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सन १९८५-९० के दौरान प्रचलित शब्द ‘जैव विविधता’ का अभिप्राय है, ‘पृथ्वी पर परिलक्षित विविध प्रकार के प्राणी, पौधे और परिस्थितिक चक्र एवं मानव में पारम्परिक विभिन्नता, उनके आकार-प्रकार, व्यवहार, जीवन-चक्र और प्रकृति में उनका योगदान।’ यह जैव विविधता करोड़ों- अरबों वर्षों से हो रहे जीवन के निरंतर विकास-प्रक्रिया का प्रतिफलन है। जीवों में असाधारण भिन्नता, सूक्ष्म जीवाणु से लेकर भीमकाय हाथी तक, विशाल वृक्ष से लेकर लाघव प्रजाति, फफूंद तक यह सर्वाधिक आश्चर्यजनक तथ्य है।

 राष्ट्रीय जैव विविधता (भारत के संदर्भ में)

      भारत एक बहुत विविधताओं से युक्त राष्ट्र है। विश्व के सर्वाधिक पादप संपन्न राष्ट्रों में भारत का १०वां स्थान है तथा जैव विविधता एवं कृषि विविधता की उत्पत्ति की दृष्टि से ६वां स्थान।

       भारत विश्व के कुल क्षेत्रफल का लगभग २% भू-भाग है जबकि इस राष्ट्र में विश्व की कुल ज्ञात जैव प्रजातियों का ६ प्रतिशत भाग निवास करता है। भारत के पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमी घाट क्षेत्र जैव विविधता संपन्न क्षेत्र या जैव विविधता के तप्त स्थलों की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है।

      भारत में जैव प्रजातियों की विविधता का एक प्रमुख कारण है जलवायु तथा उच्चावच की दृष्टि से पर्याप्त भिन्नतावश विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों में पर्याप्त संख्या में जैव प्रजातियों के विकसित होने की संभावनाएं। यहां लगभग ८.१ हजार जीवजंतु तथा लगभग ४५ हजार पादप प्रजातियां चिह्नित की गई हैं। विश्व में वृहत जैव विविधता वाले १२ देशों में भारत भी सम्मिलित है।

 स्थानीय जैव विविधता

      किसी स्थान विशेष में प्राप्त जैव विविधता को स्थानीय जैव विविधता कहा जाता है। स्थानीय स्तर पर आवासीय क्षेत्रों की दशाओं की भिन्नता के आधार पर जैव विविधता में अंतर दीखता है। जैसे-किसी एक क्षेत्र में मिलने वाले तालाब-क्षेत्र, वन-क्षेत्र तथा घास-क्षेत्र के जैव समुदाय में पर्याप्त अंतर दीखता है।

 जैव विविधता के प्रकार

 जैव विविधता प्रमुखत: निम्न प्रकार की होती है-

 १. आनुवांशिक जैव विविधता (Genetic  Diversity)

 २. प्रजातीय जैव विविधता (Species Diversity)

 ३. पारिस्थितिकी जैव विविधता (Eco System Diversity)

 ४. कृषि जैव विविधता

 जैव विविधता पर संकट

       पृथ्वी पर जीवन का उद्भव  एवं विकास करोंडो, अरबों वर्षों में हुआ। इस आवधि में भिन्न-भिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ साथ विभिन्न प्राणियों एवं पादप के प्राकृतिक आवास बने। किंतु मानव विकास व प्रगति एवं अनेक प्राकृतिक कारणवश जीवों के आवासों का विनाश, वन्य प्राणियों का अवैध शिकार, मानव वन्य-प्राणी में संघर्ष तथा प्राकृतिक आपदाओं आदि के कारण असंख्य प्रजातियां शनै:शनै विलुप्त हो गईं या विलुप्ति के कगार पर हैं। वर्तमान समय में जीवों के संकटापन्न दर, विलोपन दर में वृद्धि हुई, परिणामत: विश्वस्तर पर जैव विविधता संकटापन्न है।

 १) आवासीय क्षति

       वर्तमान में जैव विविधता के ह्रास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है- विकास के नवीन आयामों की रवोज में वनोन्मूलन। आर्द्र प्रदेशों तथा अन्य जैविक रूप से संपन्न पारिस्थितिकी तंत्रों के विनाश से प्रति वर्ष सैकड़ों प्रजातियों की संख्या में गिरावट आई है। जनसंख्या में निरंतर वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगीकरण, बांध निर्माण, वनों के अंधाधुंध व अनियंत्रित कटाई के कारण वनों का क्षेत्र र्हासोन्मुख है। चरागाह एवं वनीय क्षेत्र गो प्राणियों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र हैं, कृषि-भूमि, उद्योगों एवं मानव आवास के लिए भवनों, सड़कों तथा रेल मार्गों के निर्माण के कारण भी वनस्पतियों एवं प्राणियों के आवासों को नष्ट कर दिया गया है। परिणामत: अनेक प्रजातियों को अन्यत्र नए स्थलों में शरण लेनी पड़ी है।

