हिंदी विवेक : we work for better world...

आज कॉलेज के कुछ छात्र-छात्राओं के एक ग्रुप के संवाद सुने।
एक लडके ने अपने ग्रुप की लडकियों से पूछा ‘वुमेन्स डे आ रहा है….क्या प्लान है?’
एक लडकी ने तुरंत जवाब दिया ‘मॉल में सभी जगह सेल चल रही है खूब शॉपिंग करेंगे। एक दिन कॉलेज बंक और केवल ऐश……’।
‘अरे ये क्या! कॉलेज बंक और सेल तो हमेशा की बात है, कुछ नया अलग करो।’ लडके का जवाब….
दूसरी लडकी ने पूछा ‘क्या केवल एक दिन कुछ अलग या नया करने से काम चल जाएगा?’
सवाल बहुत ही सटीक लगा मुझे……..
उस ग्रुप में आगे क्या बातें हुईं, किसने आगे क्या पूछा, किसे क्या जवाब मिला पता नहीं; क्योंकि मैं आगे बढ चुकी थी…पर वो सवाल मेरे दिमाग में बैठ गया कि एक दिन कुछ अलग करने से क्या हो जाएगा? कहने को तो ये ‘डे’ मनाने की परंपरा पाश्चात्य संस्कृति की देन है, परंतु अब हमारे यहां भी इसका फैशन सा हो चला है। मित्रता का एक दिन, प्यार का एक दिन और महिलाओं का एक दिन….पर बाकी के ३६४ दिनों का क्या?
गीता और बबीता फोगट बहनों का नाम दंगल फिल्म के पहले शायद ही किसी ने सुना हो। दंगल फिल्म ने इन्हें न केवल शोहरत दिलाई बल्कि एक ऐसा क्षेत्र जहां पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था वहां भी महिलाएं सफल हैं; यह साबित कर दिया। दंगल फिल्म को थियेटर से निकले अभी कुछ ही दिन हुए होंगे, इन बहनों का नाम शायद ही थोडा सा लोगों की स्मृति में धुंधला हुआ होगा कि फिल्मी गीतकार जावेद अख्तर ने इनके अनपढ होने पर सवालिया निशान लगा दिया। क्या इनका नारी सम्मान केवल पढाई तक ही सीमित है? क्या देश का नाम ऊंचा करने वाली इन बहनों के प्रति इस प्रकार की मानसिकता जायज है?
यह उदाहरण, ये प्रश्न चर्चा का विषय रहे इसलिए लोगों के मन में, दिमाग में घूमते रहे। परंतु जो महिलाएं हर चकाचौंध से दूर अपने कार्यालय, अपनी गृहस्थी, अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही हैं; क्या उन्हें केवल एक दिन आदर, सम्मान, उपहार, आराम देना पर्याप्त होगा? नहीं! यह सब हर दिन होना आवश्यक है।
महिलाएं समाज की वो माली हैं जो उसे नंदनवन बनाती हैं। बशर्ते उनकी पीडा, उनके दर्द को भी समझा जाए। नंदनवन को सजाते हुए अगर उनके हाथ में कोई कांटा चुभता है तो उसकी पीडा उसे अकेले ही सहनी होती है। वह सहती भी है पर अगर कोई उसे प्रेम से केवल इतना ही पूछ ले कि ‘दर्द ज्यादा तो नहीं’ तो उसमें सौ गुना अधिक दर्द सहने की क्षमता आ जाती है। दुर्भाग्य से आज भी समाज में यह प्रश्न पूछने वालों का प्रतिशत बहुत कम है।
ओलम्पिक में मेडल जीतना, पीएसएलवी का सफल परीक्षण, सेना में शौर्य का परिचय, बैंकिंग, चिकित्सा, इंजिनियरिंग इत्यादि में से कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाएं नहीं हैं। इतनी सफलताओं के बाद भी कन्या भ्रूण हत्या में कमी दिखाई नहीं देती। समाज के इस असंतुलन को संतुलित करना बहुत आवश्यक है। अत: महिलाओं का कोई एक ‘दिन मनाने’ से अच्छा है साल के हर दिन उनके साथ सम्मान तथा शालीनता का व्यवहार हो। उन्हें मानसिक और भावनात्मक आधार दिया जाए जिससे वे अपना नंदनवन अधिक सुंदर बना सकें।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu