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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रारंभ से ही यह प्रयास किया कि जम्मू-कश्मीर रियासत का भारत में यथाशीघ्र विलय हो। संघ ने सबसे पहले तो स्वतंत्र कश्मीर का सपना संजाने हेतु महाराजा को प्रेरित करने वाले वहां के प्रधान मंत्री रामचन्द्र काक का खुलेआम पर्दाफाश किया। स्थान-स्थान पर सभाएं कीं, प्रदर्शन किए, महाराजा से प्रतिनिधि मण्डल मिलवाए तथा काक द्वारा अपनाई जा रही देशद्रोही भूमिका का काला चिट्ठा सप्रमाण उनके सामने रखा। उसे पदच्युत करवाया और फिर महाराजा का मन विलय के पक्ष में करने हेतु बहुआयामी प्रयास किए। पहले तो जनजागरण प्रारंभ किया गया, फिर व्यापक हस्ताक्षर- अभियान विलय के पक्ष में जम्मू क्षेत्र में चलाया गया। जम्मू के संघचालक पं. प्रेमनाथ डोगरा
के नेतृत्व में वह
हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन महाराजा को सौंपा और जम्मू की जनता की ओर से महाराजा से आग्रह किया कि वे सब आशंकाओं से मुक्त होकर रियासत का विलय भारत में कर दें, इसीमें उनका व रियासत का हित है।
रायबहादुर बद्रीदास पंजाब प्रान्त के संघचालक थे। वे प्रख्यात अधिवक्ता थे और उनका महाराजा पर अलग प्रभाव था। वे महाराजा के महत्वपूर्ण मामलों में उनकी ओर से अदालत में पैरवी
करते थे। वे सितम्बर मास में श्रीनगर आकर महाराजा
से मिले तथा उन्हें विलय हेतु राजी करने का भरपूर प्रयास किया।
उत्तर प्रदेश के संघचालक बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह की ससुराल महाराजा के प्रमुख दीवान के यहां थी। उनके भी इस नाते महाराजा से निकट के सम्बंध थे। वे भी महाराजा को प्रभावित करने का प्रयास करते रहते थे।
ये सारे प्रयास संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी की प्रेरणा से व उनकी जानकारी में ही चल रहे थे; क्योंकि संघ तथा भारत समर्थक हर वर्ग की यही तीव्र इच्छा थी कि जम्मू-कश्मीर राज्य हर हालत में भारत के ही साथ रहना चाहिए। इसलिए संघ के समान सभी ऐसे तत्व अपने-अपने ढंग से प्रयत्नशील थे। बलराज मधोक के समान जिन वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का निकट सम्बंध महाराजा से था, वे महाराजा के सतत सम्पर्क में रह कर उनके मन के असमंजस को दूर करने का प्रयास करते ही रहते थे। पाकिस्तानी खतरे व उसकी नीयत से उन्हें अवगत कराते रहते थे। यही नहीं, पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर हमले की योजना तथा कश्मीर की सेना के मुस्लिम अफसरों व सैनिकों की पाकिस्तान से सांठगांठ तथा हमले के अवसर पर गद्दारी करने के षड्यंत्र से भी उन्हें समय पर अवगत कराया था।
वैसे यह नहीं था कि महाराजा अपने राज्य का विलय भारत में करना नहीं चाहते थे; परन्तु एक तो प्रधान मंत्री काक तथा भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबैटन तक ने भारत में विलय करने पर संकटों का पहाड़ उनके राज्य पर टूट पडेगा, उसका जो भयानक चित्र उनके सामने प्रस्तुत किया था, उससे वे विचलित थे और दूसरे वे भारतीय नेताओं विशेषकर पं. नेहरू के प्रति अत्यंत आशंकित थे। शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को वे पसंद नहीं करते थे और पं. नेहरू शेख को सत्ता सौंपने की शर्त पर ही विलय स्वीकारने को तैयार थे। महाराजा ने पं. नेहरू को तब कश्मीर में प्रवेश नहीं करने दिया था, जब पं. नेहरू शेख के समर्थन में कश्मीर जा रहे थे। हुआ यह कि शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कान्फ्रेन्स ने १० मई १६४६ को महाराजा के विरोध में ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की तर्ज पर ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन शुरु कर दिया था। २० मई को शेख व उसके अनेक साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे विचलित होकर पं. नेहरू ने महाराजा को पत्र लिख कर शेख अब्दुल्ला कोे तुरंत रिहा करने की मांग की। वे यह मांग करके ही संतुष्ट नहीं हुए, वे शेख के समर्थन में स्वयं कश्मीर जाने को तैयार हो गए। हांलाकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें वैसा न करने की सलाह दी; परंतु नेहरू जी ने उस सलाह को नकार दिया। महाराजा ने भी पं. नेहरू से कहा कि शेख अब्दुल्ला का यह आंदोलन ब्रिटिश सरकार के इशारे पर है तथा वह भारत के हित के विरुद्ध है, अत: वे उसके समर्थन में कश्मीर न आएं, पर पं, नेहरू न माने। उन पर तो शेख अब्दुल्ला की दोस्ती का भूत सवार था। पं. नेहरू के अपनी जिद पर अड़े रहने के कारण महाराजा ने उनके कश्मीर प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। जब नेहरू जी इस प्रतिबंध को तोड़ कर कश्मीर गए, तो उन्हें वहां बंदी बना लिया गया। इस कारण वे महाराजा को सबक सिखाना चाहते थे। इस प्रकार कश्मीर के भारत में विलय के मार्ग में अनेक व्यक्तिगत अहंकार आड़े आ रहे थे।
महाराजा ने संघ तथा भारत समर्थक अन्य वर्गों के तर्कों की बात मान कर अपनी ओर से विलय के प्रस्ताव भी भेजे थे। उन्होंने इस हेतु अपने दूत के रूप में हरनाम सिंह पठानिया को दिल्ली भेजा था; परंतु पं. नेहरू के प्रतिकूल रुख के कारण काम बन नहीं पाया। महाराजा ने अंतिम प्रयास १० व १३ अक्टूबर १६४७ के मध्य किया। उन्होंने पुन: हरनाम सिंह को दिल्ली भेजा; परंतु सफलता न मिली। अंत में संघ की योजना के अनुसार श्री गुरुजी ने श्रीनगर जाकर महाराजा से भेंट कर उन्हें राजी करने का निर्णय किया। वे १७ अक्टूबर १६४७ को विमान द्वारा श्रीनगर पहुंचे। वे वहां संघ की व्यवस्था के अंतर्गत बैरिस्टर नरेन्द्र जीत सिंह की ससुराल दीवानियत भवन में ही ठहरे। बैरिस्टर साहब भी श्री गुरुजी के साथ आए थे। इसके अतिरक्त दिल्ली प्रांत प्रचारक वसंतराव ओक भी उनके साथ थे। पंजाब प्रांत प्रचारक माधवराव मुळे भी वहां उपस्थित थे। श्री गुरुजी की सुरक्षा का भार हरिश भनोट, प्रचारक की ओर था। घटनाक्रम के बारे में भनोट ने स्वयं बताया कि वे २६ सितम्बर को जालंधर में थे। वहीं उन्हें सूचना मिली कि श्रीगुरुजी का प्रवास श्रीनगर होने वाला है, इस कारण अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में वे वहां पहुंच गए। जम्मू-कश्मीर विभाग प्रचारक जगदीश अब्रोल को भी तार भेज कर वहां पहले ही बुला लिया गया था।
दूसरे दिन अर्थात १८ अक्टूबर को श्रीगुरुजी निजी कार से महाराजा से मिलने उनके निवास ‘कर्ण महल’ पहुंचे। महाराजा व महारानी दोनों श्रीगुरुजी पर अपार श्रद्धा रखते थे। महाराजा संघ पर भी काफी भरोसा करते थे और उनका विश्वास था कि संकट की घड़ी में संघ के स्वयंसेवक राज्य की रक्षा के कार्य में मदद करेंगे। इसलिए महाराजा हरिसिंह व महारानी तारा दोनों श्री गुरुजी के स्वागत के लिए द्वार पर ही उपस्थित थे। महाराजा ने गुरुजी के चरण स्पर्श करने के लिए ज्यों ही अपने हाथ नीचे किए श्री गुरुजी ने उनके हाथों को पकड़ लिया।
