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८ नवम्बर को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ५०० और १०००रु. के नोटों को प्रचलन से रद्द कर दिया। इस विमुद्रीकरण से देश भर में बड़ा हो-हल्ला हो गया। स्वाभाविक रूप से विपक्ष को संसद में हंगामा करने का एक नया मुद्दा हाथ लग गया। इससे संसद चलने न देने का पारम्परिक राजनीतिक कार्यक्रम भारतीय जनता को अनुभव करना पड़ा। वाजपेयी जी की सरकार के समय कांग्रेस ने जो परम्परा आरंभ की थी वह पिछले अनेक वर्षों से चल ही रही है। उसमें सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के नाम भर बदल गए हैं। अंतर तो बस इतना ही दिखाई दे रहा है। फलस्वरूप संसद के महत्वपूर्ण दिन बर्बाद हो रहे हैं। सब से कम काम करने वाली संसद का धब्बा जनता द्वारा निर्वाचित संसद पर लग रहा है।
१६ नवम्बर को संसद का शीत सत्र आरंभ हुआ। लेकिन नोटबंदी के मुद्दे पर हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों में कोई कामकाज नहीं हो सका। माह भर में लोकसभा में केवल १९ घंटे काम हुआ। अधिवेशन काल में ४४० तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन उनमें से केवल ५० प्रश्नों के ही उत्तर दिए जा सके। अधिवेशन के दौरान सदन में १० विधेयक प्रस्तुत किए गए, लेकिन उनमें से केवल दो ही विधेयक पारित हो सके। राज्यसभा में भी इससे अलग दृश्य नहीं था। संसद में फिलहाल अनेक महत्वपूर्ण विषयों के विधेयक धूल चाटते पड़े हैं। संसद में कोई भी विधेयक अनेक मार्गों से और काफी परिश्रम के बाद पहुंचते हैं। यह ध्यान में रखे तो हम अनुमान लगा सकते हैं कि संसद ठप कर देने से या वहां कोई भी कामकाज न होने देने से किस तरह बड़े पैमाने पर श्रम और ऊर्जा की बर्बादी हो रही है।
संसद की गरिमा, उसकी महान परम्पराओं एवं सर्वोच्चता की रक्षा करना किसी एक दल की जिम्मेदारी नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल व विपक्ष दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है। सदन में चर्चा, बहस और विचार मंथन की बातें अब धीरे-धीरे लोप होती जा रही हैं और विचारों का स्थान अब हंगामे ने ले लिया है। संसद में कानून और नीतियां बनाने का काम होना चाहिए। किन्तु नियम और नीतियां निर्धारित करने में रोड़ा डालना ही अधिक मात्रा में दिखाई दे रहा है।
संसद के शीत सत्र में माह भर में कोई कामकाज नहीं हुआ। नोटबंदी के निर्णय से संसद ठप पड़ गई। नोटबंदी पर स्थगन प्रस्ताव को लेकर विपक्ष की मतदान की मांग के कारण लोकसभा नहीं चल पाई। राज्यसभा जारी रही, लेकिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की बहस के दौरान पूरे समय उपस्थिति का आग्रह कर विपक्ष ने सदन के कामकाज में अडंगा लगा दिया। संसद के पूरे अधिवेशन के दौरान यही दृश्य था। दूसरी ओर राहुल गांधी ने मोदी जी को चुनौती देते हुए कहा, ‘‘लोकसभा में मेरे बोलते ही भूचाल आ जाएगा। मेरे पास मोदी के विरोध में भ्रष्टाचार के सबूत हैं। ’’ लेकिन हमेशा बचकानी हरकतें कर अपनी ओर ध्यान खींचने वाले राहुल जी की गर्जना खोखली