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कश्मीर सिर्फ भारत का ही नहीं बल्कि पृथ्वी का नंदनवन माना जाता है। आद्य शंकराचार्य के मतानुसार ‘कश्मीर’ महर्षि कश्यप की भूमि है। इतना ही नहीं बल्कि वह काव्य और कला का उत्तम स्थल है। प्राकृतिक सुंदरता से सजी यह भूमि नंदनवन है। कश्मीर की सुंदरता देखने पर हमारी आंखें खुशी से भर उठती हैं।
कश्मीर की घाटी पश्चिम दिशा में पीर पंजाल और भव्य हिमालय की पर्वत शृंखला में बसी है। समुद्री सतह से यह १६०० मीटर की ऊंचाई पर है। कश्यप ऋषि के नाम से इसका नाम कश्मीर बन गया है। कश्मीर के मूल निवासी हिंदू हैं। कश्मीर के पंडितों की संस्कृति ५००० साल पुरानी है। हिंदू ही कश्मीर के मूल निवासी थे। ‘राजतरंगिनी’ और ‘नीलम पुराण’ जैसे दो ग्रंथ कश्मीर की आधात्मिक संस्कृति बयान करते हैं।
पुरातन काल में कश्मीर में हिंदू और बौद्ध संस्कृति का अस्तित्व था। उस समय के मुताबिक यह माना गया है कि कश्मीर की सुजलाम् सुफलाम् भूमि पर साक्षात् भगवान शिव की पत्नी सती का वास्तव्य था। इस भूमि पर पानी की मात्रा अधिकतर थी। यह भूभाग बहुत बड़ी मात्रा में जलमय रहता था। ऋषि कश्यप और सती दोनों ने मिल कर वहां के राक्षसनाग को हराया और सारा जल झेलम नदी में प्रवाहित किया, तब से इस भूभाग का नाम सतीसर से कश्मीर हो गया। इस प्रकार राक्षसों का वध कर कश्यप ऋषि ने सारी झील जल रहित कर दी और इस जगह को नंदनवन बना दिया। तब से यह भूमि कश्यप ऋषि की भूमि यानी कश्मीर के नाम से विख्यात हुई। यही स्थल ‘कश्मीर की घाटी’ के नाम से मशहूर है।
कश्मीर के प्राचीन ऐतिहासिक कालखंड में जिन राजाओं का शासन काल रहा है वे हैं राजा मौर्य, राजा कुणरण, राजा हुठा, कारकोट, लोहरा, मुगल, अफगान, सीरख और डोगरा।
कश्मीर राज्य के आध्यात्मिक महत्व का आरंभ ‘शारदा पीठ’ से होता है। यह ‘शारदा पीठ’ आज पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में है। यह एल.ओ.सी. के पास है। यह शारदा पीठ यानी विद्या की देवता ‘सरस्वती माता’ का मंदिर। प्राचीन काल में इस प्रदेश को शारदा देश कहा जाता था। देवी शारदा को कश्मीरपुरवासिनी कहा जाता था। कश्मीरी हिंदू शारदा देवी के भक्त थे। शारदा पीठ की देवी शारदा की सतत पूजा अर्चना करना इन भक्तों का प्रमुख कार्य था।
यह शारदा पीठ देवी के ५२ शक्तिपीठों में से अठारहवां शक्तिपीठ है। इसे ‘महाशक्तिपीठ’ कहा जाता है। किंवदंति यह है कि देवी का दाहिना हाथ इस जगह पर गिर गया और यह शक्तिपीठ तैयार हुआ। दक्ष राजा के यज्ञ में सती ने छलांग मारी, भगवान शंकर ने उसे बचाया और कंधे पर डाल कर वे हिमालय की ओर जाने लगे, तब देवी के शरीर के ५२ अंग जहां जहां गिरे, वे सारे स्थल शक्तिपीठ के नाम से विख्यात हुए। देवी सती का दाहिना हाथ जिस भूमि पर गिरा वह स्थल शारदा पीठ के नाम से विख्यात हुआ। साक्षात शारदा माता का निवास इस भूमि पर है। यह स्थल समुद्री सतह से ११००० फुट की ऊंचाई पर है। इस मंदिर की लंबाई १४२ फुट है। चौड़ाई ९४.६ फूट है। बाहरी दीवार ६ फुट चौड़ी और ११ फुट लंबी है। भारतीय काली का अप्रतिम नमूना माना जाता है।
शारदा मंदिर के पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशा के दरवाजे खुले थे। दक्षिण दिशा का दरवाजा सालों से बंद था। दशिण द्वार खोलने का पहला सम्मान आद्य श्री शंकाराचार्य जी को मिला था। जब श्री शंकाराचार्य अपने अनुयायियों समेत भारत वर्ष की दिग्विजय यात्रा पर निकले थे तब हिंदू वैदिक धर्म की ध्वजा भारत देश में वे फहरा रहे थे। भारत की विविधताओं के बारे में वे कहा करते थे कि सारे भारतवासी एक धर्म सूत्र में बंधे हुए हैं। वह धर्मसूत्र है विश्व कल्याण करने वाला वेदों के द्वारा कहा गया वैदिक धर्म।
