हिंदी विवेक : we work for better world...

दक्षिण भारत की राजनीति व फिल्मों में आए कुछ चर्चित चेहरे जनता के दिलों में ऐसे बैठ गए कि वह उनको कभी भुला न पाई यहां तक कि उनके नाम की ही हर जगह जयजयकार होने लगी। हाल ही में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मौत की खबर जैसे ही जनता को लगी तो कानून व व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी। लोग उनकी मौत से इतने दुखी हो गए कि वह अपने प्रिय नेता की एक झलक पाने के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े। कहा जाता है कि जनता जिसे भी अपने दिल में बिठा लेती है फिर उसे ही वह अपना ‘भगवान’ मानने लगती है। इसी कारण तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के कुछ प्रांतों में व्यक्ति पूजा की परंपरा रही है। जयललिता के जैसे ही उनके राजनीतिक गुरू एम जी रामचंद्रन को भी यहां की जनता ने अपने दिलों में बिठा लिया था। अब फिल्म अभिनेता रजनीकांत का भी प्रांत में ऐसा ही वर्चस्व है। वह जनता के दिलों में ऐसे जगह बना चुके हैं कि लोग उनकी एक झलक व एक आवाज पर अपना सब कुछ न्यौछावर करने तैयार रहते हैं।
जयललिता के ६८ वर्ष के जीवन का आधा वक्त राजनीति में बीता। वह १५ साल सत्ता में रहीं और तमिलनाडु का चेहरा बदल डाला। उन्हें महिलाओं और गरीब तबके का जबर्दस्त समर्थन हासिल हुआ। सच तो यही है कि लोकप्रियता और लोक-कल्याण के कामों से अपने गुरु एम जी रामचंद्रन को भी पछाड़ दिया। वह पुरुष वर्चस्व वाले राजनीतिक परिदृश्य में तमाम मुश्किलों से लड़ीं और मजबूती से साथ शासन किया। जयललिता का पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा। हर उतार-चढ़ाव के बाद वह नई आभा लेकर लौटीं।
जयललिता बनना तो चाहती थीं वकील, लेकिन मां के दबाव और पारिवारिक हालात ने उन्हें फिल्मों में काम करने को मजबूर कर दिया। एक इंटरव्यू में जयललिता ने बताया कि उनका प्रारंभिक जीवन पर दो लोगों का प्रभाव रहा। मां के दबाव में फिल्मी दुनिया में आईं और एमजीआर के दबाव ने उन्हें राजनीति में धकेला। हालांकि दोनों ही क्षेत्रों में वह उत्कृष्ट रहीं। एमजीआर सिनेमा की दुनिया से ही उनके गुरु रहे। दो दर्जन फिल्मों में साथ काम किया। बाद में राजनीति में आए, तो १९८२ में जयललिता भी एमजीआर की अन्नाद्रमुक से जुड़ गईं। सफल भी रहीं, लेकिन १९८७ में एमजीआर का निधन हो गया।
जयललिता खुद को एमजीआर की असली वारिस के रूप में देख रही थीं, लेकिन पार्टी को यह मंजूर नहीं था। पार्टी बंट गई, क्योंकि एमजीआर ने उत्तराधिकार की कोई योजना नहीं दी थी। जयललिता को एमजीआर के घर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। भाग कर राजाजी हाल पहुंचीं, जहां पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा था। जयललिता ने एमजीआर के शव के ठीक बगल में अपने लिए जगह बनाई और अगले दो दिन वहीं खड़ी रहीं। बाद में जयललिता को उस वाहन तक नहीं फटकने दिया गया, जिससे एमजीआर को अंतिम यात्रा के लिए ले जाया जाना था। लेकिन इन अपमानों ने उनके प्रति सहानुभूति जगा दी। द्रमुक और अन्नाद्रमुक की बदले की राजनीति में भी जयललिता नहीं टूटीं। वह अपनी गलतियों से सबक भी लेती थीं।
उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन सारी उठापटक के बावजूद जयललिता कमजोर नहीं पड़ीं। बरी होकर लौटीं और लीक से हट कर लिए गए फैसलों के साथ जनता के दिलों में घर करती गईं। राजनीति में भी उनके तमाम फैसले लीक से हट कर दिखे। इस साहसिक महिला की राष्ट्रीय राजनीति में छाने की मंशा भले न पूरी हुई हो, मगर तमिलनाडु की जनता के दिलों पर वह पूरी तरह काबिज थीं।