ही साबित हुई। नोटबंदी के कारण देश में अराजकता पैदा हो गई है यह यदि कांग्रेस का आरोप हो तो प्रश्न यह है कि देश के सर्वोच्च मंच संसद में सरकार को परास्त करने का अवसर कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने क्यों गंवाया? नोटबंदी की घोषणा होते ही कांग्रेस, आप, तृणमूल कांग्रेस के साथ अन्य विपक्षी दलों की जो उछलकूद भारतीय जनता ने देखी उसमें भ्रष्टाचार, काला धन खत्म करने की अपेक्षा ‘मोदी हटाओ’ की तीव्रता ही अधिक दिखाई दे रही थी। प्रत्यक्ष में संसद के दोनों सदनों में कामकाज न चलने देना उनके लिए सहायक ही साबित होने वाला है। सदन का कामकाज न चलने देना, उसका दोष सरकार पर मढ़ना और सदन के बाहर आते ही संसदीय कार्यप्रणाली की वाहवाही करना इस तरह विपक्ष दोमुंही बातें कर रहा है।
वीरता का आवेश दिखाकर ‘भूचाल’ की घोषणा करने वाले राहुल गांधी की कांग्रेस, ‘मोदी हटाओ’ का सपना देखने वाली केजरीवाल की आप पार्टी, चिटफंड के जरिए हथियाए नोट व्यर्थ होने से जलने वाली तृणमूल कांग्रेस को चर्चा में या कुल मिलाकर संसदीय कामकाज में कोई रुचि नहीं है। उनकी छटपटाहट यही है कि संसद में ऐसे सनसनीपूर्ण आरोप किए जाए कि दूसरे दिन मीडिया में उसकी सुर्खियां बने। चुने गए इन सांसदों का यही एकमात्र इरादा दिखाई देता है। उन्हें लगता है चटपटी खबर हो तो वे जिंदा रहते हैं। अच्छा अध्ययनपूर्ण विश्लेषण, महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोरदार चर्चा एवं बहस, विधेयक पर तर्कपूर्ण भाष्य कभी खबर का विषय बनता था, लेकिन वर्तमान में अधिकाधिक ध्यान अराजकता, तमाशा और बचकानी घोषणाओं पर केंद्रित हो गया है।
चैनलों पर ये तमाशे ही उनकी टीआरपी रेटिंग बढ़ाते हैं। गंभीर चर्चा का ‘खबर मूल्य’ लोप हो जाने से शायद यह स्थिति उत्पन्न हो गई हो। विरोधियों के पास निष्णात वक्ता नहीं हैं। संसदीय चर्चा टालने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है। नोटबंदी का निर्णय बाद में देश भर में अनुभव की जा रही व्यवस्था की खामियों पर संसद का फोकस रखने के बजाए हंगामे पर रखने की साजिश विरोधियों ने रची और सम्पूर्ण शीत सत्र बलि चढ़ गया। अन्यथा विशेष हस्तक्षेप न करने वाले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हंगामा करने वाले सांसदों को फटकारना पड़ा। विरोधी सांसदों के बर्ताव के प्रति रोष प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि विरोधियों का व्यवहार बहुसंख्यकों की आवाज दबाने वाला है। संसद के सदन धरना देने के लिए नहीं होते। संसद में लोगों ने सांसदों को बोलने के लिए भेजा है, संसद ठप करने के लिए नहीं।
संसद न चलने देने की ओछी राजनीति भारतीय राजनीति का एक दुर्गुण है। संसद में देश के वर्तमान एवं भविष्य के बारे में अनेक योजनाएं चर्चा के लिए आती हैं। २००८ से आज तक संसद में सदासर्वदा हंगामा ही होता रहा है। यह एक परम्परा ही बन रही है। अब समय आ गया है कि मतदाता अपने सांसदों से जवाब तलब करें। यदि इन सांसदों को मतदाताओं की जरा भी चिंता या भय न हो तो यह चित्र बदलने का अपने अधिकार मतदाताओं को इस्तेमाल करना चाहिए।

