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सम्पूर्ण विश्व भर की अपेक्षा हम भारतीय युवाओं हेतु ईश्वर कितना कृपालु है यह केवल इस बात से समझा जा सकता है कि ईश्वर ने हमें प्रेरणा देने हेतु भारत भू पर स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष को जन्म दिया! आज जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से और वैश्विक दृष्टि से देखने पर हमें पता चलता है कि भारत सम्पूर्ण विश्व में सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला राष्ट्र है तब इस युवा भारत में स्वामी विवेकानंद का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि आज की इस पीढ़ी का युवा स्वामी विवेकानंद को संपूर्णतः पढ़े, उन्हें समझें, उनके अनुरूप ढलें व उनके पद चिह्नों पर चलने का प्रयास करें। यदि आज भारतीय युवा स्वामी विवेकानंद का अनुसरण करने का तनिक मात्र भी प्रयास करें तो आज हमें और हमारे राष्ट्र भारत वर्ष को विश्वगुरु बनने से विश्व की कोई भी शक्ति नहीं रोक सकती है।
हमारे इस देश में देव स्वरुप जन्मे स्वामी विवेकानंद एक ऐसे विद्वान्, संत, चिंतक व अद्भुत पुरुष हुए हैं जिन्हें हर दृष्टि से केवल और केवल चमत्कारिक देव पुरुष ही कहा जा सकता है। इस महान विचारक का भारत में जन्मना और इस देव भूमि, हिन्दू भूमि के विचारों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पुनर्स्थापित करने का प्रयास सचमुच ही एक ऐसा कार्य था जिसने भारत के ललाट को गौरव लालिमा से प्रकाशित कर दिया था। १८९३ की शिकागो में आयोजित धर्मसभा में जब यह तेजस्वी विचारक बोलने उठा तो वहां उपस्थित विश्व भर का प्रबुद्ध और संत समुदाय उनके एक-एक शब्द को सुन कर जैसे जड़वत होता चला गया और उन्हें श्रद्धाभाव और भक्तिभाव से सुनते रहने के लिए मजबूर हो गया था। यह एक सर्वविदित गौरव गाथा है जो प्रत्येक भारतीय सगर्व बोलता सुनता है। इस गौरव गाथा के साथ आज के हमारे युवा भारतीय समाज को इस चिंतक के विचारों में छुपे कुछ नए किन्तु गूढ़ आयामों को भी समझने और आत्मसात करने के गंभीर प्रयास प्रारम्भ करने होंगे।
भारतीय प्रबुद्ध वर्ग को समझना होगा कि आज जब भारतीय संस्कृति, सनातनी संस्कार और हिन्दू जीवन शैली के संदर्भों में तथाकथित समाज के अगड़े और प्रगतिशील बंधु विचित्र परिभाषाएं गढ़ने लगे हैं और सब से बढ़ कर जब राजनीति में धर्म निरपेक्षता जैसे शब्दों के मुक्त रूप से विरूप और कुरूप शब्दार्थ खोजे जा रहे हो तब स्वामी विवेकानंद के विचारों का आलोक ही हमें इस घनघोर वैचारिक अंधःकार से मुक्ति दिला सकता है।
आजकल बहुधा नहीं बल्कि सदैव ही यह कहा जाने लगा है कि शासन और प्रशासन को धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के संदर्भों में धर्म निरपेक्ष होकर विचार और निर्णय करने चाहिए। यहां पर यह प्रश्न बड़ा यक्ष प्रश्न बन कर उभरता है कि धर्म निरपेक्षता आखिर है किस चिड़िया का नाम? आज हमारे देश के तथाकथित बुद्धिजीवी और प्रगतिशील कहलाने वाला वर्ग धर्म निरपेक्षता के जो मायने निकाल रहा है क्या वह सही है? क्या धर्म निरपेक्षता शब्द के जो अर्थ चलन में उतार दिए गए हैं वे रत्तीमात्र भी प्रासंगिक और उचित हैं? इस वैचारिक संदर्भ में भारत में जो अर्थशास्त्र का बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा सिद्धांत लागू है वह संभवतः दुर्योग से विश्व में एक हमारे यहां ही सांस्कृतिक जीवन में भी लागू हो रहा है! अर्थशास्त्र में मुद्रा सिद्धांत है कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है। यह सिद्धांत भारत की वैचारिक परिधि में लागू हो गया लगता है! आज हमें देखने में आ रहा है कि जहां पाश्चात्य विश्व के बुरे- खारिज कर दिए विचार, फैशन शैली, परम्पराएं और पद्धतियां जो हमारी पीढ़ी को अच्छी लग रही हैं वही भारतीय -हिन्दू जीवन शैली को पश्चिमी देश बेधड़क और तेजी से अपनाते चले जा रहे हैं। आज हमें इस पीड़ादायक तथ्य को स्वीकार करना होगा कि भारत की वैचारिक दुनिया में जिस प्रकार बुरे विचारों ने अच्छे विचारों को प्रचलन से बाहर कर दिया है या करते जा रहा है तब स्वामी जी के विचारों का प्रकाश ही हमें इस षड्यंत्रपूर्वक बना दिए गए कुचक्र से बाहर निकाल सकता है। स्वामी जी ने जब शिकागो में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा था कि राष्ट्रवाद का मूल, धर्म व संस्कृति के विचारों में ही बसता है तब सम्पूर्ण पाश्चात्य विश्व ने उनके इस विचार से सहमति व्यक्त की थी और भारत के इस युगपुरुष के इस विचार को अपने-अपने देशों में जाकर प्रचारित और प्रसारित किया था और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान प्रकट किया था।
