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 मैं समझता हूं, सिंधी एवं भोजपुरी कहावतों में नारी-चित्रण विषय पर चिंतन मनन करते समय हमें समाज में परिवार की बुनावट पर ध्यान केंद्रित करना होगा। हम सभी इस तथ्य से भलीभांति परिचित हैं कि परिवार भारतीय समाज की आधारभूत संस्था है। इसका प्राचीन काल से ही अस्तित्व रहा है। स्त्री व पुरुष इस संस्था के प्रमुख अंग हैं। परिवार ही स्त्री पुरुष के मध्य यौन संबंध को सुनिश्चित और नियमित करता है। यह संतति के पोषण तथा शिक्षण के लिए अपेक्षित वातावरण भी प्रस्तुत करता है। समासत: परिवार समाज के आर्थिक, धार्मिक तथा नैतिक जीवन को संतुलित एवं संवर्धित करता है। एक समय था जब समाज में ‘संयुक्त परिवार’ का ही चलन था अर्थात माता-पिता, भाई- बहन, पौत्र-पौत्रिया, चाचा-चाचियां, चचेरे भाई-चचेरी बहनें इत्यादि एक परिवार के सदस्यों की भांति रहते थे परंतु समय के साथ -साथ विभिन्न कारणों से ऐसी प्रथा समाप्त होती जा रही है। वर्तमान परिस्थितियों में, विशेषकर शहरी संस्कृति के प्रभाव के कारण एक ही परिवार के सदस्य रोजगार की तलाश में विभिन्न शहरों में जाकर नौकरी-व्यापार करने लगे हैं, जिस कारण संयुक्त परिवार का ढांचा प्राय: टूटने लगा है। ऐसा होते हुए भी घर-परिवार के महत्व में कमी नहीं आई है; बल्कि संबंधों में प्रगाढ़ता स्थायी रूप से विद्यमान है। सिंधी भाषा में इस भाव को प्रकट करने वाली कहावतें देखें-कुडम कबीले खां शालं कुतो बि धार न थिए (अर्थात अपने कुटुंब या परिवार से काश कोई कुत्ता भी अलग न हो क्योंकि हे प्रभु, परिवार से अलग रहने पर अत्यधिक कष्ट होता है), सजणु हुजनि साणु त झंग अंदर बि सोनी खाण (अर्थात यदि परिवार के सभी सदस्य एक साथ जंगल में भी रहते हैं तो वहां भी आनंद प्राप्त करते हैं), पंहिंजा नेठि बि पंहिंजा (अर्थात संबंध में कटुता आने के बाद भी अपने सगे अपने ही होते हैं), पंहिंजे घर जहिडी का बी बादशाही (अर्थात अपने घर जैसी बादशाहत कहीं और नहीं होती)। ऐसे अपनत्व के भावों को अग्रसारित करते हुए सिंधी समाज ने कहावत में विचार प्रकट किए- पंहिजों घरु दाता जो दरु (अर्थात अपना घर प्रभु का दर यानि मंदिर होता है।)

      राजस्थानी कहावतों में संयुक्त परिवार को लक्ष्य में रख कर निम्न भाव प्रकट होते हैं:-बंधी माटी लाख की, खुल्ली बीखर ज्याय। अभिप्राय यह है कि संयुक्त परिवार में रहने से प्रतिष्ठा बनी रहती है, भाइयों के अलग-अलग हो जाने से इज्जत जाती रहती है किंतु शहरों में प्राय: देखा जाता है कि संयुक्त कुटुंब में रह कर निर्वाह करना कठिन हो जाता है। इसीलिए राजस्थानी कहावत में उल्लिखित हैं- कलकत्ते रो धारो, बाप सूं बेटो न्यारो (अर्थात कलकत्ते की यही प्रथा है कि पिता से पुत्र अलग हो जाता है)।