जयललिता के बाद तमिलनाडु की सियासत किस करवट बैठेगी, इसे लेकर कयासबाजी चल रही है। मुख्यमंत्री ओ. पन्नीर सेल्वम क्या पार्टी और राज्य की जनता के भरोसे पर खरे उतर पाएंगे? जयललिता ब्राह्मण होते हुए भी थेवर और बाकी जातियों को जोड़ कर रखने में कामयाब रहीं, लेकिन सेल्वम क्या ऐसा कर पाएंगे? सेल्वम और शशिकला थेवर जाति से हैं। सेल्वम सीएम बना दिए गए हैं, तो शशिकला को पार्टी की कमान दिए जाने की बात चल रही है। ऐसे में राज्य की बाकी जातियां क्या इसे स्वीकार कर पाएंगी, क्या पार्टी एकजुट रह पाएगी? ये ऐसे सवाल हैं, जो तकरीबन हर क्षेत्रीय दलों को लेकर उठते हैं।
तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे जयललिता आज भले ही किवदंती के तौर पर याद की जा रही हों लेकिन क्या आप इस तथ्य से वाकिफ हैं कि वह सिर्फ दसवीं तक पढ़ी थीं। जिसकी बीमारी की खबरों पर ही तमिलनाडु की सडक़ें सूनी पड़ जाया करती हों, जिसके बिना समकालीन तमिल राजनीति की कल्पना बेमानी सी लगती हो, जिसके समर्थक उसे अम्मा और पुरात्ची थलाईवी यानी क्रांतिकारी नेता पुकारते रहे हों। गौरतलब है कि दसवीं में स्टेट टॉपर होने के बाद भी उनकी आगे की पढ़ाई पर ब्रेक लग गया। इसके बावजूद उनकी अंग्रेजी पर पकड़ इतनी मजबूत थी कि बीते जमाने की तमिल राजनीति में दिग्गज एम जी रामचंद्रन न सिर्फ उन्हें राजनीति की धारा में खींच लाए बल्कि वह धीरे-धीरे तमिल राजनीति की केन्द्रबिन्दु बन गईं।
आज भले ही जे जयललिता की कहानी किसी फिल्मी नायिका सरीखी लग रही हो लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। उन्होंने अपना बचपन बेहद गरीबी में काटा। महज दो साल की उम्र में अपने पिता को खो चुकीं जयललिता पढ़ाई में शुरू से ही अव्वल थीं। आज भले ही उन्हें भारत के अग्रणी राज्य की मुख्यमंत्री के तौर पर याद किया जाता है, तमिल राजनीति की केन्द्रबिंदु के तौर पर उद्धरित किया जाता हो लेकिन वह अपने साक्षात्कारों में इस बात को कहती रहीं कि फिल्मी दुनिया या राजनीति उनका पहला प्यार नहीं था। वह हमेशा से लॉ की पढ़ाई करना चाहती थीं लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। आज भले ही कई मानद डॉक्टरेट की उपाधियों से नवाजा जा चुका हो लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई पूरा न कर पाने का हमेशा ही बेहद अफसोस रहा। भ्रष्टाचार के मामलों में ६८ वर्षीय जयललिता को दो बार पद छोड़ना पड़ा लेकिन दोनों मौके पर वह नाटकीय तौर पर वापसी करने में सफल रहीं।
– नायिका के तौर पर जयललिता का सफर ‘वेन्निरा अदाई’
(द व्हाइट ड्रेस) से शुरू हुआ।
– राजनीति में उनकी शुरुआत १९८२ में हुई जिसके बाद एमजीआर ने उन्हें अगले साल प्रचार सचिव बना दिया।
– रामचंद्रन ने करिश्माई छवि की इस अदाकारा-राजनेता को १९८४ में राज्यसभा सदस्य बनाया जिनके साथ उन्होंने २८ फिल्में कीं। १९८४ के विधान सभा तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रभार का तब नेतृत्व किया जब अस्वस्थता के कारण एमजीआर प्रचार नहीं कर सके थे।
– वर्ष १९८७ में रामचंद्रन के निधन के बाद राजनीति में वह खुल कर सामने आईं लेकिन अन्नाद्रमुक में फूट पड़ गई। ऐतिहासिक राजाजी हॉल में एमजीआर का शव पड़ा हुआ था और द्रमुक के एक नेता ने उन्हें मंच से हटाने की कोशिश की।
– बाद में अन्नाद्रमुक दल दो धड़े में बंट गया जिसे जयललिता और रामचंद्रन की पत्नी जानकी के नाम पर अन्नाद्रमुक (जे) और अन्नाद्रमुक (जा) कहा गया। एमजीआर कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री आर एम वीरप्पन जैसे नेताओं के खेमे की वजह से अन्नाद्रमुक की निर्विवाद प्रमुख बनने की राह में अड़चन आई और उन्हें भीषण संघर्ष का सामना करना पड़ा।
– जयललिता ने बोदिनायाकन्नूर से १९८९ में तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में जीत हासिल की और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं।
– राजनीतिक और निजी जीवन में कुछ बदलाव आया जब जयललिता ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ द्रमुक ने उन पर हमला किया और उनको परेशान किया।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu