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अम्मा याने मां। तमिलनाडु की जनता के लिए वह मां ही थीं। मां के गुजरने पर बच्चों के दिल पर जो बितती है, वही तमिलनाडु की जनता पर बीती। बाहर के लोगों को यह पागलपन लगता है; मगर यह पागलपन नहीं उन लोगों का दर्द है जो अम्मा उनको देकर चली गई।
इतिहास उन्ही लोगों के नाम पर है जिन्होंने कभी हार नहीं मानी। जयललिता ने भी कहा था कि ‘‘किसी भी प्रतिक्रिया से हमें डर नहीं है, अंधेरा कितना ही घना हो उसके पीछे प्रकाश ही रहेगा। ’’ (१९९६ के कारावास के बाद)
जयललिता का जन्म २४ फरवरी १९४८ को पुराने मैसूर प्रांत में तमिल अय्यर अर्थात ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे पिता जयराम और माता वेदवल्ली की बेटी थी। एक भाई भी था। उसका नाम जयकुमार था। जयललिता का कोमलवल्ली नाम रखा गया था, पर उन्हें अम्मू के नाम से पुकारा जाता था। जव वे दो साल की थीं तभी उनके पिताजी गुजर गए थे। बाद में वे अपने नानाजी के साथ बंगलुरु चली गईं। वहां उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। सन १९६१ में वे अपनी मौसी के आग्रह के कारण चेन्नै आ गईं। यहां उन्होंने स्कॉलरशिप के माध्यम से पढ़ाई की। उन्हें मेट्रिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। मगर आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनकी आगे की पढ़ाई हो नहीं हो पाई। उनकी मां भी फिल्म में छोटे-मोटे रोल करती थी। उनकी मां संध्या नाम से प्रसिद्ध हुई थी। मां के दबाव के चलते जयललिता ने भी सिनेमा में अपनी पारी प्रारंभ की थी। सिनेमा जगत से उन्हें नफरत थी। मगर गरीबी और मां का दबाव दोनों के कारण वह फिल्म की दुनिया में आ गईं। ‘श्री शैल महात्मा’ उनकी पहली फिल्म थी जो कि कन्नड भाषा में थी। १९६१ में बाल कलाकार के रूप में उनकी यात्रा प्रारंभ हुई जो कि १९६४ में चिन्नाडा गोबे में नायिका के रूप तक आ गई। इसके बाद उन्होंने सी.वी. श्रीधर की ‘वेण्णिरे आडै’ नामक तमिल फिल्म से तमिल फिल्मों में हिरोइन के रूप में कदम रखे। १९६५ में वे ‘आयिरतिल्ल ओसरुवन’ से एमजीआर की हीरोइन बनी थीं। उन्होंने एमजीआर के साथ २८ फिल्मों में काम किया था। सभी फिल्में सुपर हिट हुई थीं।
१९६५ से ८० तक सब से अधिक मेहनताना पाने वाली हिरोइन के रूप में जयललिता उभर करआईं। वे लगातार पांच बार स्टेट अवार्ड विजेता भी रहीं।

राजनीति में
जयललिता ने १९८३ में एडीएमके की सदस्यता ली। वे १९८३ में ही प्रचार विभाग सचिव बनीं और १९८४ में राज्यसभा सांसद बनीं। सन १९८४ के चुनाव के दौरान एमजीआर इलाज के लिए अमेरिका चले गए थे तब एडीएमके को लोकसभा तथा विधान सभा चुनावों में विजय दिलाने का पूरा श्रेय जयललिता को ही मिला था। एमजीआर जयललिता के लिए सबकुछ थे। वे जयललिता को अम्मू कहकर पुकारते थे। एमजीआर से शादी करना जयललिता के जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न था। मगर वह सपना ही रह गया। १९७० में दोनों के बीच दरार पड़ गई। दस साल तक दोनों के बीच कोई सम्बंध नहीं रहा। एमजीआर ने जयललिता का उपयोग किया था। पार्टी में वापसी होने के बाद एमजीआर के बाद जयललिता का ही स्थान था। जयललिता कहती थीं कि मेरे जीवन के प्रारंभिक काल में मेरी माताजी का प्रभाव रहा तथा बाद में एमजीआर का प्रभाव था। इन दोनों के प्रभाव ने मुझे अपना जीवन जीने ही नहीं दिया। एमजीआर सन १९८७ में चल बसे परंतु जयललिता आगे बढ़ती रहीं और जीवनभर अविवाहित ही रहीं।
