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भारत की सनातन संस्कृति की धरोहर का सांस्कृतिक दूत है परम पवित्र भगवा ध्वज! धर्म ध्वजा केसरिया, भगवा या नारंगी रंग की होती है। संस्कृति की समग्रता, राष्ट्रीय एकता जिसमें समाहित है। आदि काल से वैदिक संस्कृति, सनातन संस्कृति, हिंदू संस्कृति, आर्य संस्कृति, भारतीय संस्कृति एक दूसरे के पर्याय हैं जिसमें समस्त मांगलिक  कार्यों के प्रारंभ करते समय उत्सवों में, पर्वों में, घरों- मंदिरों- देवालयों- वृक्षों, रथों- वाहनों पर भगवा ध्वज या केसरिया पताकाएं फहराई जाती रही हैं। भगवा ध्वज में तीन तत्व- ध्वजा, पताका (डोेरी) और डंडा- जिन्हें ईश्वरीय स्वरूप माना गया है जो आधिभौतिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक हैं। यह ध्वजा परम पुरुषार्थ को प्राप्त कराती है एवं सर्वओर से रक्षा करती है। भारत के पश्चिम में समुद्री तट पर गाम नगर एवं ओखा (गुजरात) में स्थित श्री द्वारिकाधीश मंदिर, पूर्व में जगन्नाथ जी मंदिर (पुरी- ओडीशा), दक्षिण में रामेश्वरम मंदिर तथा उत्तर में बद्रीनाथ धाम पर फहराते विशाल केसरिया ध्वज अहर्निश विश्व को यह संदेश देते हैं कि यह धर्म प्रधान देश है। पथिक दूर से ही यह देख कर आश्वस्त हो जाता है कि यहां भारतीय समाज या हिन्दू समाज रहता है चाहे जल, थल या वायु मार्ग से भारत आए। इन धर्म ध्वजाओं को देख कर भारत के गौरवशाली अतीत की झलक दिखलाई पड़ती है।

      इसी तरह पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय की प्रधान पीठ श्रीनाथद्वारा में श्री नाथ जी मंदिर के गर्भगृह के ऊपर की छत पर गरुड़ स्तंभ पर धर्म चिह्न के रूप में धर्मध्वजा लहराती है। श्री गिरिराज जी (जतीपुरा मथुरा) के ऊपर मंदिर के शिखर पर भी धर्मध्वजा फहराती रहती है।

 धर्मध्वजा केसरिया

      धर्मध्वजा भगवा या नारंगी रंग की ही क्यों होती है? भारत में वैदिक काल से आज तक यज्ञ एवं ध्वज का महत्व है। भारत में, जिसे जम्बूद्वीप भी कहा जाता है, यज्ञमय यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु का सदा यज्ञों द्वारा वंदन किया जाता है। यज्ञ भगवान विष्णु का ही स्वरूप है, ‘‘यज्ञै यज्ञमयो विष्णु’’। यज्ञ की अग्नि शिखाएं उसी की आभानुसार भगवा रुप भगवा ध्वज बना। अग्नि स्वर्ण को तपा कर शुद्ध सोना बना देती है। शुद्धता त्याग, समर्पण, बलिदान, शक्ति और भक्ति का संदेश देती है। उसकी स्वर्णमयी हिरण्यमयी चमकती सी आमा का रंग ही तो भगवा ध्वज में दिखता है।

      हिंदू संस्कृति में सूर्य की उपासना प्रभात वेला में की जाती है। सूर्योदय के समय उपस्थित सूर्य की लालिमा भगवा ध्वज में समाहित है। उसकी सर्वमयी रश्मियां अंधःकार को नष्ट करती हुई जग में प्रकाश फैलाती है। अज्ञानता का, अविद्या का नाश करती है और प्रकृति में ऊर्जा का संचार करती है। प्रत्येक प्राणी अपने कार्य में जुट जाता है। बड़े- बड़े संत महात्मा, ऋषिमुनि, त्यागी तपस्वी इससे ऊर्जा प्राप्त करते हैं। सैनिक लड़ाई के मैदान में जाते हैं तो केसरिया पगड़ी धारण करते हैं। केसरिया बाना उन्हें जोश और उत्सर्ग करने की प्रेरणा देता है, उनके रथों में, हाथों में भगवा पताकाएं फहराती हैं।

      भगवा रंग भारतीय संस्कृति का प्रतीक है। उसके बिना भारत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वेद, उपनिषद, पुराण श्रुति इसका यशोगान करते हैं। संतगण इसकी ओंकार, निराकार या साकार की तरह पूजा अर्चना करते हैं। शायद यही कारण है देवस्थानों पर सिंदूरी रंग का ही प्रयोग होता है। इसी आस्था से अनुप्राणित होकर  हिंदू नारियां सुहाग के प्रतीक के रूप में इसी रंग से मांग भरती हैं। साधुगण, वैरागी, त्यागी, तपस्वी भगवा वस्त्र धारण करते हैं।

