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हे विश्वची माझे घर’ अर्थात यह विश्व ही मेरा घर है यह उक्ति इस भूतल पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी पर लागू होती है। प्रत्येक प्राणी फिर वह चाहे छोटी सी चींटी हो या मानव, एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करता है। यह उसका स्वाभाविक गुणधर्म है।
अब जब यह विश्व ही मेरा घर है ऐसा कहा है तो इस विश्व में घूमने हेतु आपको यात्रा करनी पड़ेगी। यात्रा याने मनुष्य की पसंद की चीज फिर भी कुछ थोड़े से लोगों को यह अच्छी नहीं लगती। ऐसे लोगों को हम नीरस कहते हैं। जिन्हें घूमना-फिरना अच्छा लगता है उनकी इच्छा रहती है कि वे बारी-बारी से अपना गांव, जिला, राज्य, देश एंव विश्व घूम कर देखें। कहीं भी पर्यटन हेतु निकलना है वो सब से पहले अर्थ (पैसा) की व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं। इस कारण आजकाल कई यात्रा कंपनीयां मासिक किश्त पध्दति से पैसा एकत्रित कर इच्छुक पर्यटकों को उनकी इस इच्छा को पूर्ण करने में मदद करती हैं।
संपूर्ण विश्व में विविध देशों से अनेक लोग सतत भ्रमण करते रहते हैं। विभिन्न देशों में जाकर उस देश की संस्कृति, परंपरा, इतिहास का वे अध्ययन करते हैं। कई देशों में पर्यटन वहां की शिक्षा पध्दति में एक विषय के रूप पढ़ाया जाता है।
पर्यटन से विचार करने की शक्ति बढ़ती है, विचारों का स्तर बढ़ता है, समाज में अन्य लोगों के बीच एवं उनके साथ कैसा व्यवहार करना, कैसे बोलना, इसकी समझ बढ़ती है साथ ही निड़रता आती है, आत्मविश्वास एवं निर्णय लेने की क्षमता में वृध्दि होती है।
जहां तक विदेशी पर्यटकों का प्रश्न है वे प्रत्येक अभ्यासक होते हैं। उन्हें जिस स्थान पर पर्यटन हेतु जाना होता है, निकलने के पूर्व वे उस स्थान की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करते हैं। उस स्थान के नक्शे, संकेत स्थल, उस स्थान का संपूर्ण इतिहास, भूगोल इसकी पूर्व जानकारी प्राप्त कर ही वे स्वतंत्र रुप से पर्यटन हेतु निकलते हैं।
हमारा भारत देश तो तपोभूमि है। अन्य देश तो भोगभूमि हैं। हमारा देश आध्यात्मिक संस्कृति की पृष्ठभूमि वाला देश है भा याने ज्ञान और रत याने मग्न अर्थात ज्ञान संपादन करने में मग्न हम भारतवासी हैं।
हमारे यहां के पर्यटन को हम साधारणतः तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं। धार्मिक, विशुध्द पर्यटन याने घूमना-फिरना, मौज-मस्ती इ. एंव ऐतिहासिक दर्शन।
धार्मिक यात्रा याने त्रिवेणी संगम अर्थात आध्यामिक अनुभूति, आध्यात्मिक शांति एवं आध्यात्मिक आनंद। भारतीय परंपरानुसार आद्य शंकराचार्य से अर्थात ई.स.८२० से तीर्थस्थलों की यात्रा अर्थात धार्मिक यात्राओं की शुरूआत मानी जा सकती है और यह आजतक अखंड रूप से चल रही है। उदाहरणार्थ चार धाम यात्रा अर्थात पूर्व में जगन्नाथ धाम (जगन्नाथ पुरी), पश्चिम में द्वारिका, उत्तर में बद्रीनाथ एवं दक्षिण में रामेश्वर। उत्तराखंड की चार धाम यात्रा याने केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोगी एवं यमुनोत्री। यात्रा याने शरीर कष्ट, विभिन्न प्रकार की अडचनें। यात्रारूपी पर्यटन करते हुए यदि आपने मानसिक शांति प्राप्त की तो शारीरिक कष्टों का पता ही नहीं चलता। भगवान का नाम अखंड रूप से जपते हुए (अखंड नामस्मरण) यदि आपने धार्मिक यात्रा की तो समझिए आपकी यात्रा सफल संपूर्ण हुई।
पर्यटन का दूसरा प्रकार याने मौज मस्ती के लिए घूमना-फिरना। ठंडी हवाओं के स्थान पर जाकर निसर्ग की सुंदरता का लुत्फ उठाना, उसका भरपूर आनंद लेना, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ एवं हिम शिखरों से तादात्म्य स्थापित करना मन ही मन उनसे अपना सुख-दु:ख बांटना। किसी भी ठंडी हवा के स्थान में जाते हुए रास्ते में पड़ने वाली घाटियां, आजूबाजू का घना जंगल इसमें हम कब खो जाते हैं पता ही नहीं चलता। घूमते- घूमते जब हम ऊपर हिमालय से नीचे समुद्र की ओर आते हैं तब एक अलग ही अनुभव आता है। नीला, हरा, सफेद जैसा विविध रंगी सागर कब हमें अपना-सा कर लेता है, समझ ही नहीं आता। समुद्र की गहराई हम कभी भी नहीं नाप सकते। अंडमान, लक्ष्यद्वीप, गोवा सरीखे समुद्र तीर के शहरों में घूमने का आनंद कुछ और ही है। जो समुद्र की मछलियां खाने के शौकीन हैं उन्हें तो यह पर्यटन याने विभिन्न मछलियों का स्वाद लेने का पर्व ही है। समुद्र के किनारे घूमते हुए ऊंचे-ऊंचे नारियल के वृक्ष, सुपारी के वृक्ष लगता है जैसे हमें आवाज दे रहे हैं। