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राजनीति में महिलाओं की सहभागिता बढ़ रही है, मगर जिस मात्रा में बढ़नी चाहिए थी, वैसी नहीं बढ़ी है। आज महिला किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है… महिला को भी भगवान ने वही बुद्धि दी है, वही काम करने की शक्ति दी हुई है, वही समझ दी है, जो एक पुरुष को दी है। महिला के साथ तो थोड़ी क्वालिटिज और जुड़ जाती हैं, क्योंकि वह घर-परिवार भी संभालती है। प्रबंधन, सहनशक्ति और समायोजन की उसमें गजब की शक्ति होती है, जो उसे राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में ताकतवर बनाती है।

महाराष्ट्र के चिपलूण शहर से अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ करके इंदौर से होते हुए दिल्ली तक पहुंचने वाली सभी की आत्मीय ‘ताई’ अर्थात सुमित्रा महाजन। राजनीति की कोई भी पारिवारिक पृष्ठभूमि न होते हुए भी सुमित्रा महाजन आज देश के सर्वोच्च पदों में से एक लोकसभा के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं।
मराठी सम्बोधन ‘ताई’ का अर्थ होता है बड़ी बहन। सुमित्रा जी से जब पूछा गया कि वे संसद के सदन में ‘ताई’ होने का कर्तव्य कैसे निभाती हैं तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि ‘ताई’ का काम होता है, प्रेम से समझाना और समय आया तो डांटना भी। मगर डांटना भी प्रेम से हो और सही बात के लिए हो तो मुझे लगता है कि उसे इसी रूप में लोग भी समझेंगे। मैं पूरी कोशिश करती हूं कि सबको बोलने का मौका मिले।

सुमित्रा महाजन अपने पिता श्री पुरुषोत्तम (उर्फ अप्पा) साठे से प्राप्त संस्कारों को अपने अंदर गहराई से संजोए हुए हैं। ये संस्कार ही उनके व्यक्तित्व विकास की नींव हैं। सुमित्रा जी ने चिपलूण के यूनाइटेड इंग्लिश हाईस्कूल से शिक्षा प्राप्त की। उनके सभी शिक्षक उनके पिता से परिचित थे। अत: सुमित्रा जी की शिक्षा पारिवारिक वातावरण में हुई। घर पर पिता का अनुशासन, समाज के विभिन्न स्तर के लोगों के साथ उनके सम्बंध, उनके व्यवहार से प्रकट होने वाली देशभक्ति, सर्वसामान्य लोगों के प्रति निःस्वार्थ प्रेम, संघ की प्रार्थना के ‘त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयम्’ का श्रद्धापूर्वक पालन करने की इच्छा आदि सभी को किशोरावस्था में ही सुमित्रा जी ने आत्मसात किया। अपने पिता के साथ बड़े-बड़े लोगों के भाषण सुनने जाना सुमित्रा जी को पसंद था। यहीं से उनकी वक्तृत्व कला का भी विकास हुआ। विद्यालयीन/महाविद्यालयीन कई भाषण प्रतियोगिताओं में उन्होंने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। सुमित्रा जी की माता का अल्पायु में ही देहांत हो गया था तथा पिता के अचानक देहांत से सुमित्रा जी की शिक्षा तथा लालन-पालन का प्रश्न सामने आ गया। चूंकि सुमित्रा जी के शिक्षक श्री मधु बरवे उनके पिता के अच्छे मित्र भी थे; अत: सुमित्रा जी ने उन्हीं के यहां रह कर दसवीं तक की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे मुंबई आईं। मुंबई में पढ़ाई के दौरान ही उनका विवाह इंदौर के वकील जयंत महाजन से हुआ और चिपलूण की कन्या बहू बनकर इंदौर आ गई।

मायके में पिता के माध्यम से सुमित्रा जी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार हुए और ससुराल में सासू मां के माध्यम से राष्ट्र सेविका समिति के। सुमित्रा जी अपनी सास के साथ समिति की शाखाओं और कार्यक्रमों में जाने लगीं। वे रामायण तथा महाभारत पर प्रवचन देती थीं। वकृत्व कला में तो वे पहले से ही निपुण थीं, अब मराठी के साथ-साथ हिंदी पर भी उनकी अच्छी पकड़ हो गई। इसका सुपरिणाम उनकी राजनीतिक यात्रा पर हुआ।