एमजीआर के निधन के बाद जयललिता को पार्टी से निकाल दिया गया। अन्नाद्रमुक से निकाला गया। दूसरी पार्टी बनाकर १९८८ के चुनाव मैदान में उतरीं। २७ विधायकों के साथ विपक्ष के रूप में तमिलनाडु विधान सभा में आ गईं। १९८५ मार्च २५ को विधान सभा में द्रमुक, अन्नाद्रमुक के बीच हंगामा हो गया था। उस हंगामे में जयललिता के साथ द्रमुक के विधायकों ने दुर्व्यवहार किया था। उनकी साड़ी फाड़ दी थी और बाल खींचे थे। उस दिन विधान सभा के बाहर हुईं और इस दृढ़ता के साथ डटी रहीं कि अब मुख्यमंत्री बनने के बाद ही यहां प्रवेश करेंगी। नारी का अपमान जहां हुआ वहीं नारी का सम्मान जब हो तभी आएंगी। वैसी ही वापसी १९९१ जून २४ को संभव हुई। सब से कम उम्र की मुख्यमंत्री के रूप में उनकी वापसी हुई थी।
१९९६ के विधान सभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साथ २८ दिन तक कारावास भी भोगना पड़ा।
१९९८ में अटल जी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार का समर्थन करती रहीं। लेकिन केंद्र में सरकार गिर गई। २००१ मई १४ को फिर से मुख्यमंत्री बन गईं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस्तीफा दे दिया और पनीर सेल्वम को मुख्यमंत्री बना दिया। २००२ मार्च को हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिर से मुख्यमंत्री बन गईं। २००६ के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। २०११ में चौथी बार मुख्यमंत्री कुर्सी फिर से संभाली। २०१४ में सितंबर में अदालत के फैसले के बाद पद छोड़ा, मगर २०१५ में ही वापसी भी हुई। २०१६ मार्च २३ के चुनाव में जीत कर फिर से मुख्यमंत्री बन गईं। लगातार सत्ता में रहने का श्रेय जयललिता को ही रहा।
रहस्यमय जीवन जीना जयललिता की विशेषता रही। उन्होंने नजदीक किसी को रहने नहीं दिया। अपनी प्रिय सहेली शशिकला को भी बीच में छोड़ दिया। चिन्नम्मा के नाम पर शशिकला ने जो नाम कमाया वह जयललिता के बलबूते पर था। जयललिता ने कहा था कि मुझे राजनीति में लाने का पुरा श्रेय अन्ना को ही जाता है; मगर उन्होंने कोई फूल बिछा हुआ रास्ता नहीं बनाया था। सबसे लड़ कर ही यहां तक पहुंची हूं। मेरी यात्रा अकेली की थी, सिर्फ अकेली की।
संघ के साथ भी जयललिता का अच्छा संबध रहा था। रा.स्व.संघ का चैन्ने कार्यालय आतंकवादियों ने जब बम से उड़ा दिया था तब जयललिता मुख्यमंत्री थी। वह कार्यालय स्थल में पहुंचीं और नए कार्यालय का पूरा खर्च वहन करने की बात कही। उस समय के प्रांत प्रचारक नाथ जी (वर्तमान में मेघालय गवर्नर) ने आखिल भारतीय अधिकारियों से बातचीत करके जवाब दिया कि आपका आगमन अन्य मुख्यमंत्री जैसा नहीं रहे। जयललिता ने तुरंत अपनी पी. ए. से अपना नंबर देने के लिए कहा और यह भी कहा कि किसी भी समय आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। उन्हें बताया गया कि कार्यालय के निर्माण कार्य का खर्च हम खुद ही वहन करेंगे। इस जवाब से जयललिता बहुत प्रभावित हुई और उन्होंने संघ की प्रशंसा भी की।
राम मंदिर आंदोलन के समय प्रधान मंत्री नरसिंह राव की अध्यक्षता में संपन्न सभा में राम मंदिर अयोध्या में ही बनना चाहिए यह सुझाव जयललिता का था। हिन्दू संस्था और संगठन से बहुत करीब थीं जयललिता। हिंदू मुन्नणि के नेता रामगोपाल जी के साथ घनिष्ठ सम्बंध रहा था।
१९ साल तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता तमिल जनता के पुरद्धी तैलावी बन गई थीं। वे परिश्रम, साहस, धैर्य की प्रतिमूर्ति थीं।

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