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अनेकता में एकता, सहिष्णुता, समानता एवं आस्था-विश्वास व सौहार्द के साथ भक्तिभाव के अद्भुत संगम का महापर्व है कुंभ। यह दुनिया का सबसे विराट मेला है और हमारे मनीषियों ने भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बांधने के लिए ही कुंभ की शुरुआत की है। इस बार का कुंभ प्रयागराज में इसी माह से आरंभ हो रहा है।

कुंभ का नाम सुनते ही देश-विदेश में फैले भारतीय स्वयं प्रेरणा एवं भक्तिभाव से खींचे चले आते हैं। कुंभ मेला दुनिया का एकमात्र ऐसा आयोजन है जिसमें बिना निमंत्रण ही करोड़ों-करोड़ों लोगों की लहर उमड़ने लगती है। हर हिंदू की यह प्रबल चाहत होती है कि जीवन में कम से कम एक बार कुंभ में जाकर वह स्वयं को कृतार्थ करें और ईश्वरी कृपा प्राप्त कर मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़े। कुंभ की यह विशेषता है कि यहां आने वाले प्रत्येक भक्तों को चमत्कारी रूप से ईश्वर की अनुभूति होती है, जिसके बाद वह स्वयं को हर बार कुंभ मेले में जाने से नहीं रोक पाता। कहते हैं कि कुंभ जाकर आने वाले जब लोगों से कुंभ के विषय में चर्चा करते हैं तब सभी इससे अभिभूत हो जाते हैं, सभी में भक्ति की ऊर्जा समाहित होती है। अवसर मिलते ही सभी लोग भक्तिभाव के साथ कुंभ में जाकर स्वयं की भक्ति पिपासा को तृप्त करते हैं। इसलिए कुंभ में करोड़ों की संख्या में भक्तगण आते है।

कुंभ और पौराणिक मान्यताएं

कुंभ का शाब्दिक अर्थ है कलश और इस कलश का संबंध अमृत कलश से है। इस संदर्भ में पौराणिक कथा प्रचलित है कि देवासुर संग्राम के बाद समुद्र मंथन करने पर देव-असुर सहमत हुए। समुद्र मंथन से प्राप्त सभी रत्नों को परस्पर बांट लिया गया परंतु अमृत कलश निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्रपुत्र जयंत अमृत कलश लेकर भाग खड़ा हुआ। दैत्य गुरू शुक्राचार्य के आदेश पर असुरों ने जयंत का पीछा करना शुरू किया और घोर परिश्रम के उपरांत बारहवें दिन उसे पकड़ लिया। इस दौरान जयंत द्वारा अमृत कलश लेकर भागते समय अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थान क्रमश प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक में गिरीं। यही कारण है कि इन्हीं चार स्थानों पर कुंभ का मेला लगता है। मान्यता है कि अमृत कलश प्राप्त करने हेतु 12 दिनों तक देव- असुरों में युध्द चला। इस बीच अमृत कलश की खींचतान के दौरान 12 स्थानों पर अमृत छलका, जिनमें 4 स्थान मृत्युलोक में हैं और शेष 8 स्थान परलोक में है। माना जाता है कि देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक वर्ष के बराबर होता है। इसलिए कालांतर में वर्णित स्थानों पर ही ग्रह -राशियों के विशेष संयोग पर 12 वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है।

अनेकता में एकता, सहिष्णुता, समानता एवं आस्था-विश्वास व सौहार्द के साथ भक्तिभाव का अद्भुत संगम तथा हिंदु धर्मावलम्बियों का महापर्व है कुंभ। ज्ञान, चेतना व उसका परस्पर मंथन कुंभ मेले के वह आयाम है जो आदिकाल से ही हिंदु धर्मावलम्बियों की जागृत चेतना को बिना किसी आमंत्रण के खींच लाता है। कहा जाता है कि भारतीय संस्कृति को एक सूत्र में बांधे रखने का महत्वपूर्ण कार्य कुंभ जैसे विशालतम मेलों द्वारा ही सहज हुआ है।

प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन होने वाला है यह सुनते ही गंगा, यमुना एवं सरस्वती का पवित्र सुरम्य त्रिवेणी संगम सभी को रोमांचित कर देता है और सहज ही उसके दृश्य आंंखों के सामने तैरते हुए दिखाई देने लगते हैं। पावन संगम स्थल पर विशाल जन सैलाब हिलोरे लेने लगता है और हृदय भक्तिभाव से विह्वल हो उठता है। श्री अखाड़ों के शाही स्नान से लेकर नागा साधु, संत पंडालों में धार्मिक मंत्रोच्चार, महान ऋषियों के त्याग, तप, सत्य, ज्ञान एवं तत्वमिमांसा के उद्गार, मुग्धकारी संगीत, नादों का समवेत अनहद नाद, संगम में डुबकी से आप्लावित हृदय एवं अनेक देवस्थानों के दिव्य दर्शन प्रयागराज कुंभ की महिमा का अद्भुत दर्शन कराते हैं।