सुमित्रा महाजन कहती हैं कि समाजसेवा के संस्कार तो उन्हें बचपन से ही मिले थे; परंतु वे राजनीति में कदम रखेंगी यह उन्होंने नहीं सोचा था। उन्होंने सर्वप्रथम पार्षद पद का चुनाव जीता। फिर वे इंदौर की उपमहापौर रहीं। इंदौर की जनता ने उन्हें बहुत सम्मान और प्रेम दिया। सर्वप्रथम उन्होंने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के तत्कालीन गृहमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के विरुद्ध चुनाव लड़ा था। चुनावी रैली में जब वे दोनों आमने-सामने आए तो उम्र और तजुर्बे में बड़े होने के कारण सुमित्रा जी ने उनके पांव छूकर आशीर्वाद मांगा और वे विजयी हुईं भी। इसके बाद उन्होंने इंदौर से लगातार आठ बार लोकसभा का चुनाव लड़ा और वे हर बार विजयी रहीं। उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवानी जैसी ज्येष्ठ हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। राजनीति में निरंतर आगे बढ़ते हुए वे आज लोकसभा की अध्यक्ष बन गईं हैं।

हम अगर लोकसभा का कोई सत्र देखें तो वह किसी ऐसी कक्षा की तरह प्रतीत होता है जहां विद्यार्थी लगातार शोर मचाते रहते हैं और उस कक्षा की अध्यापिका कभी शांति से, कभी डांट कर तो कभी दंडात्मक कार्रवाई करके उन्हें नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं। कक्षा की अध्यापिका अर्थात लोकसभा की अध्यक्ष के रूप में सुमित्रा महाजन कहती हैं कि यह कोई एकाध क्लास संभालने वाली बात नहीं है। लोकसभा में विभिन्न प्रदेशों से लोग आते हैं, विभिन्न प्रदेशों में भी भिन्न-भिन्न भाषाओं के लोग हैं। पहले जब सदन चलता था तो जो सांसद बोलते थे, उनमें बहुत अच्छे-अच्छे और बड़े-बड़े लोग रहे हैं। उनकी आपस में जो चर्चाएं होती थीं, वह बड़ी ही रोचक होती थीं। अब उसमें बदलाव आता जा रहा है, यह चुनौतीपूर्ण है और सांसदों को तो अपनी पार्टी के अनुसार भी चलना होता है। अब हर एक चाहता कि उन्हें भी बोलने का समय मिले, उनकी भी बात सुनी जानी चाहिए। अब सब को समायोजित करते हुए सदन चलाना और सबको बोलने का मौका देना वाकई बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य है।

अध्यक्ष बनने के बाद आए अनुभवों के बारे में पूछे जाने पर वे कहती हैं कि अध्यक्ष बन कर तो अच्छा लग रहा है; क्योंकि वास्तव में कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह काम मेेरे स्वभाव के अनुसार है। १९८९ से लेकर आज तक जिस तरीके से लोकसभा में मैंने काम किया है, कई चींजे देखी हैं और ऐसा लगता है कि उस अनुभव का कहीं न कहीं फायदा तो मिलेगा और सदन अच्छे तरीके से चल सकेगा।

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कि क्या लोकसभा चुनावों के बाद नए सांसदों के आने से सदन की कार्यवाही में अंतर पड़ा है, वे कहतीं हैं कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। १९८० में भी ३०० से ज्यादा नए सांसद बने थे। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि जो नए सांसद हैं, उन्हें यहां की परम्पराएं क्या है, किस तरीके से व्यवहार होना चाहिए, अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों का काम संभालना, लोक सभा में विधायी कार्य संभालना या नियम बनाना, विधेयकों पर चर्चा करना, कानून बनाना, आदि के बारे में प्रशिक्षण सभी सांसदों को शुरू-शुरू में देना जरूरी है। यह एक छोटी-सी बात है कि अगर अध्यक्ष खड़ी हैं तो बाकी सदस्यों को बैठना है, उठ कर बोलते नहीं रहना है। ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं, जिसके बारे में प्रत्येक को जानकारी होनी चाहिए। वरिष्ठ सांसदों के साथ उनकी चर्चा कराई जाए तो भी काफी कुछ सीखा जा सकता है।