 ध्वज भरावा व सनातन धर्म में कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व यह मंत्र पढ़ा जाता है-

      मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुड ध्वज:

      मंगलम पुण्डरीकाक्ष:, मंगलाय तनों हरि:।

      चाहे गृह प्रवेश हो, पाणिग्रहण संस्कार हो या अन्य कोई हिंदू रीति-रिवाज, पूजा पर्व, उत्सव हो घर के शिखर पर ध्वजा फहराई जाती है और भगवान विष्णु से प्रार्थना की जाती है कि प्रभु हम सब का मंगल करें। भगवान गरुड़ द्वारा रक्षित एवं सेवित ध्वजा हमारा मंगल करें। हमारे ऊपर आने वाली विघ्न-बाधाएं दूर करें। हमारे मंदिर, मकान, महल, भवन, आवासीय परिसर से नकारात्मक ऊर्जा समाप्त करें, नष्ट करें। शिखर पर फहराने से समस्त विघ्न-बाधाएं, अनिष्टकारी शक्तियां, अलाय-बलाय व पाप नष्ट हो जाता है। गरुड़ ध्वजा हमारे लिए सुख समृद्धि, शक्ति और दैवीय कृपा सहित कल्याणकारी हो।

  सूर्यवंशीयों की ध्वजा

      इसी प्रकार सूर्यवंशीयों की परम्परा में सूर्य चिह्न अंकित भगवा ध्वजा फहरायी जाती रही है। सूर्यवंशीय, सत्य, सहिष्णुता, सेवा, नैतिक मूल्यों की रक्षा धर्मानुसार आचरण, वचन की दृढ़ता, वात्सल्यप्रेम करना जिनकी विशेषता है ऐसी विजय ध्वजा भगवान श्रीराम के रथ में फहराती है। श्री हनुमान जी सदैव विजय ध्वज लेकर चलते थे। ध्वजा की रक्षा का दायित्व सम्हालते हुए अहर्निश धर्म ध्वजा नील गगन में फहराते रहे हैं। हनुमान चालीसा से हमें नित्य स्मरण दिलाया जाता है ‘हाथ वज्र औध्वजा विराजे’ फिर भी हम अपने घर-आंगन, वाहन पर ध्वजा फहराने में संकोच करते हैं। दुष्टों का संहार करने के लिए हनुमान जी के एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में ध्वजा है। गौरवमयी सूर्यवंशीय संस्कृति से हरिश्चन्द्रवंशीय समाज भी अपना नाता जोड़ता है। अ.भा. हरिश्चन्द्रवंशीय महासभा ने भी सूर्य चिह्न अंकित भगवा ध्वज को ही अपना ध्वज माना है। महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के रथ पर धर्म ध्वजा फहरा रही है। उसकी रक्षा का दायित्व पवन पुत्र श्री हनुमान जी को सौंपा। श्री हनुमान जी ने वायु का ऐसा कवच बनाया कि उस भयंकर युद्ध में सब की ध्वजाएं व रथ, हाथी-घोड़े सभी नष्ट हो गए किन्तु हनुमान जी एवं ध्वजा जी को एक भी आयुध या प्रक्षेपास्त्र नष्ट नहीं कर सका; क्योंकि ध्वजा जी उनकी रक्षा कर रही थी और वह ध्वजा जी की रक्षा कर रहे थे। यथा अर्थ व्यवस्थितान दृष्टवा धार्तराष्ट्रत कार्यध्वजा:(गीता)

 श्रीकृष्ण चरण कमल ध्वजा जी

      गोपियां भगवान के वियोग में वृंदावन के वृक्ष और लता आदि से श्रीकृष्ण की खोज करने लगीं उसी समय उन्होंने एक स्थान पर उस भगवान के चरण-चिह्न पाए, जो उदार शिरोमणी, नंद नंदन, श्यामसुंदर हैं; क्योंकि इनमें ध्वजा, कमल, वज्र, अकुंश आदि के चिह्न स्पष्ट दीख रहे हैं। (श्लोक २५, अध्याय ३०, दशम स्कंध, पृष्ठ ३१२) इस प्रकार प्रभु से वियोग या दु:ख के समय ध्वजा जी के दर्शन से, ध्वजाजी के आश्रय से समस्त डर भय दूर हो जाते हैं। चरण कमल की कृपा स्वरूप श्री ध्वजाजी अष्ट ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाली है।

      कंस के आदेशानुसार अक्रूर जी श्रीकृष्ण को बुलाने के लिए मथुरा से गोकुल गए। गोकुल की ब्रज रज में अंकुर जी ने भगवान श्रीकृष्ण के चरण चिह्न के दर्शन किए। रथ से कूद कर ब्रज रज में लोटने लगे। दण्डवत प्रणाम करने लगे। भगवान के चरणों में ध्वजा ब्रज कुंश और कमल के चिह्न थे। जब वे चलते थे उनसे चिह्नित होकर पृथ्वी शोभायमान हो जाती थी। (श्रीमद् भागवत दशम स्कन्ध, ३९वां अध्याय, ३०वां श्लोक )

