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हमारी मातृभूमि भारत लंबे समय तक ब्रिटीश शासन की गुलाम रही जिसके दौरान भारतीय लोग ब्रिटीश शासन द्वारा बनाये गये कानूनों को मानने के लिये मजबूर थे, भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा लंबे संघर्ष के बाद अंतत: 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली। लगभग ढाई साल बाद भारत ने अपना संविधान लागू किया और खुद को लोकतांत्रिक गणराज्य के रुप में घोषित किया। लगभग 2 साल 11 महीने और 18 दिनों के बाद 26 जनवरी 1950 को हमारी संसद द्वारा भारतीय संविधान को पास किया गया। खुद को संप्रभु, लोकतांत्रिक, गणराज्य घोषित करने के साथ ही भारत के लोगों द्वारा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाया जाने लगा।

आज अनायास ही हमारा ध्यान गणतंत्र की स्थापना से लेकर ‘क्या पाया, क्या खोया’ के लेखे-जोखे की तरफ खिंचने लगता है। इस ऐतिहासिक अवसर को हमने मात्र आयोजनात्मक स्वरूप दिया है, अब इसे प्रयोजनात्मक स्वरूप दिये जाने की जरूरत है। इस दिन हर भारतीय को अपने देश में शांति, सौहार्द और विकास के लिये संकल्पित होना चाहिए। कर्तव्य-पालन के प्रति सतत जागरूकता से ही हम अपने अधिकारों को निरापद रखने वाले गणतंत्र का पर्व सार्थक रूप में मना सकेंगे। और तभी लोकतंत्र और संविधान को बचाए रखने का हमारा संकल्प साकार होगा। क्योंकि गणतंत्र के सूरज को राजनीतिक अपराधों, घोटालों और भ्रष्टाचार के बादलों ने घेर रखा है। हमने जिस संपूर्ण संविधान को स्वीकार किया है, उसमें कहा है कि हम एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

एक राष्ट्र के रूप में आज से 68 साल पहले हमने कुछ संकल्प लिए थे जो हमारे संविधान और उसकी प्रस्तावना के रूप में आज भी हमारी अमूल्य धरोहर है। संकल्प था एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, समतामूलक और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का जिसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार होगा। नागरिक के इन ‘मूल अधिकारों’ में समता का अधिकार, संस्कृति का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार तथा सांविधानिक उपचारों का अधिकार उल्लिखित हैं। अपने मूल अधिकारों की रक्षा और इनको नियंत्रित करने की विधियां भी संविधान में स्पष्ट हैं। इनके लिये हमारे संकल्प हमारी राष्ट्रीय अस्मिता की पहचान हैं जिन्हें हम हर वर्ष 26 जनवरी को एक भव्य समारोह के रूप में दोहराते हैं।

परंतु हमारे इन संकल्पों में बहुत कुछ आज भी आधे-अधूरे सपनों की तरह हैं। भूख, गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, सांप्रदायिक वैमनस्य, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तमाम क्षेत्र हैं जिनमे हम आज भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर पाए हैं। आज हमारी समस्या यह है कि हमारी ज्यादातर प्रतिबद्धताएं व्यापक न होकर संकीर्ण होती जा रही हैं जो कि राष्ट्रहित के खिलाफ हैं। राजनैतिक मतभेद भी नीतिगत न रह कर व्यक्तिगत होते जा रहे हैं। नतीजन, लोकतांत्रिक परम्पराओं की दुहाई देते हुए भ्रष्टाचार एवं कालेधन जैसे गंभीर मुद्दों पर नियंत्रण के लिये की गयी नोटबंदी भी सकारात्मक रूप नहीं ले पायी।

आज देश में राष्ट्रीय एकता, सर्वधर्मसमभाव, संगठन और आपसी निष्पक्ष सहभागिता की जरूरत है। क्योंकि देश के करोड़ों गरीब उस आखिरी दिन की प्रतीक्षा में हैं जब सचमुच वे संविधान के अन्तर्गत समानता एवं सन्तुलन के अहसास को जी सकेंगे। उन्हें साधन उपलब्ध कराए जाएंगे, क्योंकि देश की गरीबी अभिशाप होती है। और सच भी यही है कि अमीरी और गरीबी के फासले ही नैतिक फैसले नहीं होने देते। गरीब अपना हक, न्याय पाने के लिए बैसाखियों को ढूंढता रह जाता है और अमीरों की विरासत रातों-रात अपना खेल कर जाती है। भ्रष्टाचार के काले कारनामों पर डाले गए ईमानदारी के मुखौटों को उतारने में सबूतों और गवाहों की खोज में इतना विलम्ब हो जाता है कि सच भी सवालों के घेरे में बंदी बनकर खड़ा रह जाता है।

गणतंत्र दिवस हमारी एकता एवं राष्ट्रीय भावना को और भी प्रगाढ़ बनाने के लिए प्रेरित करता है। संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य होने के महत्व को सम्मान देने के लिये मनाया जाने वाला यह राष्ट्रीय पर्व मात्र औपचारिकता बन कर न रह जाये, इस हेतु चिन्तन अपेक्षित है। इसके लिए जरूरी है कि एक राष्ट्र के रूप में हम इन संकल्पों को लगातार याद रखें और दोहराएं। यह पर्व हमारे शहीदों की अमर गाथाओं के माध्यम से हमें गौरवान्वित करता है और प्रेरणा देता है कि अपने देश के गौरव को बनाए रखने के लिए हम कृत संकल्प रहें तथा हर पल विकास की ओर अग्रसर रहें। समय, व्यक्ति की गरिमा, विश्व बंधुत्व, सर्वधर्म-समभाव, धर्मनिरपेक्षता गणतंत्र के मूलतत्व हैं। अपने गणतंत्र को फलता-फूलता देखने के लिए हमें इन्हें हृदय में धारण करना होगा। हमें किरण-किरण जोड़कर नया सूरज बनाना होगा।

 

 

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