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१९९२ में भारतीय थल सेना में महिला अधिकारियों के लिए दरवाजे खुले। सेवा काल भी ७ वर्ष से बढ़ कर १४ वर्ष कर दिया गया है। आर्मी मेडिकल कोर (ए.एम.सी.) मिलिटरी नर्सिंग कोर के अलावा महिलाओं के लिए सेना में नए-नए क्षेत्र खुल रहे हैं। ए.एम.सी. एवं एम.एन.सी. के अतिरिक्त स्त्री अधिकारियों को आफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओ.टी.ए.) में प्रशिक्षण दिया जाता है। एक वर्ष के प्रशिक्षण के बाद अधिकारी लेफ्टिनेंट के रूप में पदस्थ की जाती हैं।

पहली घटना
असम का राष्ट्रीय राजमार्ग। विद्रोहियों का प्रभाव क्षेत्र। भारतीय सेना की मोबाइल चेक पोस्ट वहां अक्सर देखने को मिलती है। अवैध माल या शस्त्रों की आवाजाही न हो इसके लिए की जाने वाली कार्रवाई। रात के साढ़े तीन बजे थे। जहां गाड़ियों की चेकिंग चल रही है वहां से साधारणत: १००-११० मीटर दूर स्थित जवानों को कम्यूनिकेशन सेट पर सूचना मिलती है कि एक ट्रक चेकिंग के लिए रोके जाने पर भी रुका नहीं है। चेकिंग पॉईंट के दोनों ओर साधारणत: १०० मीटर पर ऐसे स्टॉपर्स होते हैं जो गाड़ियों को रोक कर धीरे जाने को कहते हैं। ट्रक न रुकने के दो ही कारण हो सकते हैं- या तो ट्रक में अवैध सामान है या कानून को न मानने की (विद्रोही) प्रवृत्ति है। वहां का अधिकारी चेकिंग करने वाली एवं कवर करने वाली टीम को सावधान करता है एवं खुद की जीप को रास्ते में अड़ा कर खड़ी कर देता है। यह पूरा घटनाक्रम कुछ सेकड़ों में होता है। कुछ क्षण तनाव का वातावरण फैल जाता है, क्योंकि ट्रक रुकता तो है परंतु उसमें से कोई उतरता नहीं। अंदर से फायरिंग, बम फेंकने आदि जैसी किसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। परिस्थिति का थोड़ा सा अंदाजा लेकर वह अधिकारी ट्रक ड्राइवर को नीचे उतरने को कहता है। ट्रक में कौन है इसकी शंका अभी भी बरकरार है। कुछ देर में डाइवर को जबरजस्ती नीचे उतारा जाता है एवं फिर आगे की कार्यवाही की जाती है।

दूसरी घटना
२०१० में अफगानिस्तान के कसुल में भारतीय विश्रामगृह पर हुआ आतमघाती हमला हुआ। वहां पास में ही स्थित भारतीय सेना के विश्रामगृह के अधिकारी को यह बात पता चली। स्वयं के पास कोई भी शस्त्र न होते हुए भी २ कि.मी दौड़ कर टूटे हुए विश्रामगृह से फंसे भारतीयों को निकालने का कार्य किया और वह भी तब जब गोलीबारी चल रही थी। उस अधिकारी ने खुद की परवाह न करते हुए १९ लोगों के प्राण बचाये। इस वीरता के लिए उस अधिकारी को सेना के मेडल से सम्मानित किया गया। उस अधिकारी का नाम था लेफ्टिनेंट कर्नल मिताली मधुस्मिता।

ऊपर के दोनों उदाहरण हैं भारतीय सेना की स्त्री अधिकारियों के। स्त्री पुरुष समानता यह मुद्दा जब ज्वलंत है, तब एक तरफ पुरुषों से स्वाभिमान की अपेक्षा रखने वाली स्त्री एवं दूसरी तरफ डेरा की सुरक्षा में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर न केवल स्वत: की वरन् डेरारक्षा के लिए कार्य करने वाली सेना की महिलाएं हैं। उन्होंने स्त्री पुरुष समानता यह केवल बहस का विषय न बना कर शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक हीनता को नकारते हुए स्वकर्तृत्व से स्त्रीशक्ति का उदाहरण समाज के सामने रखा है।