कब होता है कुंभ का आयोजन

कुंभ का आयोजन ज्योतिष गणना के अनुसार चार प्रकार से होता है।

1) हरिद्वार में कुंभ- बृहस्पति के कुंभ राशि में तथा सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर हरिद्वार में गंगा तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

2) प्रयागराज में कुंभ- बृहस्पति के मेष राशि चक्र में प्रविष्ट होने तथा सूर्य एवं चंद्र के मकर राशि में आने पर अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी संगम तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

3) नासिक में कुंभ- बृहस्पति एवं सूर्य के सिंह राशि में प्रविष्ट होने पर नासिक में गोदावरी तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

4) उज्जैन में कुंभ- बृहस्पति के सिंह राशि में और सूर्य के मेष राशि में प्रविष्ट होने पर उज्जैन में क्षिप्रा तट पर कुंभ पर्व का आयोजन होता है।

हर तीन साल बाद होता है कुंभ-

उक्त चार स्थानों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल में कुंभ का आयोजन होता है, इसीलिए किसी एक स्थान पर प्रत्येक 12 वर्ष बाद ही कुंभ का आयोजन होता है। जैसे उज्जैन में कुंभ का आयोजन हो रहा है, तो उसके बाद अब तीन वर्ष बाद हरिद्वार, फिर अगले तीन वर्ष बाद प्रयाग और फिर अगले तीन वर्ष बाद नासिक में कुंभ का आयोजन होगा। उसके तीन वर्ष बाद फिर से उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। उज्जैन के कुंभ को सिंहस्थ कुंभ कहा जाता है।

अर्धकुंभ एवं सिंहस्थ कुंभ का रहस्य 

अर्धकुंभ क्या है? अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्धकुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग, नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है।

सिंहस्थ क्या है? सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है। इसके अलावा सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुंभ पर्व का आयोजन गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। इसे महाकुंभ भी कहते हैं, क्योंकि यह योग 12 वर्ष बाद ही आता है। इस कुंभ के कारण ही यह धारणा प्रचलित हो गई कि कुंभ मेले का आयोजन प्रत्येक 12 वर्ष में होता है, जब कि यह सही नहीं है।

मनन, चिंतन व मंथन से ज्ञानामृत

कुंभ का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि मनन, चिंतन व मंथन करने से ही हमें ज्ञान अमृत की प्राप्ति हो सकती है। जिससे हमारे जीवन जीने की राह आसान होती है और इसके साथ ही भगवद् प्राप्ति (मोक्ष) भी सुलभ हो जाता है। कुंभ पर्व प्रकृति एवं जीव तत्व में सामंजस्य स्थापित कर उनमें जीवनदायी शक्तियों को समाविष्ट करता है। प्रकृति ही जीवन व मृत्यु का आधार है, अत: प्रकृति से सामंजस्य अति आवश्यक है। कहा जाता है कि मानव शरीर में ब्रह्मांड की सारी शक्तियां समाई हुई हैं। ‘यद् पिण्डे तद् ब्रह्मांडे’ अर्थात जो शरीर में है वही ब्रहमाण्ड में है, इसलिए ब्रहमांड की शक्तियों के साथ पिंड (शरीर) कैसे सामंजस्य स्थापित करे, उसे जीवनदायी शक्तियां कैसे मिले, इसी रहस्य को जानने का पर्व है कुंभ। इसके अलावा विभिन्न मतों- अभिमतों-मतातरों के व्यवहारिक मंथन का पर्व है कुंभ, और इस मंथन से निकलने वाला ज्ञान अमृत ही कुंभ पर्व का प्रसाद माना जाता है। कुंभ एक ऐसा पर्व है, जिसे कोई अपनी आंखों से ना देखें तो वह इसे नहीं समझ सकता। इसका रहस्य, महत्व और मेले का मनभावन हर्षोल्लास वही समझ सकता है, जिसने स्वयं कुंभ के अलौकिक, अद्भुत एवं पवित्र वातावरण को प्रत्यक्ष देखा और महसूस किया है। कुंभ के पावन पर्व पर चारों ओर साधु-संन्यासी, महंत, मुनि, ऋषि, नागा साधु, अघोरी आदि के साथ भारी संख्या में श्रध्दालुओं की भीड़ पवित्र नदी में डुबकी लगाकर स्वयं को पवित्र करती है।