  वन्यजीव का अनाधिकार/ अवैधानिक शिकार

      मानव सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने अपने पोषण हेतु प्राणियों का शिकार करना प्रारंभ कर दिया था। जनसंख्या-वृद्धि व तदनुरुप आवश्यकता-वृद्धिवश मनुष्य इन वन्य प्राणियों से भोजन एवं अनेक प्रकार के उत्पादों -सींग, नाखून, चमड़ा, अस्थियां, सज्जा-सामग्री आदि को प्राप्त करने लगा। विकास के साथ शिकार की वैज्ञानिक एवं तकनीकी विधियों के विकसित होने के कारण, वन्य प्राणियों एवं उनसे प्राप्त उत्पादों की मांग और बाजार में अधिक मूल्य के कारण अमूल्य वन्य प्राणी प्रजातियों के विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों/नियमों आदि के बावजूद अनाधिकृत / अवैधानिक शिकार की दर में वृद्धि हुई है।

  मानव वन्य-जीवन संघर्ष (Man Wildlife Conflict)

      जैविक उद्विकास विधि के अंतर्गत जीवों का रूपांतरण होता है। मानव क्रियाकलापों के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकी विकास के कारण रूपांतरण दर में वृद्धि होने के कारण जैव -विविधता के विलुप्तिकरण में तीव्रता आई है। परिणामत: उत्तरजीविता संकट उत्पन्न हो गया है। वनीय संसाधनों की क्षति व जैव विविधता में क्षति के कारण मनुष्य एवं वन्य जगत में एक संघर्ष उत्पन्न हो गया है। कृषि, फसल-उत्पादन हेतु विभिन्न प्रकार के रासायनिक खाद, कीटकनाशक रसायनों के अनियंत्रित उपयोगवश पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि हुई है, अनेक सूक्ष्म जीवों एवं अन्य जैव प्रजातियां नष्ट हुई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पर्यावरण एवं उत्तरजीविता-संघर्ष के कारण आने वाले ३०-४० वर्षों में लगभग १०-१५ लाख वन्य जीवों की प्रजातियां नष्ट हो जाएगी। अत: यदि संतुलन बनाए रखते हुए वन्य-जीवन का दोहन किया जाए, तभी मानन व वन्य-जीवन-संघर्ष का समाधान संभव है।

  जैव विविधता का संरक्षण

      जैव विविधता का भौगोलिक इतिहास लगभग ३.५-४ करोड़ वर्ष पुराना है। पारिस्थितिकी तंत्र का अति दोहन अधिकाधिक प्रजातियों की समाप्ति/ विलुप्तीकरण का कारण है। अत: संरक्षण हमारी प्रथम प्राथमिकता है।

      आर्थिक, पर्यावर्णीय, वैज्ञानिक, चिकित्सा आदि की दृष्टि से महत्वपूर्ण जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता ठळे उेपषशीशपलश १९९२ में सर्वप्रथम दृढ़ता से महसूस की गई। वस्तुत: जैव विविधता का संरक्षण अत्यावश्यक है। जंतु और पौधे हमारी धरोहर है। पर्यावरण संतुलन मानव-अस्तित्व को बनाए रखने, दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति, पोषण व औषधीय महत्व की दृष्टि से वनों एवं जैविक परिपूर्णता का संरक्षण संवर्द्धन अपरिहार्य है।

      जैव विविधता पारिस्थितिकी दृढ़ता एलेश्रेसळलरश्र डींरलळश्रळींू का एक प्रमुख भाग है और यह इसलिए आवश्यक है कि इस पर हमारा आर्थिक और जैविक जीवन निर्भर है। अधिकांश लोग प्रकृति के उत्पादों का उपयोग करते हैं, जैसे ईंधन हेतु लकड़ी, शिकार व भोजन हेतु जानवर, वाणिज्यिक लकड़ी के रुप में और मछलियों का उपयोग किया जाता है। अत: जैव विविधता का उपभोग्य मूल्य एवं अन्य उपभोग मूल्य  भी है। यथा वैज्ञानिक अनुसंधान, पक्षी निरीक्षण और वन्य जीवन पर्यटन ऐसी क्रियाएं हैं, जिनका उपयोग लाखों लोग करते हैं, हजारों लोगों को रोजगार मिलता है।

 भारत में जैव विविधता-संरक्षणार्थ प्रयास

 जैव विविधता के संरक्षणार्थ कि, जा रहे प्रयास मुख्यत: तीन स्तरों पर केंद्रित हैं-

 १. आनुवांशिक विविधता २.जाति विविधता  ३.पारिस्थितिकी तंत्र विविधता

      ये तीनों ही आपस में एक दूसरे पर आश्रित हैं। किसी जाति की अंतर्निहित आनुवांशिक विविधता को संरक्षित कर उस जाति का संरक्षण संभव है और पारिस्थितिकी तंत्र की विविधता के संरक्षण से उन प्रजातियों की विविधता संरक्षित होगी।

      अस्तु, जैव विविधता के अंतर्गत उसके विभिन्न स्तरों, विभिन्न प्रकारों आनुवंशिक, प्रजातीय, पारिस्थितिक तंत्र, कृषि संबंधी, जैव विविधता पर संकट के प्रमुख कारणों एवं जैव विविधता के संरक्षण क्षेत्र में किए जा रहे महत्वपूर्ण प्रयासों का उल्लेख किया गया है।

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