      भारतीय समाज ने संयुक्त परिवार की संस्कृति में पुरुष के रुप में ‘पिता’ को तथा स्त्री के रूप में ‘माता’ को सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया है। भोजपुरी में कहा गया है-बापे पूत परापत घोडा ना कुछुम तऽ थोडम थोडा (अर्थात पुत्र और घोड़े पर पिता के गुण-दोष का प्रभाव पड़ता है)। सिंधी में- संत उहो जो घाउ सहे पीउ उहो जो बारु सहे। (अर्थात संत वही होता है जो समाज के हित में कष्ट सहन करता है तथा पिता वही होता है जो परिवार के हित में कष्टों को सहन करता है) माता नारी जीवन का सार्थक व महान रूप है इसीलिए तैत्तरीय उपनिषद में ‘मातृदेवो भव’ अर्थात माता को देवता कहा गया है। भोजपुरी में कहावत देखिए- मग्धा बरसे-माता परसे-भूखा न तरसे- अर्थात मघा नक्षत्र की वर्षा और माता के स्पर्श से सभी क्षुधा और ताप समाप्त हो जाते हैं। सिंधी कहावत में माता की ममता को निम्न प्रकार रेखांकित किया गया है- बे मुन्दो बहार मिले माता जी गोद में (अर्थात मां का स्नेह बच्चों को सदैव प्राप्त होता रहता है, इसके लिए किसी मौसम-विशेष की प्रतीक्षा नहीं करनी पडती है)।

       वैदिक युग से लेकर आज तक भारतीय समाज में यह भावना जीवित है कि पुत्र को जन्म देने से व्यक्ति पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है अर्थात पुत्र अपने पूर्वजों को पिंड दान देकर संतुष्ट करता है। पुत्र के माध्यम से वंश- परंपरा भी चलती रहती है। इस पर सिंधी में कहा गया है कि पुट जाए खां पोइ पुठि पधिरी थिए थी अर्थात पुत्र उत्पत्ति के पश्चात ही वंश आगे बढ़ता है। दूसरी तरफ पुत्री के जन्म को नापसंद करते हुए कहा गया है कि पुटु जाओ त मूं जणियों, धीअ जाई त तो जणी (अर्थात पुरुष अपनी पत्नी से कहता है कि पुत्र उत्पन्न हुआ तो मैंने जना है और पुत्री उत्पन्न हुई तो तुमने जनी है।) राजस्थानी कहावत में -बेटी जाम जमारी हाइयो (अर्थात पुत्री को जन्म देकर जीवन ही व्यर्थ खो दिया) कहा गया है। पुत्री जन्म को लेकर भोजपुरी कहावतों के भाव देखें- जे पेट के आस उहे बिआइल बेटी (अर्थात जिस गर्भ से पुत्र होने की आशा थी, उसी से बेटी उत्पन्न हुई), बिन मारे बेटी मरे, खाढे उखि बिकाय, बिन मारे मुदई मरे, तो पर देव सहाय। (अर्थात जिसकी पुत्री की बचपन में मृत्यु हो जाए, खेत में ही ईख बिक जाए और बिना मारे दुश्मन की मृत्यु हो जाए तो समझना चाहिए देवता उसके सहायक हैं)। ऐसे चिंतन का कारण सामाजिक ढांचा एवं सामाजिक कुरीतियां हैं। इन कुरीतियोंं में प्रमुख दहेज की प्रथा है। पिता अपनी पुत्री के विवाह में दहेज देने के लिए कर्ज लेने से भी नहीं घबराता। पुत्री के वैवाहिक तथा पारिवारिक जीवन को सुखमय बनाने हेतु पिता हर प्रकार के प्रयत्न करता है ‘अबो गसे धीअ वसे’ अर्थात बाबा घिसते हैं बेटियां बसती हैं-का भाव प्रकट किया गया है; परंतु विवाहोपरांत वह चिंतामुक्त या दायित्वमुक्त हो जाता है, ऐसा नहीं हैं, बल्कि विवाह के पश्चात भी उसे पुत्री के ससुराल-पक्ष को उपहार देते रहना पड़ता है। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता है तो उसकी पुत्री को व्यंग्य -बाणी का सामना करना पड़ता है। उदाहरणार्थ-‘सुत्रे अबे जाई, छज छंडीदी आई’(अर्थात निर्धन पिता की पुत्री खाली सूप छानते हुए आई है अर्थात खाली हाथ आई है),‘सुत्रनि अबाणनि धूड मुर्कनि धीअरु’(अर्थात निर्धन पिता की पुत्री क्या खाक मुस्कुराएगी)। इसलिए ऐसे कठोर व्यंग्य-बाणों की बौछार से बचने के लिए लड़की के माता- पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक पुत्री के ससुराल पक्ष वालों को अर्थात अपने समधी को सदैव प्रसन्न रखने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं-‘सेण आहिनि नेण’ (अर्थात समधी तो हमारी आंखें हैं (जिसके बिना हम अंधे हैं) तथा ‘सेणनि जा गाल्हाईनि नेण न कि डंद’(अर्थात समधी के सिर्फ नयन बोलते हैं दांत नहीं)