महिलाओं के संदर्भ में वे स्पष्ट मत रखती हैं। उनके अनुसार महिलाओं को समाज में कुछ मर्यादाओं का पालन करना पड़ता है, परंतु इससे दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। राजनीति में महिलाओं की स्थिति के बारे में वे कहती हैं कि मैं उससे संतुष्ट तो नहीं हूं। राजनीति में महिलाओं की सहभागिता बढ़ रही है, मगर जिस मात्रा में बढ़नी चाहिए थी, वैसी नहीं बढ़ी है। आज महिला किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है, वह कुछ भी कर सकती है और मेरी अपनी मान्यता है कि भगवान ने महिला को कोई कम आंक कर नहीं भेजा, बल्कि उसे वही बुद्धि दी है, वही काम करने की शक्ति दी हुई है, वही समझ दी है, जो एक पुरुष को दी है। दोनों को समान रुप से एक मनुष्य बनाया है। इनमें मनुष्य की सभी क्वालिटीज हैं और फिर अपने अनुभव के आधार पर मैं कहती हूं कि महिला के साथ थोड़ी क्वालिटिज और जुड़ जाती हैं, क्योंकि वह घर भी संभालती है। उस समय वह फैमिली को मैनेज करती है, उसके अपने अनुभव उसमें जुड़ते हैं, वह बहुत से काम कर सकती है। उसमें वह ताकत आ जाती है। महिलाएं अच्छा कर सकती हैं। मगर राजनीति मेरा भी क्षेत्र हो सकता है, यह मानने में अभी भी महिलाएं पीछे रह जाती हैं। यानि मौका मिलने की बात है। मैं अपना खुद का उदाहरण देती हूं, मेरी कभी इच्छा नहीं रही कि मैं राजनीति में आऊं। हालांकि एक प्रकार से मुझे हाथ पकड़ कर लाया गया कि नहीं तुम्हें यह करना है। शादी के दस साल बाद तक मेरा भी यही मानना था कि मुझे सामाजिक काम करना है, सामाजिक संस्थाएं हैं, साहित्यिक संस्थाएं हैं, मेरा यही लक्ष्य था। मैंने राजनीति में आने के बारे में कभी नहीं सोचा था।

वास्तव में मेरे ससुराल में, मायके में भी इतना नहीं, पर मायके में संघ का वातावरण था। ससुराल में किसी भी प्रकार से राजनीतिक वातावरण नहीं था। मगर जब मैंने काम करना शुरू किया तो शुरू में साइकिल पर घूमती थी। इंदौर में तो साइकिल का प्रचलन बहुत था। फिर धीरे-धीरे मेरा काम थोड़ा सा बढ़ता गया। बाहर ज्यादा जाना पड़ता था। यह देखकर मेरे पति ने मुझे लूना लाकर दी। सहयोग तो धीरे-धीरे मिला; मगर फिर भी भाव यह रहता था कि घर में कोई तकलीफ नहीं हो, तुम्हारे जाने से मेरी मां को कोई तकलीफ नहीं हो, तो मैं कई बार बाहर जाते समय सुबह जल्दी उ़ठ कर सब्जी-रोटी बनाकर चली जाती थी। मेरी सासू मां का मुझे बहुत सहयोग मिला। एक बार सुषमा जी का दौरा था। मुझे कहा गया था कि आप उनके साथ दौरे पर रहेंगी। मध्यप्रदेश का ४-५ दिन का दौरा था। मुझे उनके साथ रहना था। मेरा बेटा उस समय ७-८ साल का था। उसने एक दिन पहले बोला था कि मां जाते समय लड्डू बनाकर जाना। मैंने हां कहा था, परंतु बनाना रह गया था। उसने फिर पूछा, तो मैंने कहा कि दादी बना देंगी। वह बोला कि नहीं, मुझे तो तुम्हारे ही हाथ के खाने हैं। फिर मुझे कहना पड़ा कि सुषमा जी १५ मिनट देर से निकलेंगे। मगर मैं लड्डू बनाकर निकली। मैंने यह प्रयास किया कि घर का काम भी संभालना है। उसके लिए मेहनत तो ज्यादा करनी पड़ती है। कई सारी और भी घटनाएं हैं।

