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८ नवम्बर २०१६ को केन्द्र सरकार ने विमुद्रीकरण का फैसला किया एवं उसी दिन मध्यरात्रि से रु.५०० एवं १००० के नोटों को रद्द कर दिया। ग्रामीण जनता को सेवा देने वाले सहकारी बैंकों को नोटों को बदलने की सुविधा की व्यवस्था से वंचित कर दिया गया। इसके कारण सहकारी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के तर्क-वितर्कों का उफान आ गया।

वर्तमान में आर्थिक क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन का सहकारी क्षेत्र पर प्रभाव व उसके कारण सामान्य जनता को होने वाली कठिनाइयों का अंतर्मुख होकर विचार करना चाहिए। रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार जिला सहकारी बैंकों, प्राथमिक कृषि सहकारी संस्थाओं एवं नागरिक सहकारी बैंकों को ग्राहकों से पुराने ५०० एवं १००० के नोट बदलने की व्यवस्था से दूर रखे गए हैं। काले धन को अवैध रूप से सफेद करने में इन सहकारी बैंकों एवं संस्थाओं का उपयोग हो सकता है इस डर के कारण नोट बदलने के इस महत्वपूर्ण निर्णय में सहकार क्षेत्र को अलग रखना आश्चर्य की बात है। यह निर्णय भविष्य में सहकारी आंदोलन की प्रगति में रोड़ा साबित हो सकता है एवं सामान्य नागरिकों के मन में इस आंदोलन के प्रति आशंका निर्माण करने वाला साबित हो सकता है।

कृषि प्रधान देश की पहचान रखने वाले भारत में सहकारिता तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। १२० वर्ष पूर्व प्रारंभ और आज भी इतने दीर्घकाल से सतत काम करने वाला सहकारी क्षेत्र अपने देश में शायद एकमात्र रचनात्मक आंदोलन है। सर्वसामान्य किसान एवं ग्रामीणों के जीवन में सामाजिक एवं आर्थिक क्रांति करते हुए उनका जीवन स्तर उठाने वाला यह आंदोलन है। देश में विशेषकर महाराष्ट्र, गुजरात, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, पंजाब एवं तामिलनाडु में सहकारिता क्षेत्र मजबूत अवस्था में है। नाबार्ड के अनुसार देश के अति दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां सरकारी बैंकों की पहुंच नहीं है, वहां सहकारी बैंकों के जाल के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। अभी भी कई गांवों से राष्ट्रीयकृत बैंकों की दूरी ५० से ६० किलोमीटर तक है। इस स्थिति में केवल अपने नोट बदलवाने हेतु इतना बड़ा अंतर पार करना ग्रामीण जनता पर आर्थिक व आवागमन के साधनों की दृष्टि से अन्याय प्रतीत होता है।

खरीफ की फसल आ गई है। रब्बी फसल की बुआई आरंभ होने को है। इसके लिए लगने वाले धन की व्यवस्था किस प्रकार हो यह चिंता किसानों एवं सहकारी बैंकों को सता रही है। सामान्य समय में सहकारी बैंक एवं राष्ट्रीयकृत बैंकों को समान अधिकार दिए गए लेकिन संकट के समय ये सारे अधिकार छीन लिए गए। सहकारी बैंकों एवं जिला सहकारी बैंकों के माध्यम से नोट बदलने की सुविधा प्रदान नहीं की गई। जहां शहरों में राष्ट्रीयकृत एवं अन्य निजी बैंकों के सामने नोट बदलने के लिए कतारें लग रही हैं, वहीं देश के एक बड़े बैंकिंग क्षेत्र अर्थात सहकारी बैंकों को इस से दूर रखा गया है। सरकारी क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों पर पड़ने वाले काम के बोझ को देखते हुए सहकारी क्षेत्र को अलग रखना समझ में आने लायक नहीं है।
सरकार द्वारा उठाया गया नोटबंदी का कदम आक्रामक है, उसका उद्देश्य अच्छा है। भविष्य में उसके दूरगामी परिणाम भी दिखेंगे। परंतु इस निर्णय को अमल में लाते समय गांव की जनता का गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता थी। इस योजना में सहकारी क्षेत्र को शामिल न करने से ग्रामीण क्षेत्रों में यह भावना बलवती होती जा रही है कि सरकार ने सहकारी क्षेत्र पर अन्याय किया है। जन-धन योजना के अंतर्गत गांवों के हजारों लोगों के खाते खुलवा कर सरकार ने उन्हें सहकारी बैंकों के माध्यम से बैंकिंग क्षेत्र में सहभागी किया है। गांवों की अर्थव्यवस्था में सहकारी बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण कृषि, ग्रामीण उद्योग, लघु उद्योग क्षेत्र में होने वाला रोजगार सृजन लक्षणीय है और उसके कारण देश की आर्थिक प्रगति की योजना बनाते समय सहकारिता क्षेत्र को प्रमुखता दी गई है। इस कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाले सहकारी क्षेत्र को केवल आशंका की वजह से आरोपी के पिंजड़े में खड़ा करना लाखों सामान्य जनों को बंधक बनाने जैसा है। सर्वसामान्य ग्रामीण जनों का ख्याल न रखते हुए यह निर्णय लिया गया है ऐसा कहना पड़ेगा। सहकारी बैंकों को इस पूरी प्रक्रिया के दौरान इसलिए अलग रखा गया था क्योंकि यह आशंका जताई जा रही थी कि इन बैंकों से अवैध रूप से नोटों के बदलने की प्रक्रिया होगी। परंतु अभी राष्ट्रीयकृत और बड़े निजी बैंकों के कारनामों को देखकर ऐसा लगता है कि सरकार के भरोसेमंद बैंक ही उसके भरोसे को तोड रहे हैं। केरल के सहकारी बैंकों की उच्च न्यायालय में की गई मांग कि ‘हमसे अन्य बैंकों के समान ही बर्ताव किया जाए’ बहुत कुछ बयां करती है।