धर्म की ध्वजा फहराते हुए वे शंकराचार्य कश्मीर में आए। काव्य साहित्य पर प्रेम करने वाली कश्मीर की जनता आचार्य के स्वागत में खड़ी थी। विविध वाद्य लेकर, फूलों के हार लेकर वे आचार्य के सामने आई, इस तरह शंकराचार्य तेज से ओतप्रोत शारदा पीठ की ओर चल पड़े। आद्यश्री शंकाराचार्य का ज्ञान, कार्य कुशलता, धर्म प्रसार से लोग भलीभांति परिचित थे। स्वच्छ, पारदर्शी तालाब के किनारे शारदा पहाड़ी चढ़ते हुए यह विभूति शिष्यों समेत केसरिया वस्त्र पहन कर जा रही थी। हरीभरी शारदा पहाड़ी केसरिया वस्त्र पहने चलते हुए संन्यासियों के कारण केसरिया अबोली फूलों की कतार की तरह लग रही थी। इस रमणीय जगह पर विद्यादेवी शारदा विराजमान थी। शारदा के मंदिर की पूर्व, पश्चिम, उत्तर दिशा के द्वार ज्ञानी पंडितों ने उनके तप की सामर्थ्य पर, ज्ञान के बल पर ही खोले थे। आज यह युवा, तेजोमय, वाक्पटु वेदों पर प्रभुत्व लाने वाला पंडित केरल से कश्मीर के भूप्रदेश पर शारदादेवी का दक्षिण द्वार खुला करने का विश्वास लेकर आया था। शंकराचार्य का कहना था कि इस विद्यादेवता का आंगन चारों तरफ से खुला होना चाहिए अन्यथा उसे घुटन महसूस होगी, उसमें उपासकों को मुश्किल होगी।
कई पंडितों, विभूतियों, गौतम अनुयायियों, योगदर्शन मनाभिमानी जैसे कई विद्वानों को शंकराचार्य ने वाद-विवाद करते समय अपना सुयोग्य अभिप्राय दिया, उनका शंका-निरसन कर अपने ज्ञान से उन्हें स्तिमित कर दिया। कितना बुध्दि-वैभव था उनके पास। कई पूर्वजन्मों की पुण्यप्राप्ति थी।
उस कश्मीर के शारदा पीठ के दक्षिण द्वार खोलने की बेला नजदीक आ रही थी। ज्येष्ठ शंकराचार्य का हाथ पकड़ कर उन्हें बड़े मान-समान से दक्षिण द्वार तक ले गए। श्री शंकराचार्य जी के द्वारा विधिवत पूजा हुई और श्रीफल फोड़ा। उनकी जयजयकार का घोष हुआ। प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने दक्षिण द्वार जरा सा धकेला और दक्षिण द्वार खुल गया। श्री शंकराचार्य जी के मात्र हस्त-स्पर्श से ही दरवाजा खुल गया। उन्होंने शारदा माता और उस पीठ की यथा-विधि श्रध्दापूर्वक पूजा की। लाड़ले पुत्र के आने से माता शारदा के मुख का हास्य देखते ही बनता था, वह और शोभायमान हो रही थी, सारे श्रध्दालुओं के मन में यह बात आई। ज्येष्ठ उन्हें पीठधिष्ठित घोषित करने ही वाले थे कि ऊंचे स्वर में आकाशवाणी हुई ‘‘सबकी अनुमति से आप सर्वज्ञ साबित हुए हैं, आज से आप इस पूरे भारतवर्ष में ‘जगदगुरु’ कहलाएंगे।’’ इस प्रकार सम्मान से वाद्यों के जयघोष में आचार्य आसनाधिष्ठित हुए। सारे ज्येष्ठ, श्रेष्ठ जनों ने सर्वसंमति से उन्हें ‘जगदगुरु’ पद बहाल किया । तब से वे ‘जगदगुरु आद्य शंकराचार्य‘ के नाम से प्रसिध्द हुए। उस क्षण से कश्मीर का यह छोटासा टीला ‘शंकराचार्य टीला’ कहा जाने लगा। सारे श्रध्दालुओं ने, चराचर सृष्टि ने ‘श्री जगदगुरु शंकराचार्य की जय’ का जयघोष किया ।
इस प्रकार जगदगुरु शंकराचार्य की दिग्विजय यात्रा का पड़ाव महत्वपूर्ण साबित हुआ, भारतवर्ष की आध्यात्मिकता का शीर्ष-बिंदु साबित हुआ।
जानकारों का कहना है कि हर युग में ज्ञानी पुरुष का निर्माण हुआ है। कृतयुग में कपिल मुनी, त्रेतायुग में श्री दत्तात्रेय, द्वापार युग में महर्षि व्यास, कलियुग में जगदगुरु शंकराचार्य। उनके जैसा कोई ज्ञानी पुरूष नहीं हुआ और ना ही होगा।
इससे भी आगे जाकर कश्मीर का धार्मिक, आध्यात्मिक महत्व बढ़ रहा है-दो तीर्थक्षेत्रों की वजह से। एक है श्री अमरनाथ भोले बाबा की गुफा, जो श्रीनगर से बालताल मार्ग से चौदह किलोमीटर की दूरी पर है। जिसकी यात्रा कई सालों से चल रही है। वटपौर्णिमा के दिन शुरू होकर श्रावण-पौर्णिमा तक यह यात्रा चलती है। यात्री पहलगाम, शेषनाग, पंचतारिणी मार्ग से २८ मीटर चल कर यह यात्रा पैदल करते हैं। भक्ति और श्रध्दा से भोले-बाबा के दर्शन के आतुर रहते हैं।
श्रीनगर से जुड़ा संभाग जम्मू है। इस राज्य का श्री माता वैष्णोदेवी तीर्थक्षेत्र है। वही इस पर्वत पर राज करती आई है। वैष्णोदेवी तीन श्रीशक्तियों का एकत्रित पीठ है। श्री महाकाली, श्री महासरस्वती और श्री महालक्ष्मी इन तीन देवीमाताओं का यह शक्तिपीठ है। इस शत्त्किपीठ के कारण जम्मू और कश्मीर ये दो संभाग तीर्थस्थल के रूप में मशहूर हैं।

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