अब तो मैं उसके पार हो गई हूं; क्योंकि अब बहुएं आ गई हैं। अब मुझे घर की जिम्मेदारी ज्यादा नहीं संभालनी पड़ती है। लेकिन आज भी मेरी कोशिश रहती है कि मैं परिवार को भी देखूं।

इसमें दो बातें हैं। एक तो महिलाओं को खुद भी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जैसा कि मैंने कहा, मैं अपनी सासू मां को कह सकती थी कि आप बना दो। मेरी सासू मां ने तो नहीं कहा था कि मैं नहीं बनाऊंगी। महिलाएं खुद भी नहीं छोड़ पाती हैं। यह हम लोगों का स्वभाव है। आखिर हम मां हैं। हम स्वयं यह सोचती हैं कि सबको संतुष्ट रखें। इसलिए स्वयं को सिद्ध भी करना होता है। महिला होने के नाते मुझे कोई कन्सेशन नहीं चाहिए। अगर मुझे चुनाव लड़ना है, अगर मुझे कोई काम करना है, तो मैं अपने आप अभ्यास करुंगी, स्वयं ही घूमूंगी। अगर मीटिंग में जाना है तो मैं यह राह देखूं कि कोई मुझे साथ ले जाएगा, इस तरह से तो मैं आगे नहीं बढ़ सकती। स्वावलम्बन हर समय पैसे से नहीं होता है। अपने व्यवहार का भी एक स्वावलम्बन होता है।

वास्तव में महिलाओं में सहनशक्ति होती है, साथ ही उनमें एड़जस्टमैंट की भावना भी होती है; क्योंकि उनको शुरू से बताया भी जाता है कि अगर अपने घर जाओगी तो तुम्हें सबको खुश रखना पड़ेगा। एक परिवार को छोड़ कर दूसरे परिवार में आकर सैटल होना है। आप कल्पना कीजिए कि २०-२२ साल तक आप एक परिवार में रह रहे हंैं, अलग संस्कार, एक प्रकार के अलग व्यवहार हैं, एकदम से जैसे एक पेड़ को उखाड़ कर दूसरी जगह लगाया जाता है, फिर उसमें उसको पनपना है, यह बहुत कठिन काम है। लेकिन महिला वह करती है क्योंकि उसमें उतनी शक्ति होती है। उसमें मानसिक तैयारी भी बहुत होती है। यह सभी महिलाओं में है। उनमें एड़जस्टमैंट है। उसके पास ये सब गुण हैं। वह जब समाज में काम करने के लिए निकलती है या राजनीति में काम करने लग जाती हैं तो इसका फायदा उसको मिलता है। मैनेजमेंट, एक घर को सब प्रकार से मैनेज करना- घर का बजट बनाने से लेकर उस बजट के अंदर घर को चलाना और सबको खुश रखना, अगर वह उस चीज का मैनेजमेंट करती है तो उसका फायदा उसे बाहर काम करने में मिलता है और पॉलीटिक्स में तो आपको ये सब बहुत जरूरी होता है। आज नहीं तो कल यह काम होगा, मुझे काम करना है, मुझे यहंा खड़े रहना है। ये जो है, यह महिलाओं में थोड़ा सा ज्यादा है। उसको बढ़ावा देते हुए, उस कैरेक्टर को जीते हुए महिला आगे जा सकती है।

ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी, मगर हां कामकाज जरूर ठप हुआ, लेकिन उसको भी एक महिला ने ही संभाला था। वह सब करना कठिन था। मगर उसमें ज्यादा से ज्यादा अच्छे से काम कैसे निकालना है यह देखना पड़ेगा। ‘एफिशिएंसी’ लानी पड़ेगी और वह भी ‘क्वालिटेटिव एफिशिएंसी’- ये सब चीजें चुनौती के रूप में मेरे सामने हैं।

