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  हमारे संस्कार तो हमारी घुट्टी में मिले होते हैं ,यह बात धीरे-धीरे पुरानी पड़ती जा रही है क्योंकि आजकल के बच्चे पुरातन संस्कार की बात से ही  बिदक जाते हैं | बड़ों के चरण स्पर्श की जगह सिर्फ हेलो से काम चल जाता है | ऐसा क्यों हुआ ? क्या कभी सोचा है ? इक्कसवीं सदी की इस भागती-दौड़ती जिंदगी में बच्चों से संस्कार की अपेक्षा आखिर कब तक करें ? जब बड़े ही जीवनमूल्य खोने लगें तो आखिर बच्चे क्या करें ? मुझे लगता है हमारी जीवन शैली ही संस्कार का स्त्रोत होती है ,बच्चों को उपदेशपरक भाषणों से कुछ नहीं सिखाया जा सकता बल्कि बचपन से ही घर का वातावरण और पालकों का व्यवहार इस तरह का हो कि बच्चे कई गुण अपने आप ही आत्मसात कर लें|

इसके लिए हमें सोचना है कि वे कौन सी बातें हैं जो हमारे जीवन से तेजी से निकलती जा रही हैं | थोड़े से प्रयास से हम इन्हें अपना सकते हैं –

घर में सिर्फ मातृभाषा बोलें:

भाषा अपने आप में विशाल संस्कृति होती है | वह हमारे पुरातन संस्कारों की वाहक होती है | भारतीय लेखकों को पढ़ने के लिए अपनी भाषा का ज्ञान अति आवश्यक है | पठन-पाठन से निश्चित ही बच्चों का व्यक्तित्व विकास होता है |

योग- व्यायाम स्वयं करें एवं बच्चों को भी प्रेरित करें :

बच्चों में अनुशासन बनाए रखने के लिए उनका योग करना बहुत आवश्यक है, इससे उनका किसी भी कार्य को करने के लिए ध्यान केन्द्रित रहता  है और तन-मन भी  स्वस्थ रहता है | योग विद्या के कुछ श्लोक जीवन जीने की शैली बताते हैं और मन से असमंजस की स्थितियों को दूर कर बच्चों में आत्मविश्वास उत्पन्न करते हैं |

खेल-खेल में महापुरुषों की जीवनियाँ सुनाये :

कोई भी कार्य करने में जब बाधा आती है तब बच्चे क्या बड़े भी हताश हो जाते हैं ,इस हताशा को दूर करने के लिए महापुरुषों की जीवनियाँ ही सहायक होती हैं | बच्चे यदि इन्हें मनोरंजन के तौर पर कामिक्स के रूप में पढ़ना चाहें तो पढ़ने दें ये उनके उच्च चरित्र निर्माण में सहायक होंगी |

अपने बुजुर्गों का आदर करें :

याद रखें आपके बच्चे लगातार आपके आचरण का अनुसरण कर रहे  हैं अत: आप अपने माता-पिता व अन्य बुजुर्गों का हमेशा आदर करें वे भी बड़े होकर आपको उतना ही सम्मान देंगे |

बच्चों के साथ  समय गुजारें :

समय सबसे अनमोल है ,उससे बढ़कर कोई वस्तु नहीं ,उसकी पूर्ति कितना भी बड़ा उपहार देकर नहीं हो सकती | बच्चों के साथ समय व्यतीत करते वक्त आप उनकी कई परेशानियों को समझते हैं और उन्हें दूर करने के लिए कुछ सलाह भी देते हैं | यह वह समय होता है जो बच्चे जीवन भर याद रखते हैं |

कई बार हम बच्चों से कई अपेक्षाएं करते हैं पर हमने उन्हें उस ढंग से ढाला ही नहीं होता | शैशवास्था में जब वे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, हमें एक कुम्हार की तरह उन्हें जीवन के चाक पर ढालना होता है प्रेम के जल से मृदु और अनुशासन के ताप में कुछ कठोर बनाना पड़ता है | यही वह अवस्था है जिसमें मिले संस्कार एक सद्चरित्र व्यक्ति का निर्माण करते हैं |

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