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भारतीय अकादमिक जगत स्थापित मान्यताओं और छवियों के चहुंओर चक्कर लगाने की अक्षमता से पीड़ित रहा है। इस क्षेत्र में नवीनता और नवाचार के लिए आवश्यक दृष्टि तथा स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने के लिए जरूरी साहस की कमी को भारी-भरकम शब्दों के जरिए ढांपने का चलन रहा है। डॉ. कुलदीप चंद अग्रिहोत्री की किताब ’जम्मू- कश्मीर के जननायक: महाराजा हरि सिंह’ शोध जगत की इन जड़ भंगिमाओं को भंंग करने के सामर्थ्य के साथ प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक में महाराजा हरि सिंह के बारे में प्रचलित ’अधकचरी अवधारणाओं’ को शोध का आधार बनाने के बजाय तथ्यों के आधार पर उनका आकलन करने की कोशिश की गई है। इसके कारण हरि सिंह के व्यक्तित्व और भूमिका को एक सकारात्मक कलेवर मिल जाता है।
हरि सिंह के बारे में अधकचरी अवधारणाओं की खिचड़ी चढ़ाने-पकाने के कारणों के बारे में किताब की भूमिका में ही रोचक टिप्पणी मिल जाती है-’हर युग का इतिहास साक्षी है कि जब सत्य का सामना करना मुश्किल हो जाता है तो उससे बचने के लिए किसी-न-किसी को सलीब पर लटकाना अनिवार्य हो जाता है ताकि भविष्य में इतिहास के प्रश्रों का उत्तर दिया सके। १९४७ में जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा था, उसका उत्तरदायी ठहराने के लिए हरि सिंह से आसान शिकार कौन हो सकता है?’’
दस्तावेजी साक्ष्य न होने के कारण महाराजा हरि सिंह के कुछ निर्णयों की व्याख्या अभी तक कल्पनाओं का सहारा लेकर की जाती रही है। भारत विलय के बारे में उनके रुख के संदर्भ में तो कल्पनाएंं इस हद तक दौड़ाई गई हैं कि उन्होंने किस्सों का रूप धारण कर लिया है। तीन हिस्सों और बारह अध्यायों में विभक्त इस किताब की एक बड़ी खूबी यह है कि इसमें हरि सिंह की मानसिक बुनावट को पकड़ने की कोशिश की गई है। संभवत: इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मनोविज्ञान समझ लेने के बाद व्यक्ति द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों के बारे में सटीक आकलन करना सहज हो जाता है।
किताब के प्रथम खंड में उस ऐतिहासिक और पारिवारिक परिवेश को समझने की कोशिश की गई है, जिसमें हरिसिंह जन्मे और उनका पालन-पोषण हुआ। इसी हिस्से में ऐसे सूत्र मिल जाते हैं, जिनसे महाराजा हरि सिंह के बारे में किए गए दुष्प्रचार की चादर को तार-तार किया जा सकता है। हरि सिंह से संबंधित अध्ययनों की एक खामी यह रही है कि उनकी छवि, शेख अब्दुल्ला को आधार मान कर बनाई-बिगाड़ी गई है। ऐसे में यदि शेख अब्दुल्ला के इरादों और निर्णयों को ठीक से पहचानने का काम हो जाए तो इससे हरि सिंह के बारे में भी ठीक निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता मिल सकती है। किताब में शेख अब्दुल्ला की ठीक ढंग से पड़ताल की गई है और संभावना के अनुरूप यह पड़ताल हरि सिंह के बारे में नए निष्कर्षों तक पहुंचाती है।
अपने अंतिम छोर पर यह किताब जिन निष्कर्षों तक पहुंचती है, वह न केवल नए हैं बल्कि स्थापित छवियों से कुछ हद तक विपरीत भी हैं- इसे महाराजा हरि सिंह की महानता ही मानना होगा कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू- कश्मीर पर चल रही बहस से लेकर जीवन के अंमित दिनों तक व्यक्तिगत मान – अपमान की चिंता न करते हुए, राष्ट्रीय हित के लिए मौन रहना ही श्रेयस्कर समझा। ….हरि सिंह ने यह सार जहर स्वयं पिया और चुपचाप इस संसार को अलविदा कह दिया। (पृष्ठ २६०)
यह पुस्तक महाराजा हरि सिंह के अनछुए उज्ज्वल पक्ष से हमारा परिचय तो कराती ही है, इसके अतिरिक्त, भारतीय इतिहास के विकृत स्वरूप को जानने और अकादमिक षड्यंत्रों को समझने के लिए एक आदर्श ‘सैंपल’ बन कर भी हमारे सामने आती है।

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