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एक पेड़ की डाल पर दो कबूतर रहते थे। उनका नाम था सोनू और मोनू। दोनों गहरे दोस्त थे। उनकी दोस्ती की मिसाल पूरे जंगल में दी जाती थी किन्तु स्वभाव में दोनों एक-दूसरे के विपरीत थे।
एक ओर सोनू मेहनती था वहीं मोनू आलसी, कामकाज और मेहनत से जी चुराने वाला था। सोनू दिन-भर मेहनत कर अपनी रोजी-रोटी कमा कर जिन्दगी बसर करता था और सुख की नींद सोता था। वहीं मोनू दिनभर मटरगस्ती कर, इधर-उधर घूम-घामकर अपना दिन यूं ही बेकार में निकाल देता।
जो कुछ भी सोनू दिनभर में अपने लिए चुग्गा-दाना-पानी लेकर आता उसमें से थोड़ा-बहुत मांगकर मोनू अपना गुजर-बसर कर लेता। मेहनती सोनू बरसात आने से पहले तिनके इक्कठे करके अपने लिए एक खूबसूरत-सा घोंसला बना लेता। बरसात शुरू होने पर वह उसमें आराम से रहता। दूसरी ओर आलसी मोनू पेड़ की डाल पर बिना घोंसले के ही रात बिता देता। बरसात होने पर वह सोनू के घोंसले में ही घुस जाता।
जब भी सोनू अपने दोस्त मोनू को कहता कि वह भी अपने लिए एक सुन्दर-सा घोंसला बना ले ताकि वह सर्दी, बरसात से अपना बचाव कर सके तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता और बरसात आने से पहले हर बार की तरह खुशामद करके अपने दोस्त सोनू के घोंसले में घुस जाता।
इस तरह दोनों दोस्त अपनी जिन्दगी गुजार रहे थे। एक दिन उस पेड़ पर फिसी नाम की एक सुन्दर चिडिया रहने के लिए आई। सोनू और मोनू फिसी को पाकर बहुत खुश हुए। मृदुभाषी और व्यवहार कुशल फिसी बहुत जल्दी ही उनकी दोस्त बन गई।
फिसी ने यह महसूस किया कि मोनू के आलसीपन की सजा सोनू को भी भुगतनी पड़ रही है। हालांकि सोनू अपनी परेशानियों का जिक्र किसी के सामने नहीं करता था।
एक दिन फिसी और सोनू बातें कर रहे थे। चर्चा मोनू के आलसी व्यवहार पर चली। फिसी ने कहा- ‘इसमें मोनू का दोष कम और तुम्हारा अधिक है।’
‘वह कैसे?’ सोनू ने आश्चर्य से पूछा।
‘तुम्हीं ने तो उसकी आदत बिगाड़ी है। तुम उसे अपने खाने में से हिस्सा और अपने घोंसले में रहने की इजाजत ही क्यों देते हो ?’ फिसी चिडिया ने कहा।
‘अगर मैं उसे खाना नहीं दूंगा तो वह बेचारा भूखा मर जाएगा।’
‘कैसे मर जाएगा? क्या वह अपना खाना नहीं बटोर सकता ?’
‘बटोर तो सकता है।’ सोनू ने सिर झुकाकर कहा।
‘तो फिर तुम उसे खाना क्यों देते हो? क्यों तुम उसे अपने घोंसले में शरण देते हो? अगर तुम उसे खाना देना और उसका घोंसले में रहना बंद कर दोगे तो वह भूखा तो नहीं मरेगा ना! वह खुद मेहनत करके खाएगा और अपने रहने का बंदोबस्त भी करेगा।’ यह कहकर फिसी अपने लिए चुग्गा लेने उड़ गई।
सोनू कबूतर के दिमाग में फिसी की सारी बातें समझ में आ गई और उसने वैसा ही किया जैसा कि फिसी ने कहा था।
आलसी मोनू दो-तीन दिन तक तो बिना कुछ खाए-पिए खाने की उम्मीद में बैठा रहा, पर जब तीसरे दिन भी उसे कुछ खाने को नहीं मिला तो वह खुद खाने की तलाश में निकल पड़ा और शाम को खाना साथ लेकर ही वापस लौटा।
यह देखकर सोनू फिसी चिडिया की सूझ-बूझ पर बहुत खुश हुआ। इससे ज्यादा खुशी तो उसे अपने दोस्त की क्रियाशीलता पर हुई जिसने खुद मेहनत कर अपने लिए खाना जुटाया। अब सोनू अपने लिए जो भी खाना लाता, वह उसके लिए दो-तीन दिन आराम से चल जाता था।
बरसात का मौसम आने पर घोंसले के मामले में भी ऐसा ही हुआ। जब आलसी मोनू को इस बरसात में बिना घोंसले के दिन गुजारने पड़े तो अगले वर्षा के लिए उसने अभी से अपने लिए घोंसला बनाना शुरू कर दिया।
कुछ ही दिनों में उसका घोंसला बनकर तैयार भी हो गया। उसको यह बात समझ में आ गई कि खुद श्रम करने से ही खुद की समस्याएं हल हुआ करती हैं।
अब वह अपने लिए स्वयं भोजन जुटाता। बड़े मजे में खा-पीकर अपने नए घोंसले में आराम करता। अब उसे खाने और रहने के लिए किसी की खुशामद नहीं करनी पड़ती। उसकी मेहनत और काम के प्रति लगन देखकर सोनू और फिसी दोनों खुश थे। अब उन्हें लग रहा था कि हमारा दोस्त मेहनती बनकर अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था।
तब एक दिन फिसी चिडिया सोनू कबूतर से बोली- ‘देखो, भीख दे-देकर और बेवजह उसकी सहायता करके तुमने उसकी आदतें बिगाड़ दी थीं। वह तुम्हारा दोस्त है और दोस्त की मदद करना फर्ज है। लेकिन तुम्हें उसकी इतनी मदद भी नहीं करनी चाहिए थी कि वह आलसी और निखट्टू बना रहे।’ फिसी चिडिया ने अपनी बात पूरी करते हुए एक नई सीख दी। सोनू ने सहमति में सिर हिलाया और अपने घोंसले के लिए तिनके ढूंढने निकल पड़ा।

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