 पुष्टिमार्ग में ध्वजा जी

      पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के वैष्णव जन महाप्रभु वल्लभाचार्य को पूर्ण पुरुषोत्तम का अवतार मानते हैं उनके वाम चरण में ४ चिह्न हैं। उसमें ध्वजा जी प्रथम चिह्न हैं। श्रीमद् वल्लभाचार्य जी के ‘चरण-चिह्न’ की भाव-भावना में यों गया है-

      कमल वज्र अठ गदा पताका तोरण अति भावे।

      सुखद वल्ली धनुष श्री वल्लभवो दक्षिण चरण चित्त लावे॥

      वल्लभाचार्य जी की चरण रज कृपा स्पष्ट धर्मध्वजा अपने अपने घर मंदिर वाहन पर अवश्य फहराना चाहिए। धर्मध्वजा परम् पुरषार्थ देने वाली है। सर्वओर से सर्व संकट से रक्षा करती है। रसात्मक स्वरुपानन्द प्रभु सम्बंधी प्रेम भाव को हृदय में प्रकट करती है।

      सम्पूर्ण भारत में जहां-जहां वैष्णव मंदिर हैं उन समस्त मंदिरों के शिखरों पर भगवा ध्वजा, केसरिया ध्वजा अहर्निश फहराती है। पिताम्बर धारी भगवान श्रीकृष्ण की चरणविन्द स्वरूप भगवा ध्वजा फहराना प्रभु की कृपा प्राप्त करने का सहज उपाय है।

      यहां पर यह भी उल्लेख करना आवश्यक है  कि भारत के उत्तर में पड़ोसी नेपाल राष्ट्र में भी अहर्निश धर्मध्वजा फहराती है। इससे समाज में स्थायित्व, अपरिग्रह, सेवा, सहिष्णुता और रचनात्मक भाव का उदय होता है।

 हिंदू महाराजाओं और सम्राटों की विजय ध्वजा

      श्रीराम और श्रीकृष्ण के ज्ञान चातुर्य ने इस धर्म ध्वजा सांस्कृतिक पताका को नील गगन तक फहराया। राजा दाहिर, पृथ्वीराज चौहान, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट विक्रमादित्य, पुष्यामित्र, खारवेल शालवाहन, राजेंन्द्र चोल, हर्षवर्धन, वधा रावल ने इस रंग की शान और गरिमा बढाई। महाराणा प्रताप, राजा सूरजमल जाट, शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह साहब व छत्रसाल ने अपने जीवन की आहुति हिंदू महायज्ञ के लिए समर्पित की।

 संतों की ध्वजा

      संत महात्मा, आचार्यों ने इसकी रश्मियों से ज्ञान का भंडार प्राप्त किया। इसलिए कहते हैं कि सम्पूर्ण समर्पण का पर्याय है भगवा रंग और इसकी संस्कृति का समग्र रूप है भारत वर्ष। भारतीय संस्कृति के रंग में रंगे बुद्ध, महावीर, नानक, कबीर, तुकाराम, दादू, जायसी, सूर, रहीम, रसखान, तुलसी, मीरा, रामकृष्ण परमंहस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, स्वामी रामतीर्थ, महर्षि अरविंद रामदास, जगद्गुरु शकराचार्य, रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, रामानन्दाचार्य, श्रीकृष्ण स्वामी, निम्बाकाचार्य, जगद्गुरु वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभु आदि अनेकानेक संत आचार्यों में इस रंग के प्रति अलौकिक अनुराग था। इसमें सभी दैवीय रंग के झलकते हैं जिसमें कोई आसक्ति नहीं, कोई लगाव नहीं। यही तो है उदात्त भाव जिसको जरा भी करता है शीश नमन। भारत के कण-कण में, रग-रग में संजीवनी शक्ति बन कर प्रवाहित है केसरिया रंग या भगवा रंग। इसीलिए भारत के तिरंगे में भी ऊपर का एक भाग केसरिया रंग या भगवा रंग है।

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु भगवा ध्वज

      इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य केशवराव बलिराम हेडगेवार ने भगवा ध्वज को ही अपना गुरु माना है, गुरु पद पर मान्यता दी है। व्यक्ति में विकार, बुराई या दुर्गुण आ सकता है, व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है। व्यक्ति सर्वसामान्य है या नहीं इस पर भी विवाद हो सकता है; किन्तु भगवा ध्वज में कोई विकार, बुराई या दुर्गुण नहीं है। इस प्रकार भारत के समस्त धर्म, पंथ, सम्प्रदाय और भगवदीय विचार में परम पूज्य भगवा ध्वज सर्वसम्मति से भारतीय संस्कृति का प्रतीक है।

 

 मो. ः ९४१५०११४१९

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