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चंपक वन में रहने वाले रोमी हिरण व मोनू बंदर दोनों पड़ौसी थे। दोनों एक साथ खेलते, एक साथ विद्यालय जाते और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। उनकी कक्षा में बंटी घोड़ा, लम्पू लोमड़ी, जग्गू हाथी, नटखट खरगोश, टोमी कुत्ता आदि जानवर पढ़ते थे।
मोनू बंदर स्कूल से आकर कुछ समय खेलता और फिर शाम को खाना खाकर पढ़ने बैठ जाता। वह विद्यालय से दिया गया गृह कार्य पूरा करता। यदि गृह कार्य न भी होता तो वह अपनी भाषा सुधारने के लिए एक पृष्ठ लिखता या कुछ सवाल हल करता।
लेकिन रोमी हिरण को घर आकर बस खेल ही खेल सूझता। वह खाना खाकर कोई न कोई बहाना बना कर से सो जाता। फिर सुबह उठकर मोनू बंदर की कॉपी मांग कर बिना सोचे-समझे नकल कर लेता।
मोनू बंदर ने रोमी हिरण से कई बार कहा, ‘तुम भी तो कुछ काम स्वयं किया करो। नकल करके तुम खुद अपने साथ धोखा कर रहे हो। ’
इस पर रोमी हिरण उस पर नाराज हो जाता।
वार्षिक परीक्षा में कुछ ही दिन शेष थे। रोमी के पिताजी सिब्बू हिरण उसे डांटते। पढ़ने के लिए कहते। डर के मारे रोमी हिरण पुस्तक लेकर बैठता। पर साल भर की पढ़ाई पंद्रह दिनों में कैसे पूरी होती?
रोमी हिरण, मोनू बंदर के पास आया और सभी विषयों के खास-खास प्रश्नों पर निशान लगा कर ले गया। लेकिन वह ये प्रश्न भी याद नहीं कर पाया। इतने कम समय में वह इतने सारे विषयों के प्रश्न कैसे याद कर सकता था।
अब रोमी हिरण ने कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर बारीक-बारीक अक्षरों में प्रश्नों के उत्तर लिख लिए और नकल करने के इरादे से निश्चिंत हो गया।
सब से पहले हिंदी का प्रश्न था। उससे संबंधित सभी नकल के टुकड़े लेकर रोमी हिरण परीक्षा कक्ष में जाकर बैठ गया।
प्रश्न- पत्र बांटे गए। मोनू बंदर ने प्रश्न- पत्र देखा तो वह खुश हो गया। जो प्रश्न उसने अच्छी तरह याद किए थे वे ही प्रश्न-पत्र में पूछे गए थे।
उधर रोमी हिरण को पसीना छूटने लगा। नकल करने के लिए टुकड़े निकालने की हिम्मत ही न पड़ी। उसके पास ही परीक्षक के रुप में बेजू बंदर खड़ा था। अब वह क्या करे? चुनमुन चिडिया ध्यान दे रही थी कि कोई विद्यार्थी नकल न करें।
घबरा कर पहले तो पूरा प्रश्न-पत्र ही उत्तर पुस्तिका पर उतार लिया। फिर उसने सब प्रश्नों के अंट-शंट उत्तर लिखने शुरू कर दिए।
परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। मोनू बंदर प्रथम श्रेणी में पास हुआ था। कक्षा में भी उसका स्थान पहला रहा था। बंटी घोड़ा, लम्पू लोमड़ी, जग्गू हाथी आदि जानवर भी पास हो गए थे। पर रोमी हिरण व उसके कुछ साथी जानवर फेल हो गए थे।
एक दिन जंगल विद्यालय के प्रधनाध्यापक जंबू भालू ने सभी छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ अर्थात निरंतर अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान हो जाता है। इसलिए आप यदि पूरे साल मन लगा कर पढ़ें तो निश्चित ही सफल होंगे। अब जो छात्र अनुतीर्ण हो गए। वे दु:खी न हों बल्कि पूरे साल मन लगा कर पढ़ने की प्रतिज्ञा करें और अपना भविष्य उज्ज्वल बनाएं।
रोमी हिरण ने भी यह सब सुना। उसने भी दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब नकल से नहीं अक्ल से काम लेना चाहिए और वह पूरे मन से पढ़ाई में लग गया।
इस वर्ष रोमी हिरण ने खूब मेहनत की। वह बहुत खुश था। पढ़ाई में उसे आनंद आने लगा। वह पूरा मन लगा कर पढ़ाई कर रहा था। परीक्षा परिणाम आया तो वह प्रथम श्रेणी में पास हुआ।

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