१२० वर्षों पूर्व भारत में सहकारिता का जन्म हुआ। सहकारी आंदोलन को आकार मिला। सहकारिता की भावना लोगों के मन में बस गई एवं बढ़ी। अब यह क्षेत्र काफी तेजी से बढ़ रहा है। इसका कारण सहकारिता में मानवीय मूल्यों का रक्षण, परस्पर सौहाद्र की भावना, अपनत्व, बंधुभाव एवं समाज की समरसता इन तत्वों का समावेश है। परंतु काल के प्रवाह में सहकारिता के क्षेत्र में इन तत्वों की अनदेखी होकर राजनीतिक वर्चस्व प्रस्थापित करने हेतु नकारात्मक तत्वों का आविर्भाव हो रहा है। अधिकतम व्यक्तिगत लाभ हेतु इन नकारात्मक तत्वों का बेलगाम उपयोग किया जा रहा है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा व राजनीतिक वर्चस्व प्रस्थापित करने हेतु सहकारिता के क्षेत्र में सहकारिता के मूल तत्वों को उखाड़ फेंकने वाली प्रस्थापितों की नई पीढ़ी तैयार हो गई है। इसके कारण उन पर अंकुश रखने वाले कानून व नियम बनाते समय ‘सहकारिता’ अबाधित रहे इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा ऐसी भावना जनमानस में निर्माण हो रही है। सरकार के इस निर्णय का सहकारी क्षेत्र पर दूरगामी परिणाम होगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता। सहकारिता की रीढ़ यदि तोड़ दी गई तो इसका देश की ग्रामीण व नागरी अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ने की संभावना बनी रहेगी। सामाजिक आंदोलन के अंत होने का खतरा निर्माण होगा एवं उसके कारण सामाजिक बंधुत्व की गांठ भी ढ़ीली होने की संभावना भी बनी रहेगी। सहकारी बैंकों में प्रस्थापित राजनीतिक नेताओं की कारगुजारियों को देखते हुए इन बैंकों के नियम व कानूनों में बदलाव जरूर अपेक्षित है। स्वार्थी संचालकों पर नियंत्रण कठोर हो ऐसे नियम-कानून बनने चाहिए। परंतु इसके साथ ही सहकारिता की भावना का लोप न हो इसका विचार हमेशा होना चाहिए। गत १२० वर्षों में जिन श्रेष्ठ पुरुषों ने यह भावना सजाई-संवारी उन सब ने सामाजिक एकता व समाज के सामान्य जनों की आर्थिक प्रगति में समानता यह मूलमंत्र आंखों के सामने रखा था। देश एवं राज्यों के आर्थिक नियोजन में सहकारी क्षेत्र का हिस्सा बहुत बड़ा है। देश की पहली पंचवार्षिक योजना में नीतिगम फैसला था कि प्रत्येक गांव में एक शाला, एक पंचायत और एक सहकारी संस्था होनी चाहिए। परंतु वर्तमान काल में सहकारिता क्षेत्र संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक तरह से सहकारिता अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सहकार का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करने वाले कुछ मुट्ठीभर प्रस्थापित लोग एवं इस कारण इस क्षेत्र पर कठोर निर्णय लादने वाला रिजर्व बैंक इन दो पाटों के बीच ‘सहकारिता’ पिस रही है। इस परिस्थिति में सहकारी क्षेत्र में लगी हुई इस घुन को निकालने के सार्थक प्रयास सरकार को करना चाहिए। सहकारिता को सकारात्मक रूप दें, परंतु सहकारिता के मूल तत्व न बदलें इसकी चिंता करने की आवश्यकता है।

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