पवित्र स्नान की तिथियां एवं उनका महत्व

स्नान पर्व में गंगा नदी में स्नान करना अलग ही महत्व रखता है। ऐसी मान्यता है कि पवित्र तिथि अनुसार स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है तथा मानव को जन्म-मरण के आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। प्रमुख स्नान तिथियों पर सूर्योदय के समय साधु संतों द्वारा पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाई जाती है। हर एक समूह विशेष क्रम में परंपरा अनुरूप स्नान के लिए समयानुसार नदी में जाकर डुबकी लगाते है। इसके बाद शेष श्रध्दालु क्रमश: स्नान करते है। कुंभ मेले के दौरान गंगा नदी में स्नान का शुभ दिन अमृत में डुबकी लगाने जैसा लगता है। कुंभ मेले की पवित्र स्नान की तारीखें नीचे सूचीबध्द की गई है।

मकर सक्रांति

एक राशि से दूसरी राशि में सूर्य के संक्रमण को ही संक्रान्ति कहते हैं। भारतीय ज्योतिष अनुसार बारह राशियां मानी गई हैं। जनवरी महीने में प्राय: 14 तारिख को जब सूर्य धनु राशि से (दक्षिणायन) मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण होता है तो मकर संक्रान्ति मनाई जाती है। लोग व्रत स्नान के बाद अपनी क्षमतानुसार कुछ न कुछ दान अवश्य करते हैं। कुंभ मेले में मकर संक्रान्ति के दौरान स्नान के बाद दान करने का बहुत महत्व है।

पौष पूर्णिमा

भारतीय पंचांग के पौष मास के शुक्ल पक्ष की 15हवीं तिथि को पौष पूर्णिमा को ही पूर्ण चन्द्र दिखाई देता है। कुंभ मेले की अनौपचारीक शुरूआत इसी दिवस से मानी जाती है। इसी दिवस से कल्पवास का आरंभ भी इंगित होता है।

मौनी अमावस्या

ऐसी व्यापक मान्यता है कि इस दिन ग्रहों की स्थिति पवित्र नदी में स्नान के लिए सर्वांधिक अनुकूल होती है। इसी दिन प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और यहीं संगम पर पवित्र जल से स्नान किया था। इस दिन मेला क्षेत्र में सबसे अधिक भीड़ होती है।

वसंत पंचमी

हिन्दू मिथक के अनुसार विद्या की देवी मां शारदा के अवतरण का यह दिवस ऋतु परिवर्तन का संकेत भी देता है। कल्पवासी वसंत पंचमी के महत्व को दर्शाने हेतु पीत वस्त्र धारण करते हैं।

माघी पूर्णिमा

यह दिवस गुरू बृहस्पति की पूजा और इस विश्वास से जुड़ा है कि हिंदू देवता गंधर्व स्वर्ग से पधारे हैं। इस दिन पवित्र घाटों पर तीर्थयात्रियों की बाढ़ इस विश्वास के साथ आती है कि वे सशरीर स्वर्ग की यात्रा कर पाएंगे।

महाशिवरात्रि

यह दिवस कल्पवासियों का अंतिम स्नान पर्व है और सीधे त्रिनेत्र धारी भगवान भोलें शंकर से जुड़ा हुआ है और इसके साथ ही माता पार्वती से इस पर्व के सीधे जुड़ाव के नाते कोई भी श्रध्दालु शिवरात्रि के व्रत तथा संगम स्नान से वंचित नहीं होना चाहता। कहते हैं कि देवलोक के देवता भी इस दिन का इंतजार करते हैं।

प्रयागराज में फैला कुंभ का प्रकाश

प्रयाग में कुंभ मेले को ज्ञान एवं प्रकाश के स्रोत के रूप में सभी कुंभ पर्वों में व्यापक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य जो ज्ञान का प्रतीक है, इस पर्व में उदित होता है। शास्त्रों के अनुसार ब्रहमा जी ने पवित्रतम नदी गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर दशाश्वमेघ घाट पर अश्वमेघ यज्ञ किया था और सृष्टि का सृजन किया था।

कुंभ का तत्वज्ञान

* कुंभ सृष्टि में सभी संस्कृतियों का संगम है।

* कुंभ अध्यात्मिक चेतना है।

* कुंभ मानवता का प्रवाह है।

* कुंभ नदियों, वनों एवं ऋषि संस्कृति का प्रवाह है।

* कुंभ जीवन की गतिशीलता है।

* कुंभ प्रकृति व मानव जीवन का संयोजन है।

* कुंभ ऊर्जा का स्रोत है।

* कुंभ आत्मप्रकाश का मार्ग है।

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