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक के समुद्र किनारे तो इन वृक्षों से ही घिरे हुए हैं। केरल मे बैकवाटर्स के पर्यटन में विविध प्रकार के पेड़-पौधे, केले एवं सुपारी के पेड़ एवं विभिन्न प्रकार के वन आपके मन को रिझाते रहते हैं। इस प्रकार अपने भारतवर्ष के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र,ओडिशा ये राज्य पर्यटनोत्सुक पर्यटकों को आमंत्रित करते रहते हैं।
पर्यटन का तीसरा प्रकार याने ऐतिहासिक पर्यटन। हमारी ऐतिसाहिक विरासत याने पर्यटन हेतु एक बहुत बड़ा खजाना है। ऐतिहासिक पर्यटन हेतु अनेक राज्यों के द्वार आपके लिए खुले हैं। भारत का ह्दय कहलाने वाले मध्यप्रदेश को यदि ऐतिहासिक राजधानी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। हम सबका प्रिय राजस्थान तो ऐतिहासिक विरासत लेकर ही पैदा हुआ है। महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर सरीखे अनेक शूरवीर एवं वीरांगनाओं के कारण ये राज्य ऐतिहासिक दृष्टि से संपन्न हैं। विविध युध्द, विविध चढ़ाइयों, मुगलों के विरुध्द अनेक प्रकार के दांवपेंचों के कारण हमारा भारतीय इतिहास संपूर्ण विश्व में पठनीय है। ऐतिहासिक पर्यटन में अपना महाराष्ट्र तो अग्रराज्य है। शिवाजी महाराज एवं उनके साथियों, जिन्हें ‘मावले’ कहा जाता था, से तो पूरा महाराष्ट्र गुंजायमान है। ऐतिहासिक पर्यटन में विविध किले, राजबाड़े, पेशवाओं की हवेलियों एवं अन्य विविध हवेलियों का समावेश है। हजारों वर्षों से हमारी किलों का निर्माण करने की कला, कारीगरों की कुशलता इसे तो हमारा प्रणाम है ही। क्योंकि, इस इक्कीसवीं सदी में, प्रगति पथ पर बढ़ने वाली सदी में एखाद किला या राजबाड़ा बांधना आसान काम है; परंतु हजारों वर्ष पूर्व इस प्रकार पत्थरों से इमारत बनाना बहुता कठिन था। विविध प्रकार की कलाकृतियों को उकेर कर बनाए गए राजप्रासाद तो मन मोह लेने वाले होते हैं।
पर्यटन करते समय एक और आकर्षण होता है। वह याने विविध अभयारण्य। घूमने- फिरने वाले पर्यटन करने वाले सभी निसर्ग प्रेमियों को अ्रभयारण्य घूमने की चाह होती है। इन अभयारण्यों में वास करने वाले विभिन्न पशु, पक्षी, कीटक हमारे मन में हमेशा के लिए बस जाते हैं। काजीरंगा का एक सिंग वाला गेंडा, गिर अभयारण्य का सिंह, ताड़ोबा-बांधवगड़ के बाघों एवं उनके बच्चों को देरवना व घंटों फोटोग्राफी करना यह पर्यटकों के लिए विशेष पर्व के समान है। भरतपुर अभयारण्य के विविध पक्षियों एवं उनकी विभिन्न जातियों पर तो एक पुस्तक लिखी जा सकती है।
इस प्रकार पर्यटन हेतु हमारा देश विदेशी पर्यटकों के लिए एक खजाना है। पृथ्वी के नक्शे पर एक बिंदु जैसा दिखनेवाला देश सिंगापूर केवल पर्यटन पर निर्भर है। उस देश की जीवन रेखा केवल पर्यटन पर आश्रित है। सारे विश्व में यह देश अपने पर्यटन के बूते अपना झंडा ऊंचा रखता है। यदि पर्यटन के कारण इतना छोटा देश इतनी प्रगति कर सकता है, इतनी संपन्नता पा सकता है तो फिर हमारा देश क्यों नहीं? उत्तर से दक्षिण तक ३२१४ कि.मी., पूर्व से पश्चिम तक २९३३ कि.मी. फैले तथा १५२०० कि.मी. लैंड फ्रंटियर एवं ७५१७ कि.मी. का कोस्ट लाइन हमारा समृध्द-सुजलाम-सुफलाम देश पर्यटन में यदि और अग्रसर हुआ तो अर्थ की कभी कमी नहीं होगी।
पर्यटन से प्राप्त अनुभवों से हमारा मन विशाल होता है। ऋतुओं के अनुसार भी हम पर्यटन की योजना बना सकते हैं अर्थात बारिश, ठंड एवं गर्मी का पर्यटन। इसके अलावा सतत अखंड रुप से घूमने-फिरने वाले हमेशा के पर्यटन हैं ही।

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