साढ़े दस बजे के लगभग चर्चा प्रारंभ हुई। महाराजा से भेंट के समय संघ का अन्य कोई अधिकारी वहां उपस्थित नहीं था।
महाराजा से उनकी क्या चर्चा हुई इसका ठीक लेखाजोखा उपलब्ध नहीं है; क्योंकि श्री गुरुजी ने उस चर्चा के बारे में विस्तार से किसी को कुछ नहीं बताया। चर्चा आशाजनक हुई और इसी विषय पर हुई है, यह इसी बात से सिद्ध होता है कि श्री गुरुजी को विदा करते समय महाराजा ने कहा कि मैं आपके सुझाव पर अवश्य विचार करुंगा। विदाई के समय उन्होंने श्रीगुरुजी को दो बहुमूल्य कश्मीरी शालें भेंट कीं। चलते समय श्री गुरुजी ने महाराजा को सलाह दी कि ‘युवराज को तो आप जम्मू भेज ही दें और आप श्रीनगर में रहें, जिससे जनता का मनोबल न टूटे। यहां स्वयंसेवक आपकी सुरक्षा का प्रबंध करेंगे।’
यह संकेत इस बात से भी मिलता है कि दूसरे दिन १६ अक्टूबर को वापस लौटते समय उन्होंने संघ के प्रमुख अधिकारियों को यह परामर्श अवश्य दिया कि वे महाराजा से सतत सम्पर्क बनाए रखें तथा उन्हें संघ के सब प्रकार के सहयोग का आश्वासन देते रहें, जिससे वे अकेलेपन का अनुभव कर हताश न हों। उन्होंने कहा कि चर्चा सुखद रही है। मुझे आशा की किरण नजर आती है। यद्यपि निश्चित कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
चर्चा के बाद शाम को उसी दिन लाल चौक के पास मंगलबाग में स्थित डी.ए.वी. कॉलेज मैदान पर पूर्व योजनानुसार प्रमुख स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण हुआ, संख्या लगभग ५०० थी। नगर के प्रमुख नागरिक भी वहां उपस्थित थे। उसके बीच श्री गुरुजी का बौद्धिक हुआ; परंतु इसमें उन्होंने महाराजा से हुई भेंट के बारे में कुछ नहीं कहा और १६ अक्टूबर को ही वे वापस लौट गए।
सरदार पटेल को पता था कि श्रीगुरु जी का महाराजा पर अच्छा प्रभाव है तथा वे श्री गुरुजी व संघ पर श्रद्धा करते हैं। उन्होंने भी श्री गुरुजी के इस प्रवास में सहयोगी की भूमिका ही निभाई। श्री गुरुजी ने भी श्रीनगर से लौट कर महाराजा की अनूकुल मनस्थिति से सरदार पटेल को अवगत कराया। सौभाग्य से तब तक श्री मेहरचन्द महाजन जम्मू- कश्मीर के प्रधान मंत्री का पदभार सम्हाल चुके थे। वे भी कश्मीर के भारत में विलय के प्रबल समर्थक थे तथा उनकी भी श्रीगुरुजी के प्रति श्रद्धा थी। पंजाब के स्वयंसेवकों ने समाज रक्षा के लिए जो किया था, वे उससे सुपरिचित थे। उन्होंने भी सहयोग किया। महाराजा को वे बताते रहे कि श्री गुरुजी का परामर्श सही है।
श्री गुरुजी की इस भेंट व अन्य परिस्थितियों के कारण अंतत: महाराजा ने विलय का निर्णय कर लिया और २६ अक्टूबर को राज्य के विलय पत्र पर हस्ताक्षर हो गए। इस प्रकार असंदिग्ध रूप से यह कहा जा सकता है कि कश्मीर के भारत में विलय करने हेतु महाराजा को तैयार करने में संघ स्वयंसेवकों विशेषकर श्रीगुरुजी की अहम् भूमिका रही है। यह भी कहा जा सकता है कि गुरुजी की यह भेंट महाराजा को विलय का निर्णय करवाने में निर्णायक रही; क्योंकि उस भेंट के बाद ही विलय की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। पाकिस्तानी हमले ने उस निर्णय पर अंतिम मुहर लगवाई।

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