नवम्बर को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने ५०० और १०००रु. के नोटों को प्रचलन से रद्द कर दिया। इस विमुद्रीकरण से देश भर में बड़ा हो-हल्ला हो गया। स्वाभाविक रूप से विपक्ष को संसद में हंगामा करने का एक नया मुद्दा हाथ लग गया। इससे संसद चलने न देने का पारम्परिक राजनीतिक कार्यक्रम भारतीय जनता को अनुभव करना पड़ा। वाजपेयी जी की सरकार के समय कांग्रेस ने जो परम्परा आरंभ की थी वह पिछले अनेक वर्षों से चल ही रही है। उसमें सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के नाम भर बदल गए हैं। अंतर तो बस इतना ही दिखाई दे रहा है। फलस्वरूप संसद के महत्वपूर्ण दिन बर्बाद हो रहे हैं। सब से कम काम करने वाली संसद का धब्बा जनता द्वारा निर्वाचित संसद पर लग रहा है।
१६ नवम्बर को संसद का शीत सत्र आरंभ हुआ। लेकिन नोटबंदी के मुद्दे पर हंगामे के कारण संसद के दोनों सदनों में कोई कामकाज नहीं हो सका। माह भर में लोकसभा में केवल १९ घंटे काम हुआ। अधिवेशन काल में ४४० तारांकित प्रश्न सूचीबद्ध थे, लेकिन उनमें से केवल ५० प्रश्नों के ही उत्तर दिए जा सके। अधिवेशन के दौरान सदन में १० विधेयक प्रस्तुत किए गए, लेकिन उनमें से केवल दो ही विधेयक पारित हो सके। राज्यसभा में भी इससे अलग दृश्य नहीं था। संसद में फिलहाल अनेक महत्वपूर्ण विषयों के विधेयक धूल चाटते पड़े हैं। संसद में कोई भी विधेयक अनेक मार्गों से और काफी परिश्रम के बाद पहुंचते हैं। यह ध्यान में रखे तो हम अनुमान लगा सकते हैं कि संसद ठप कर देने से या वहां कोई भी कामकाज न होने देने से किस तरह बड़े पैमाने पर श्रम और ऊर्जा की बर्बादी हो रही है।
संसद की गरिमा, उसकी महान परम्पराओं एवं सर्वोच्चता की रक्षा करना किसी एक दल की जिम्मेदारी नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल व विपक्ष दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी है। सदन में चर्चा, बहस और विचार मंथन की बातें अब धीरे-धीरे लोप होती जा रही हैं और विचारों का स्थान अब हंगामे ने ले लिया है। संसद में कानून और नीतियां बनाने का काम होना चाहिए। किन्तु नियम और नीतियां निर्धारित करने में रोड़ा डालना ही अधिक मात्रा में दिखाई दे रहा है।
संसद के शीत सत्र में माह भर में कोई कामकाज नहीं हुआ। नोटबंदी के निर्णय से संसद ठप पड़ गई। नोटबंदी पर स्थगन प्रस्ताव को लेकर विपक्ष की मतदान की मांग के कारण लोकसभा नहीं चल पाई। राज्यसभा जारी रही, लेकिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की बहस के दौरान पूरे समय उपस्थिति का आग्रह कर विपक्ष ने सदन के कामकाज में अडंगा लगा दिया। संसद के पूरे अधिवेशन के दौरान यही दृश्य था। दूसरी ओर राहुल गांधी ने मोदी जी को चुनौती देते हुए कहा, ‘‘लोकसभा में मेरे बोलते ही भूचाल आ जाएगा। मेरे पास मोदी के विरोध में भ्रष्टाचार के सबूत हैंै। ’’ लेकिन हमेशा बचकानी हरकतें कर अपनी ओर ध्यान खींचने वाले राहुल जी की गर्जना खोखली ही साबित हुई। नोटबंदी के कारण देश में अराजकता पैदा हो गई है