मेरा अपना मानना है कि जो पूर्ण बहुमत मिला है, यह भी एक प्रकार का चैलेंज है। जैसे लोगों ने इस सरकार को कह दिया है कि लो, अब कर के दिखाओ, हमें सुशासन चाहिए, हमें इन सब बातों से मुक्ति चाहिए, हमें एक अच्छा हिन्दुस्तान चाहिए। अब हम आपको पूरा ‘मैन्डेट’ दे रहे हैं, ‘नाऊ यू हैव टू प्रूव’, तो ‘यू हैव टू प्रूव!’ यह एक चैलेंज है इस सरकार के सामने, ‘नो ड़ाउट’, यह सरकार को करना है। मगर यह बदलाव आया, एक प्रकार से ठीक भी है। अब कोई यह नहीं कह सकता है कि मेरे पास यह नहीं है, मैं नहीं कर सकता हूं, मैं क्या करूं, यह नहीं मान रहा है, इसके साथ चलना पड़ता है। साथ ही साथ एक चैलेंज मेरे लिए हो गया है कि बहुमत है, लेकिन बाकी की जो पार्टियां हैं, भले ही उनका संख्याबल कम हो, लेकिन वे भी इस लोकतंत्र की अभिन्न अंग हैं। उनको भी बोलने का अधिकार देना पड़ेगा, देना है। तो उनको अकोमोडेट करते हुए, सामंजस्य के साथ एक अच्छे पथ पर दोनों को मिलकर चलना है, यह भाव संसद में बनाना पड़ेगा।

सुमित्रा जी कहती हैं कि जो भी सपने देखना है, वह यथार्थ से जुड़े हुए होने चाहिए। अपनी क्षमता, अपने आसपास का वातावरण, माहौल भी निर्णायक होते हैं सपने पूरे करने में। सपने तो कोई भी देख सकता है कि मैं यह बनूं। सपने देखें भी तो उसकी पूर्ति के लिए हमें ही प्रयत्न करना है, कोई दूसरा आकर आपके सपने पूरा नहीं करेगा। मैं यह नहीं कहूंगी कि सपने उस मर्यादा में ही देखो, ऐसा नहीं है, लेकिन अगर सपना हम देखते हैं तो उसकी पूर्ति भी हमें ही करनी है। उसको साकार करने के लिए हमें ही मेहनत करनी है। यह समझ कर हमें मेहनत करनी पड़ेगी, काम करना पड़ेगा। जैसे मैं बताऊं कि जब पहली बार संासंद बनी या मैंने जब राजनीति में शुरुआत की, तो कही न कहीं मैं अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए राजनीति में आई। उस समय इमरजेंसी के बाद मैंने राजनीति शुरू की, बल्कि एक प्रकार से इमरजेंसी के दौरान ही मैंने राजनीति शुरू की। अन्याय नहीं होना चाहिए, मैं लडूंगी, मैं यह काम करके दिखाऊंगी और यह करते समय मुझे कुछ नहीं चाहिए। मगर सबसे पहले मुझे एक अच्छा इंसान होना है, राजनीति अगर खराब हो गई है तो इस राजनीति को ठीक करने के लिए मैं केवल किनारे पर बैठ कर यह नहीं कह सकती हूं कि राजनीति खराब हो गई है। प्रवाह में उतर कर जितना बने उतना इसे साफ करने के लिए प्रयास करूं। यह मेरा सपना था, मैं साबित कर दूंगी कि राजनीति में ईमानदार भी हो सकते हैं, राजनीतिज्ञ मेहनत भी करते हैं, और जितना बने जनता का काम तो करते ही हैं। आज मैं यह कह सकती हूं कि जितना मैंने सोचा था, एक सपना देखा था कि मैं यह करूंगी, तो कहीं न कहीं मैं इसमें विजयी हो गई। आज २५ साल तक राजनीति करने के बाद, अनेक पदों पर रहने के बाद एक ईमानदार की छवि तो पाई हूं। यह भी छवि बना पाई कि हां, राजनीतिज्ञ ईमानदार होते हैं और मेहनत भी करते हैं, कुछ करके दिखाते हैं। छवि में यह थोड़ा सा परिवर्तन आया है, ऐसा लगता है।

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