      ऐसी परिस्थिति में माता-पिता अपनी पुत्री को सदैव यह शिक्षा देते हैं कि तुम विवाहोपरांत ससुराल-पक्ष के ही व्यवहारों, रहन-सहन के ढंग को अपना लो, जिससे वहां सभी तुमसे प्रसन्न रह सके तथा साथ ही साथ तुम भी अपना जीवन कुशलता से व्यतीत कर सको। इस पर कहावत है-‘धी अडी सो करि जो डिठुइ माउ घरि, नूंहंडी सो करि जो डिठुइ ससु घरि।’ (अर्थात बेटी, तुम मायके में मायके जैसा तथा ससुराल में ससुराल जैसा व्यवहार करो)।

       परंतु जब किसी लड़की को विभिन्न परिस्थितियों में ससुराल -पक्ष में कष्ट सहना पड़ता है तब वह लाचार हो जाती है, मजबूर हो जाती है और कह उठती है- ‘साहुरा-आहुरा, बाबुरा कंडा, जो पासो वराइ चुभ-चुभ कंदा।’ (अर्थात ससुराल के सभी लोग बबूल के पेड़ के कांटों के समान होते हैं जो सदैव चुभते ही रहते हैं)। भोजपुरी में- ‘ससुर-भसुर के डर नहिं, जोकर डर से घर नहिं।’ (अर्थात ससूर-मसुर का मुझे अब डर नहीं है और जिसका (पति का) डर है वह घर पर नहीं है)।

       पुत्री की इस पीड़ा को समझने के पश्चात भी माता-पिता शांत रहने को मजबूर हो जाते हैं। वे समझते हैं कि यदि समधी से क्रोध में आकर ऐसे व्यवहार का विरोध करेंगे तो लड़ाई-झगड़े के अतिरिक्त कुछ और परिणाम नहीं निकल पाएगा। वे कहते हैं: ‘जिनि खे डिनियूसीं जायूं तिनि सां कहिडासीना साहियूं।’ ( अर्थात जिन्हें अपनी लक्ष्मी  जैसी बेटी दे दी उसने सीनाजोरी कैसे करें?)। ससुराल पक्ष के ऐसे ही दुखों, कष्टों, दर्दों को स्मरण करके कभी-कभी लड़कियां ऐसी कामना करती हैं- हे प्रभु हमारा विवाह ऐसे परिवार में करवा देना जहां सास-ससुर ननद न हों, सिर्फ पति हो।

      भोजपुरी कहावत देखिए-‘सास ना ननद, घर अपने अनंद’ (अर्थात जिस घर में सास व ननद नहीं होते वह घर आनंद देता है)। सिंधी कहावत देखिए-‘भगवान तुंहिजो थोरो, मुडिसु डिजांइमि छोरो’ (अर्थात हे प्रभु, हे भगवन, आपका बारंबार आभार मानूंगी यदि आप मुझे पति के रूप में छोरा दे दें अर्थात जिसके माता पिता जीवित न हों)।

      इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है कि नारी को भारत में देवी के रूप में पूजा जाता है, सम्मान प्रदान किया जाता है। संस्कृत में सूक्ति है ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। ऐसे ही भाव सिंधी समाज में भी विद्यमान हैं। सिंधी कहावतें देखे- ‘धीअ घर जी लछिमी आहे’ ( अर्थात पुत्री घर की लक्ष्मी है), ‘नामुराद पुट खां सुपाट धीअ भली’ (अर्थात कुपात्र पुत्र से सुपात्र पुत्री भली होती है), ‘पेईअ लेईअ धीअ कम अचे’ (अर्थात सुख व दुख दोनों परिस्थितियों में पुत्री ही मददगार सिद्ध होती है), ‘पुटु थिए माल भाई, धीअ थिए हाल भाई’ (अर्थात पुत्र सदैव माता पिता की धन -संपदा की लालसा रखता है जबकि पुत्री प्रत्येक परिस्थिति में उनकी कुशलता की कामना करती है)। भोजपुरी कहावत में उल्लिखित है कि ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा’ (अर्थात बिना गृह-स्वामिनी के घर भूत के निवास-स्थान सा है)। ऋग्वेद में जाये दस्तम अर्थात गृहिणी ही घर है। गृहिणी के बिना घर अरण्य -सा है, का उल्लेख मिलता है तथा संस्कृत के निम्न सुभाषितों में नारी के प्रति आदर व सम्मान के भावों को प्रकट करते हुए लिखा गया है कि-

 

‘‘अर्धो भार्या मनुष्यस्य, भार्याश्रेष्ठतम:सखा।

भार्या मूल त्रिवर्गस्य, भार्या मूल तरिष्यत॥

 (अर्थात भार्या पुरुष का आधा अंग है। भार्या पुरुष का सर्वप्रिय मित्र है। भार्या धर्म, अर्थ व काम का मूल है और संसार सागर से तरने की अभिलाषा करने वाले पुरुष के लिए भार्या का सान्निध्य आवश्यक है।)

‘‘भार्यान्वत: क्रियावन्त: सभार्या गृहमेधिन:।

भार्यावन्त: प्रमोदन्ते, भार्यावन्त: श्रियान्विता:॥

  (अर्थात सपत्नीक पुरुष ही यज्ञ आदि कर्म कर सकते हैं; वे सच्चे गृहस्थ होते हैं, वे सुखी व प्रसन्न रहते हैं तथा लक्ष्मी से संपन्न होते हैं)

       संस्कृत सुभाषितों के ऐसे भावों के साथ-साथ कहावतें नारी के प्रति सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार के भावों को प्रकट करती हैं। माता-पिता के संबंध में सिंधी कहावतें देंखे-

‘‘माउ सा माउ,बियो सभु दुनिया तो वाउ।

मासी थिए न माउ, तोडे कढीडिए साहु॥

(अर्थात मां से ही मां जैसा स्नेह प्राप्त होता है मौसी से नहीं)।

‘माउ मारीन्दी पर माराईन्दी कान’

(अर्थात मां बालक की उन्नति हेतु स्वयं तो पीट सकती है किंतु किसी अन्य को यह अधिकार नहीं दे सकती)।

‘माउ डिसे पेटु जाल डिसे खीसा’

(अर्थात मां सदैव चिंता करती है कि बेटा भूखा न रहे जबकि पत्नी चिंता करती है कि पति का जेब कभी खाली न रहे)।

‘माउ जी दिल मखणु, औलाद जी दिल कठिणु’

(अर्थात मां का हृदय मक्खन की भांति होता है तथा पुत्र का हृदय कठोर होता है)।

‘ऊन्हारे जी लुक, मोयेली माउ जी मुक, अंधे जी  थुक, जाते लगे ताते सुक’

अर्थात गर्मी की लू, सौतेली मां का घूसा, अंधे की थूक, जहां भी लगे कष्ट देती है)।

भोजपुरी कहावतों में भी माता की ममता व करुणा को दुर्लभ वस्तु माना गया है-

‘माई के मनवां गाई अइसन, पूत के मनवां कसाई अइसन’

(अर्थात मां का हृदय गाय की तरह सरल सीधा और पुत्र का मन कसाई की भांति क्रूर होता है।)

‘माई निहारे ठठरी, जोइया निहारे गठरी’

(अर्थात परदेसी पुत्र के घर लौटने पर मां पुत्र की भूख प्यास की चिंता करती है जबकि पत्नी गठरी, मोटरी अर्थात उपार्जित धन देखती है।)

‘माई -बाप के लातन मारे मेहरी देख जुडाय,

चारो धाम जो फिरि आवै तबहुं पाप न जाय।’

(अर्थात जो व्यक्ति माता पिता से दुर्व्यवहार करता है और सिर्फ पत्नी के प्यार में तृप्त रहता है, वह पाप का भागी बनता है, उसका पाप चारों धाम की यात्रा के बावजूद नहीं कटता है)।

पारिवारिक जीवन में एक तरफ मां ईश्वर का वरदान है तो दूसरी तरफ सौतेली मां प्राय अभिशाप सिद्ध हुई है-

‘गोंयडा के खेती, सिरंबा के सांप, मैया कारन बैरी बाप।’

(अर्थात गांव के समीप की खेती, बिछावन पर का सांप और सौतेली मां के कारण बैरी बने हुए बाप इन तीनों को दुखद कहा गया है।)

भोजपुर क्षेत्र में बहुपत्नीत्व प्रथा हाल तक प्रचलित रही है। यह प्रथा धनी वर्ग में प्रचलित थी। कहावतों में भी बहुपत्नी प्रथा के नकारात्मक परिणामों की ओर संकेत किया गया है-

‘तीन बैल, दूइगो मेहरी, गइल घर ओ खेती ओकरी।’

(अर्थात जिसके पास तीन बैल और दो पत्निया हैं उसकी खेती और घर समाप्तप्राय: हैं।)

‘सौत’ बहुपत्नी प्रथा की देन है। वह परिवार में पति के प्रेम और संपत्ति की द्वितीय अधिकारिणी के रुप में प्रवेश करती है। अत: सौतों के मध्य डाह तो समाज प्रसिद्ध है-

‘मूअल सौत सतावेले, काठे के ननद बिरावले।’

(अर्थात मृत सौत भी सताती है और काठ की ननद भी (भाभी के ) मुंह चिढ़ाती है।) उक्त कहावत में भी ननद और भाभी के ईर्ष्यापूर्ण संबंधों का चित्र प्राप्त होता है।

भारतीय समाज में विधवा स्त्री को अत्याधिक कष्टों का सामना करना पड़ता था। यह स्थिति वर्तमान में भी देखने को मिल जाती है। यद्यपि समाज में इस कुप्रथा के विरोध में जागरुकता के भाव तो दिखते हैं परंतु आज भी विधवा स्त्री के बारे में कहा गया है –

‘भगीअ बांहं जा न साहुरा न पेका’

(अर्थात विधवा स्त्री को न तो ससुराल में और न ही मायके में सम्मान मिलता है)।

       वर्तमान काल में सामाजिक ढांचे के ताने-बाने में ऐसी लिखित या मौखिक भावना में परिवर्तन आ रहा है। आज की नारियां समाज के विभिन्न कार्यक्षेत्रों में पुरषों के समकक्ष व कंधे से कंधा मिला कर कार्य कर रही हैं। न सिर्फ इतना अपितु पुरुषों को पीछे छोड़ कर जीवन की गाड़ी को निरंतर आगे बढ़ाती जा रही हैं। वर्तमान में लगभग सभी क्षेत्रों में राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रही हैं। चाहे वह पुलिस विभाग हो, न्यायालय हो, व्यापार हो, अंतरिक्ष हो, ज्ञान -विज्ञान क्षेत्र के उच्च पद हो,ं सभी स्थानों पर नारियों के योगदान का डंका बज रहा है। यदि कहा जाए कि वर्तमान में समाज के चहुंमुखी विकास में नारी पुरुष से अधिक योगदान कर रही है तो अतिशयोक्ति न होगी।

      (प्रस्तुत आलेख में सिंधी कहावतें डॉ.एम.के जैतली द्वारा संपादित ‘सिंधी मुहावरें व कहावत कोश’ से तथा भोजपुरी कहावतें डॉ. शशिशेखर तिवारी द्वारा लिखित ग्रंथ ‘भोजपुरी लोकोक्तियां’ से संकलित व उद्धृत की गई हैं।)

मो.: ९५४००७९७३५

 लेखक केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के संचालक है।

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