यह यदि कांग्रेस का आरोप हो तो प्रश्न यह है कि देश के सर्वोच्च मंच संसद में सरकार को परास्त करने का अवसर कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने क्यों गंवाया? नोटबंदी की घोषणा होते ही कांग्रेस, आप, तृणमूल कांग्रेस के साथ अन्य विपक्षी दलों की जो उछलकूद भारतीय जनता ने देखी उसमें भ्रष्टाचार, काला धन खत्म करने की अपेक्षा ‘मोदी हटाओ’ की तीव्रता ही अधिक दिखाई दे रही थी। प्रत्यक्ष में संसद के दोनों सदनों में कामकाज न चलने देना उनके लिए सहायक ही साबित होने वाला है। सदन का कामकाज न चलने देना, उसका दोष सरकार पर मढ़ना और सदन के बाहर आते ही संसदीय कार्यप्रणाली की वाहवाही करना इस तरह विपक्ष दोमुंही बातें कर रहा है।
वीरता का आवेश दिखाकर ‘भूचाल’ की घोषणा करने वाले राहुल गांधी की कांग्रेस, ‘मोदी हटाओ’ का सपना देखने वाली केजरीवाल की आप पार्टी, चिटफंड के जरिए हथियाए नोट व्यर्थ होने से जलने वाली तृणमूल कांग्रेस को चर्चा में या कुल मिलाकर संसदीय कामकाज में कोई रुचि नहीं है। उनकी छटपटाहट यही है कि संसद में ऐसे सनसनीपूर्ण आरोप किए जाए कि दूसरे दिन मीडिया में उसकी सुर्खियां बने। चुने गए इन सांसदों का यही एकमात्र इरादा दिखाई देता है। उन्हें लगता है चटपटी खबर हो तो वे जिंदा रहते हैं। अच्छा अध्ययनपूर्ण विश्लेषण, महत्वपूर्ण मुद्दों पर जोरदार चर्चा एवं बहस, विधेयक पर तर्कपूर्ण भाष्य कभी खबर का विषय बनता था, लेकिन वर्तमान में अधिकाधिक ध्यान अराजकता, तमाशा और बचकानी घोषणाओं पर केंद्रित हो गया है।
चैनलों पर ये तमाशे ही उनकी टीआरपी रेटिंग बढ़ाते हैं। गंभीर चर्चा का ‘खबर मूल्य’ लोप हो जाने से शायद यह स्थिति उत्पन्न हो गई हो। विरोधियों के पास निष्णात वक्ता नहीं हैं। संसदीय चर्चा टालने के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है। नोटबंदी का निर्णय बाद में देश भर में अनुभव की जा रही व्यवस्था की खामियों पर संसद का फोकस रखने के बजाए हंगामे पर रखने की साजिश विरोधियों ने रची और सम्पूर्ण शीत सत्र बलि चढ़ गया। अन्यथा विशेष हस्तक्षेप न करने वाले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हंगामा करने वाले सांसदों को फटकारना पड़ा। विरोधी सांसदों के बर्ताव के प्रति रोष प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि विरोधियों का व्यवहार बहुसंख्यकों की आवाज दबाने वाला है। संसद के सदन धरना देने के लिए नहीं होते। संसद में लोगों ने सांसदों को बोलने के लिए भेजा है, संसद ठप करने के लिए नहीं।
संसद न चलने देने की ओछी राजनीति भारतीय राजनीति का एक दुर्गुण है। संसद में देश के वर्तमान एवं भविष्य के बारे में अनेक योजनाएं चर्चा के लिए आती हैं। २००८ से आज तक संसद में सदासर्वदा हंगामा ही होता रहा है। यह एक परम्परा ही बन रही है। अब समय आ गया है कि मतदाता अपने सांसदों से जवाब तलब करें। यदि इन सांसदों को मतदाताओं की जरा भी चिंता या भय न हो तो यह चित्र बदलने का अपने अधिकार मतदाताओं को इस्तेमाल करना चाहिए।

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