगड़ कर सफलता प्राप्त की वही बहुत रोमांचकारी  है। छोटे शहर से आकर राष्ट्रीय टीम में स्थान पाना और अपने कर्तृत्व के आधार पर टीम का नेतृत्व करना; धोनी की यह यात्रा बेहद रोमांचकारी है। फिल्म में भी इसी नाटकीयता व रोमांच को कायम रखा गया है। अत: लोगों को यह फिल्म पसंद आई। सुशांत सिंह राजपूत ने ‘धोनी’ का किरदार निभाने में जो मेहनत की है वह भी प्रशंसा करने योग्य है। धोनी के शारीरिक हावभाव तथा उनके जैसा क्रिकेट खेलने की शैली को सुशांत ने उत्तम तरीके से निभाया है। मैदान पर खेलने की धोनी की स्टाइल को फिल्म में कंप्यूटर ग्राफिक्स की मदद से सुशांत से मैच किया गया है; यह भी दर्शकों ने संभाल लिया।

      वर्ष २०१६ वर्ष ‘अजहर’ फिल्म को छोड़ कर अन्य खेल फिल्मों के लिए उत्तम कहा जा सकता है। सलमान खान के सिक्स पैक और दमदार शरीर रचना को दिखाने वाली ‘सुलतान’ भी हिट रही। इसमें उन्हें कुश्ती खेलने वाला पहलवान दिखाया गया है। कुश्ती खेलने वाली नायिका अनुष्का शर्मा से ही उनका प्रेम और विवाह होता है। दो कुश्ती खिलाड़ियों का खेल और उनके वैवाहिक संबंधों का तालमेल दिखाने वाली यह फिल्म थी। फिल्म की ठेठ हरियाणवी बोली भी लोगों ने पसंद की।

      अब नितेश तिवारी की ‘दंगल’ में भी कुश्ती खेलने वालों की पारिवारिक कथा देखने को मिलेगी। महावीर सिंह फोगट नाम के कुश्ती खिलाड़ी पर आधारित इस फिल्म में आमिर खान ने यह किरदार निभाया है। आमिर ने इस फिल्म के लिए अपना वजन भी बढ़ाया है। महावीर सिंह और उनकी चार बेटियों के संबंधों पर यह फिल्म आधारित है। वह किस तरह अपनी बेटियों को स्वाभिमान का ज्ञान कराता है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है, यह फिल्म में दिखाया गया है। इस फिल्म की कैच लाइन ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम है के’ दी गई है।

      इन फिल्मों के अलावा सायकल रेस (जो जीता वही सिकंदर), शतरंज (शतरंज के खिलाड़ी), क्रिकेट (पटियाला हाउस), बाक्सिंग (खडूस साला) आदि खेलों पर आधारित फिल्में भी आईं। इन फिल्मों ने निश्चित रूप से खेलों के प्रति समाज में जगरुकता फैलाई है। फिल्म जैसे प्रभावी माध्यम से यही अपेक्षा है।

 मो.: ९८७०६१६२१६

 

 

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