पिछले दिनों जब क्रिसमस के अवसर पर जब ब्रिटिश प्रधान मंत्री ने कहा कि ब्रिटेन एक ईसाई राष्ट्र है और इसे कहने में किसी को कोई भय या संकोच नहीं होना चाहिए तब निश्चित ही उनकी इस घोषणा की पृष्ठभूमि में विवेकानंद जी का यह विचार ही था। कितने आश्चर्य का विषय है कि आज जब समूचा विश्व धर्म निरपेक्षता के शब्दार्थों को विवेकानंद जी के विचारों में खोज और पा रहा है हम उनके ऐतिहासिक शिकागो संभाषण को और उनके समूचे जीवनवृत्त को याद ही नहीं कर रहे हैं! इस संभाषण में उन्होंने गौरवपूर्वक कहा था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और हिन्दू जीवन शैली के साथ जीवनयापन करना ही इस आर्यावर्त का एकमात्र विकास मार्ग रहा है और भविष्य में विकास करने की और एक आत्मनिष्ठ समाज के रूप में अस्तित्व बनाए रखने में यही एकमात्र मंत्र ही सिद्ध और सफल रहेगा। स्वामी जी ने अपने ऐतिहासिक व्याख्यान में कहा था कि भारत के विश्व गुरु के स्थान पर स्थापित होने का एकमात्र कारण यहां के वेद, उपनिषद, ग्रंथ और लिखित अलिखित करोड़ों आख्यान और गाथाएं ही रही हैं। अपनी बात को विस्तार देते हुए उन्होंने कहा था कि जिस भारत को विश्व सोने की चिड़िया के रूप में पहचानता है उसकी समृद्धि और ऐश्वर्य का आधार हिन्दू आध्यामिकता में निहित है। आज यदि हम इस तथ्य को प्रामाणिकता की कसौटी पर परखें तो हमें निश्चित ही यह भान होगा कि भारत के प्राचीन विचार में निहित गुरुकुल, विज्ञाननिष्ठ त्यौहार, आयुर्वेद, आयुर्विज्ञान, अंतरिक्ष विज्ञान, काल गणना, अणु विज्ञान, अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र आदि के सहारे यदि हमारा समाज चलता रहता तो आज हमारी विकास गति और विश्व में हमारा स्थान कुछ और ही होता। चरक, आर्यभट्ट, चाणक्य, धन्वंतरी आदि न जाने कितने सौ ऐसे भारतीय वैज्ञानिकों, चिंतकों, विचारकों, आविष्कारकों के नाम गिनाए जा सकते हैं जिनका ध्यान स्वामी विवेकानंद के मानस में हिन्दू भारत या हिन्दू जीवनशैली कहते हुए रहता होगा। शिकागो संभाषण के समय स्वामी जी के मस्तिष्क में यह भी रहा ही होगा कि भारत पर विदेशी आक्रमणों का इतिहास जितना पुराना और व्यापक है उतना विश्व में अन्यत्र दूसरा कोई उदाहरण नहीं है। इनमें कुछ अत्यंत बर्बर खूरेजी, शकों, हूणों, चंगेजों, मंगोलों, अरबों, तोर्मानो, यवनों, तुर्कों, अफगानों, पठानों, मुगलों, यूरोपियनों और खासकर अंग्रेज संगठित सैन्य आक्रांताओं ने यहां के तत्कालीन बेहतरीन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, कृषि, भोजन, शिक्षा और प्रशासनिक ताने-बाने को ध्वस्त कर उनके अपने अनुरूप सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक, राजनैतिक और व्यापारिक मूल्य स्थापित किए जो उनके लिए वरदान थे और भारत के लिए अभी तक अभिशाप बने हुए हैं। ये ही वे विघटनकारी तत्व या घटनाएं थीं जिनसे इस देव भूमि-भारत भूखंड की जीवनशैली प्रभावित और अतिक्रमित हुई थी।
आज यदि भारत के नीति नियंताओं, राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों में और उनकी मनसा, वाचा, कर्मणा में कहीं भी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अंशमात्र भी साम्य दिखाई नहीं पड़ता है। स्वामी जी के विचारों से प्रभावित होकर जब पाश्चात्य देशों का नेतृत्व उनके यहां कोई नीति बनाता है तब हम बड़े गौरान्वित होते हैं किन्तु आज यह समीक्षा होनी चाहिए कि यदि आज इस देश में कोई स्वामी जी के विचारों को लागू करने का प्रयास करें तो उसका क्या हश्र होगा? इस देश का आम नागरिक चाहता है कि इस कि भूमि के मूल सांस्कृतिक विचारों का यहां प्रभाव व प्रभुत्व हो किन्तु इस देश की समकालीन परिस्थितियां इतनी भयावह और गंभीर हैं कि ऐसा सोचना भी यहां एक बड़े बवंडर को जन्म दे सकता है। सम्पूर्ण विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जहां बहुसंख्यक समाज को अपने विचारों, मान्यताओं और परम्पराओं के पालन और रक्षण के लिए भी उन्हें धर्म निरपेक्ष न होने का ताना सुनना पड़ता है और उन्हें वैचारिक पिछड़ा कहने वाले लोग तथाकथित रूप से इस देश के नेतृत्व में या नेतृत्व को प्रभावित करने वाली बैठकों में बैठे नजर आते हैं। विवेकानंद जी के विचारों का प्रवाह और उनकी निरंतर सतत समीक्षा वह कक्षा है जहां से इस राष्ट्र को समग्र विकास और सांस्कृतिक अक्षय के साथ सोने की चिड़िया और विश्व गुरु बनाने वाले स्नातक निकल सकते हैं; हमें इस सर्वकालीन तथ्य और ब्रह्म सत्य को पहचानना होगा।

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