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कश्मीर भारत का सब से संवेदनशील क्षेत्र होने से आए दिन हिंसा और राजनीति को लेकर चर्चाओं में रहता है। अशांति जम्मू एवं कश्मीर के लिए नई बात नहीं है। सम्पूर्ण मानव सृष्टि के आदि महर्षि कश्यप की कर्मस्थली, इस देश की मूल आर्य-वैदिक संस्कृति का प्रारंभ बिंदु, आद्य शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी’ और कल्हण की ‘राजतरंगिणि’ के स्वर जहां गूंजे ऐसा भारत माता का भाल प्रदेश है कश्मीर। यह कश्मीर पिछले सात दशकों से अस्वस्थ है। समाज का बुद्धिजीवी वर्ग कश्मीर की अस्वस्थता को लेकर संभ्रमित है। सात दशकों में कम से कम ६० साल सत्ता पर काबिज रहा कांग्रेस नेतृत्व इस समस्या की भ्रांति और संभ्रम दोनों में उलझा रहा। पाकिस्तान से थोपे गए इस अघोषित युद्ध को गत ७० सालों में कांगे्रस सरकार और मीडिया के सहयोग से नाम दे दिया गया ‘कश्मीर समस्या’। जरा सोचिए क्या यह समस्या सम्पूर्ण देश की समस्या नहीं है? कश्मीर को हम अपना भाल प्रदेश मानते हैं और भारत एक शरीर है ऐसी हमारी धारणा है। जब शरीर का भाल प्रदेश अस्वस्थ होगा तो शरीररूपी भारत देश कैसे शांत रहेगा? कश्मीर की त्रासदी को हम ‘कश्मीर समस्या’ कह कर भारत के इस अविभाज्य अंग को भारत से अलग सिद्ध करना चाहते हैं। कश्मीर संकट यह भारत की समस्या है।
देश का जनसामान्य कितना जानता-समझता है जम्मू-कश्मीर या उसकी समस्याओं के विषय में? केवल उतना ही जितना वह समाचार पत्रों में पढ़ता है, टीवी चैनलों के समाचारों में सुनता है। विद्यार्थी अवस्था में पढ़ते समय लेह, लद्दाख, गिलगिट, बाल्टिस्तान, कारगिल, द्रास, पुंछ, राजौरी ये कश्मीर राज्य के दुर्गम इलाके हैं, यह बात ध्यान में ही नहीं आती। गत ७० वर्षों में आई विविध सरकारों, मीडिया, नौकरशाहों सभी ने मिल कर कश्मीर की स्थिति को अनावश्यक रूप से रहस्यमय बना कर रखा है। जितना हमारे सामने आता है, उससे हमारे मन में जो छवि मन में बनती है वह कश्मीर की वास्तविकता से कोसों दूर है।
हमें ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे कश्मीर में अलगाववाद की हवा है। कश्मीर की आम जनता भारत से अलग होना चाहती है। सत्य यह है कि अलगाववाद की आवाज केवल कश्मीर घाटी नाम से पहचाने जाने वाले एक छोटे से क्षेत्र में है। जम्मू-कश्मीर राज्य के २२ जिलों में से ५ जिलों में अलगाववादी घटना होती है। १७ जिले अत्यंत शांत हैं। केवल श्रीनगर, अनंतनाग, सोपियां, बारामूला और पुलवामा ही इस अलगाववाद आंदोलन का केंद्र है। किसी भी टी.वी. चैनल पर कश्मीर पर कोई परिचर्चा हो तो गिलानी, मीरवाइज, शब्बीर शाह, यासीन मलिक, फारूख अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला जैसे कुछ गिने-चुने चेहरे ही देश को दिखाए जाते हैं। सच बात यह है कि ये सभी चेहरे उन्हीं पांच में से दो ही जिले के निवासी हैं।
