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पर्यावरण की व्याख्या व्यापक है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि हम अपनी सभी इंद्रियों- तात्पर्य ज्ञानेंद्रियों, कर्मेद्रियों और अंत:करण (मन, बुध्दि, चित्त, अहंकार) – से जो भी अनुभव, अनुभूति लेते हैं वह सभी पर्यावरण का ही घटक है। कान से सुनते हैं- तो जहां से ध्वनि निकल रही है वह पर्यावरण का ही एक घटक है और जो भी देखते हैं- सूर्य, चंद्र, अवकाश से लेकर जीव और जड़ जगत की सभी वस्तुएं- वे सभी पर्यावरण के ही घटक हैं। जो भले ही आंखों से दिखता न हो, परंतु जिसे उपकरणों की सहायता से देखेंगे या अन्य इंद्रियों के द्वारा अनुभव ले सकते हैं ऐसा सब पर्यावरण का भाग है।
भारत के वनवासी समाज का जीवन कल तक कैसा था? जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव घर के संस्कार, समाज के संस्कार और इनसे थोड़ा भी कम नहीं ऐसा शिक्षा केंद्रों से प्राप्त संस्कार तथा विचारों का रहता है। स्मरण रखें, पुरातन काल में विद्या केंद्र शहरों में नहीं अपितु वनों में या वनों के सीमावर्ती भाग में रहते थे, यह प्रसिद्ध है। समाज जीवन के लिए आवश्यक विचारों के महत्व को लिखना आवश्यक नहीं है। वन क्षेत्रों में वनवासी समाज का निवास रहता था यह सभी जानते ही हैं। वन क्षेत्रों में स्थित विद्या व विचार केंद्र का असर वनवासियों के जीवन पर पड़ता ही था। अत: वनवासियों के जीवन में भारत में विकसित विद्या एवं विचारों का असर दिखना स्वाभाविक रूप से ही था। एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक लगता है। भारत पर विगत लगभग बारह सौ वर्षों से विदेशियों के आक्रमण का तांता लगा रहा था। इसमें प्रारंभिक हजार वर्षों तक आक्रमण करने वाले और शासन करने वाले ये विदेशी अरबस्तान, ईरान एवं मध्येशिया के इस्लाम संप्रदायावलंबी थे। इनके आक्रमण और शासन का अनुभव भारत ने लिया है। मात्र एक वाक्य में इतना ही लिखा जा सकता है कि वे सब अंध संप्रदायिक, घोर असहिष्णु, अन्य संप्रदायों के मतों के अनुयाइयों के लिए घोर उत्पीड़क और विध्वंसक, अन्यों के सांस्कृतिक और धार्मिक (सांप्रदायिक न समझा जाए) अस्तित्व को मिटाने का अथक प्रयास करने वाले ये विदेशी आक्रांता-शासक रहे हैं। अत: उस समय विचरण करना, तीर्थाटन करना भी खतरे से खाली नहीं था!
बानगी के लिए हम इतना ही कहना चाहेंगे कि शिवाजी के पिताजी और चाचा नवाबों की सेना में सामान्य अधिकारी थे। शिवाजी के जन्म के पूर्व की घटना है। उनके चाचा का विवाह हुआ ही था। एक बार चाची गांव की सीमा पर स्थित कुएं से पानी भरने के लिए गई थी। उसी समय कुछ सैनिक, जो इस्लामानुयायी थे, वहां से गस्त लगाते हुए निकले। उस महिला, शिवाजी के चाची, का सिपाहियों ने अपहरण कर लिया। शिवाजी के पिता व चाचा ने इसकी शिकायत नवाब से की। परंतु अपनी पत्नी को शिवाजी के चाचा प्राप्त नहीं कर सके यद्यपि वे सेवा में छोटे क्यों न हो, अधिकारी थे! तो सामान्य नागरिक, विचरण करने वाले व तीर्थयात्रा करने वाले तथा अन्य, क्या सुरक्षित थे? अस्तु। तात्पर्य इतना ही है कि सामान्य रूप से नागरिकों का प्रवास करना भी खतरे से खाली नहीं था। तो धर्म-संस्कृति की परंपरा को अखंड रखने के लिए प्रयास करने वाले प्रवासी- साधु, विद्वान, समाजसेवी आदि- का निकलना बहुत कम हो गया यह हम समझ सकते हैं।
वनवासी समाज दुर्गम वनों-पहाड़ों के अंचल में रहता आया है। इन वनवासी-अंचलों में इन विदेशी आक्रमणकारियों के लिए प्रवेश करना, लड़ना, भी काफी कठिन था और उन पर शासन करना भी उतना ही कठिन था। अत: वनवासियों का मूल्यों पर आधारित समाज-जीवन, जो हजारों वर्षों से चला आ रहा था, पूर्ववत चलता रहा। तो कैसा था यह जीवन? सत्य वचनी, अतिथियों को देवता-तुल्य मान कर उनका सेवा-सत्कार करना, परिश्रमी, वनों का दोहन करने वाला परंतु विनाशक नहीं, ऐसा पर्यावरण प्रेमी जीवन था। समाज के लिए वनों का दोहन (शोषण नहीं) करने वाला होने के कारण अकारण वृक्षों को तोड़ा नहीं जाता रहा। इतना ही नहीं तो विशेष प्रकार के घास की चटाई करके उपस्करों (र्ऋीीपर्ळींीीशी) का काम लिया जाता था। घास का दृष्टिगोचर होने वाला जीवन चार मास का रहता है और उसके बीज, जो जमीन पर बड़ी संख्या में गिरते हैं, पुन: पानी प्राप्त होते ही जीवंत हरेभरे हो जाते हैं।
प्राय: हर वनवासी क्षेत्र में विशिष्ट पेड़ों की पूजा करने की परिपाटी है। यह पर्यावरण के प्रति आदरभाव दिखाने वाली परिपाटी है। गांव के वनवासी वैद्य दवाइयों के काम में आने वाली जड़ी-बूटियों वाली वनस्पति की पूजा करके, क्षमा याचना करके, ही प्राप्त करते थे। हल चलाने के पहले भूमि की पूजा की जाती रही। हाथ में जल लेकर जो प्रतिज्ञा करता वह फिर उस प्रतिज्ञा को तोड़ता नहीं था। तात्पर्य भूमि और जल को देवतातुल्य माना जाता रहा है। उसकी पवित्रता के प्रति सम्मान रहा करता था। समस्त भारत के वनवासी के जीवन में, वनों का, वृक्षों का, वनस्पतियों का स्थान, उनके प्रति जो पूज्य भाव रहता है इससे ही व्यक्त हो जाता है। वनों-वृक्षों-वनस्पतियों के वे संरक्षक रहे हैं, इनकी वृद्धि हो ऐसे भी उनके प्रयास रहे हैं। अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति से भी नब्बे प्रतिशत वनवासी समाज वर्ष १९४७ तक दूर ही रहा है।
वर्ष १९६० से वनवासियों का जीवन निकट से देखता आ रहा हूं। वनों-पहाड़ों के स्वच्छ और उन्मुक्त रूप से कलकल करते हुए बहने वाले झरनों के समान वनवासियों की उन्मुक्त हंसी देखते आ रहा हूं, वृक्ष-वनस्पति वनों के रक्षक के अनेक रूपों को देखते आ रहा हूं। जल को अकारण प्रदूषित करने का उसका स्वभाव नहीं हैं। यह जीवन पद्धति जो कभी भारतभर में थी, कल तक और आज भी, वह वनवासी के जीवन में है।
वह तो अकारण शेर-भालू को भी मारता नहीं है। शिकार करना यह उसका शौक, या कहो व्यसन, नहीं है। अनेक वनवासी क्षेत्रों में बाघ को देवता माना जाता है अत: वह भला उसकी शिकार क्यों करेगा? ऐसा वनवासियों का पर्यावरणस्नेही जीवन है। हां, वहां आधुनिक शिक्षा पहुंचनी चाहिए, परंतु वह शिक्षा भी पर्यावरणस्नेही रहे यह आवश्यक है। मुझे याद है कि गुवाहाटी (असम) में उत्तर-पूर्वांचल के सात-आठ राज्यांें के सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक क्षेत्र के मुखियाओं की तीन दिन की संगोष्ठी का संभवत: २००१-०२ में आयोजन कल्याण आश्रम ने किया था। उसमें लगभग पचास जनजातियों के करीब तीन सौ मुखिया उपस्थित थे। इसके उद्घाटन के अवसर पर भारतीय संस्कृत शास्त्रों और भारत के संबंध में गहन अध्ययन करने वाले अमेरिका के विद्वान श्री डेविड फ्राउले ने कहा कि आधुनिक वैश्विक समाज अपने आचारों-विचारों-जीवनपद्धति के कारण विनाश के कगार पर खड़ा है ऐसा मैं देख रहा हूं। इससे यदि विश्व को बचाना है तो भारत के वनवासियों के जीवन-दर्शन या जीवनपद्धति को अपनाना ही एकमात्र मार्ग है। उनका यह कथन मानव जीवन को दिशा-दर्शन कराने वाला है। इस पर हम सभी अवश्य ही मनन-चिंतन करें यह आवश्यक लगता है।

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