न तो अनुच्छेद ३७० को कोई स्थायी मान्यता है और न ही इसके अंतर्गत जम्मू- कश्मीर राज्य को किसी विशेषाधिकार का वादा किया गया है। मात्र ३ वाक्य, २० पंक्तियों, २४० शब्दों का यह अनुच्छेद है। डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता में गठित संविधान प्रारूप समिति ने भारत के प्रस्तावित संविधान का जो मूल मसौदा प्रस्तुत किया था उसमें यह प्रावधान नहीं था। १९५४ में एक अध्यादेश जारी हुआ, जिसके अंतर्गत शेष भारत के लोगों को अधिकार से वंचित कर दिया गया। इसका ३७० से कोई सम्बंध नहीं है। इस समस्या का जन्म १९४७ में भारत की स्वतंत्रता के साथ हुए दुर्भाग्यशाली बंटवारे से हुआ। पाकिस्तान की इच्छा सदैव से जम्मू-कश्मीर रियासत को पाकिस्तान के साथ मिलाने की थी, जिसके लिए कबाइली आक्रमण के रूप में भारत की सीमा को आक्रमित करना पाकिस्तान ने प्रारंभ किया। १९६५ और १९७१ में दो प्रत्यक्ष युद्ध हुए। अनेक वार्ताओं और प्रयासों के बावजूद भी पाकिस्तान अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है।
बुरहान वानी जैसे आतंकियों कि मौत पर मानवाधिकार हनन का नारा बुलंद करने वाले झूठे मानवाधिकारवादी हैं। कश्मीर घाटी से प्राण रक्षा के लिए विस्थापित होकर दर-दर की ठोकरें खाने को विवश कश्मीरी हिंदुओं के मानवाधिकार संरक्षण के लिए ये क्यों नहीं आवाज उठाते? क्या हिंदू मानव नहीं है? या उनको जीने का अधिकार नहीं है? जिन हिंदुओं की पीढ़ियों ने शरणार्थी शिविरों में जीवन गुजार दिया, क्या उनके प्रति देश का कोई कर्तव्य नहीं है? साढ़े पांच लाख से ज्यादा कश्मीरी हिंदू अपने घरबार छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी होने की पीड़ा भोग रहे हैं। क्या कभी उन्हें न्याय मिलेगा? क्या पुनः वे कभी अपनी उस पवित्र जन्मभूमि के दर्शन कर पाएंगे?
‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’ इस वैचारिक उद्घोष को लेकर डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसके लिए उनका बलिदान हुआ। क्या डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का क्षेत्र की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए हुआ यह बलिदान व्यर्थ रह जाएगा? देश के विद्वान लोगों का कर्तव्य है कि वे इस विषय पर तथ्यों को सटीक रूप से जनता के समक्ष प्रस्तुत करें। कश्मीर समस्या देश की समस्या है। देश में इस बात पर विचार हो, पूरा भारत देश भावनात्मक रूप से इस सीमावर्ती राज्य के साथ जुड़े। कश्मीर त्रासदी के समाधान के लिए गंभीर वैचारिक मंथन करें। इसके लिए अपने-अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों पर सामूहिक रूप से दबाव बनाएं ताकि जनप्रतिनिधि राष्ट्रीय समस्या के समाधान के लिए किसी कार्य योजना पर विचार करें।
जम्मू-कश्मीर की वास्तविकताओं को अपने पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करना ‘हिंदी विवेक’ का प्रयास रहा है। कश्मीर भारतरूपी शरीर का मस्तिष्क है। इस मस्तिष्क के माथे को शांत किए बिना देश के अन्य भागों की रक्षा नहीं की जा सकती। इस कारण कश्मीर जैसे सीमाप्रांत के संदर्भ में जीवंत संवाद करने का प्रयास ‘हिंदी विवेक’ ने कश्मीर विशेषांक के माध्यम से किया है। कश्मीर की वास्तविकताओं को समझने की और सीमाक्षेत्र में समाधान की तलाश की प्रबल इच्छा ‘हिंदी विवेक’ के पाठकों और बुद्धिजीवी वर्ग के मानस को झकझोरेगी, तभी ‘हिंदी विवेक’ का यह प्रयास सफल होगा। इस देश का सोया हुआ गौरव भाव पुनर्जागृत करना यही प्रयास ‘कश्मीर विशेषांक’ के प्रकाशन कार्य की पृष्ठभूमि में है। कश्मीर एक भूखंड मात्र नहीं, सजीव और सप्राण भारतमाता का पवित्र अंश है। इस पर किसी की जरा-सी भी वक्रदृष्टि हमारे लिए असह्य है।

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