१९९२ में भारतीय थल सेना में स्त्री अधिकारियों हेतु दरवाजे खुले। १९९२ में ५० स्थानों हेतु १८०३ उम्मीदवारों ने आवेदन दिए। अर्थात एक स्थान हेतु ३६ आवेदन आए। परंतु यह अनुपात २००५ में एक स्थान हेतु १५० आवेदन ऐसा हो गया। भारतीय थल सेना में स्त्री अधिकारियों के लिए उपलब्ध स्थानों की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे प्रत्येक स्थान के लिए उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। गत २२ वर्षों में उपलब्ध स्थानों की संख्या ५० से बढ़ कर १३०० तक हो गई है। वैसे ही पहले जो सर्विस पीरियड ७ वर्षों का था, वह अब अधिकतम १४ वर्ष का हो गया है। एजुकेशन कार्प्स एवं जे.ए.जी. ब्रांच में स्त्री अधिकारियों को परमनेंट कमिशन मंजूर होकर वर्तमान में ए एस सी, एओसी, कॉर्प्स ऑफ इंजीनीयर्स, कोर्स ऑफ सिग्नल, ए.ए.ओ ( आर्मी एण्ड डिफेंस) कोर्स ऑफ इ.एम. इ.( इलेक्ट्रॉनिक एवं मेडिकल इंजीनियर्स), इंटलीजेंट इन शाखाओं में स्त्री अधिकारी अधिकतम १४ वर्ष तक सेवा कर सकती हैं। आर्मी मेडिकल कोर (ए.एम.सी.) में १९४८ से महिलाओं को अधिकारी के रुप में भर्ती किया जाता है, वैसे ही मिलिटरी नर्सिंग कोर में भी महिलाएं कार्य कर रही हैं। ए.एम.सी. एवं एम.एन.सी के अतिरिक्त स्त्री अधिकारियों को आफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी (ओ.टी.ए.) में प्रशिक्षण दिया जाता है। एक वर्ष के प्रशिक्षण के बाद अधिकारी लेफ्टिनेंट के रूप में पदस्थ की जाती हैं।
अधिकतर सामान्य जनता का एवं सेना की कुछ शाखाओं के अधिकारियों का भी यह प्रश्न होता है कि स्त्रियों की सेना में निश्चित क्या भूमिका होती है। एक अधिकारी के रूप में मैंने स्वयं असम, अरुणाचल प्रदेश, पठानकोट इ.स्थानों पर एम.सी.पी. (मोबाइल चेक पोस्ट), आर ओ पी (रोड ओपनिंग पार्टी) विलेज पेट्रोलिंग, रिज पेट्रोलिंग, बाढ़ राहत इ. सारे काम किए हैं। जब आप ड्यूटी ऑफिसर होते हैं तब ड्यूटी चेकिंग हेतु आपको रात में भी जाना पड़ता है। ड्यूटी चेकिंग करना यह हमेशा का काम है। रात में २-३ बजे ड्यूटी चेक करके आने के बाद भी सुबह पी.टी. के लिए जाना पड़ता है। रोज सुबह जवानों के साथ पी.टी. यह भी एक नियम है। भारतीय थल सेना के प्रत्येक अधिकारी को उसके कोर के नियमित कामों के अलावा जवानों का प्रशिक्षण एवं वेलफेयर तथा उससे जुड़े कुछ प्रशासकीय काम ऐसी तीनों भूमिकाएं निभानी पड़ती है। पी.टी. एवं खेल ये दोनों सेना के अविभाज्य घटक हैं और प्रति दिन प्रत्येक अधिकारी को इसमें भाग लेना पड़ता है।
भारतीय सेना में स्त्री अधिकारी के रूप में हमेशा पूछा जाने वाला और एक प्रश्न याने पुरुषो की प्रधानता वाले इस व्यवसाय में स्त्री की भूमिका क्या? मेरा हमेशा एक ही उत्तर रहता है कि पढ़ाना एवं नर्सिंग (परिचर्या) के अलावा कौन सा क्षेत्र पुरुष प्रधान नहीं है। थल सेना पुरुष प्रधान क्षेत्रों की तरह ही एक क्षेत्र है। मैंने संगठित क्षेत्र में सामाजिक क्षेत्र में काम किया है। ये सभी क्षेत्र थोड़े बहुत अंतर से पुरुष प्रधान ही हैं। परंतु इस क्षेत्र की विशेषता है कि यहां पुरुषों के गुणों की आवश्यकता अधिक रहती है क्योंकि यदि हम भारतीय थल सेना का एक संस्था के रूप में विचार करें तो वह इस संस्था की आवश्यकता है। समाज में और अन्यत्र जैसे उदारमतवादी, रूढ़िवादी एवं संतुलित सोचने वाले मिलते हैं वैसे ही यहां भी मिलते हैं। मेरा यह प्रामाणिक मत है कि स्त्री पुरुष समानता की बातें कर ‘‘पुरषों को स्त्री को बस में बैठने की सौजन्यता दिखानी चाहिए’’ समानता का ऐसा ढोंग यहां स्थान नहीं है। यदि कर्तृत्व सिद्ध किया तो किसी भी अन्य क्षेत्र की भांति आपको यश एवं स्वीकृती मिलेगी है। भारतीय सेना की परंपरा के अनुसार यदि आपके कंधे पर रेंक है इसलिए कोई आपको समान नहीं देता वरन् यदि आपने अपने आपको सिद्ध किया तभी आपको सच्ची स्वीकृती मिलती है। इस कारण प्रशिक्षण के बाद रेजीमेंट यूनिट में जाने पर भी पत्येक अधिकारी को चाहे वह स्त्री हो या पुरुष स्वंय का कर्तृत्व सिद्ध करना पड़ता है।

कई बार विविध प्रसार माध्यमों के माध्यम से यह विषय रखा जाता है कि क्या काम्बैट रोल (युद्ध लड़ना) में स्त्रियों को प्रवेश देना चाहिए? और यह विषय रखते समय केवल ‘‘स्त्री पुरुष समानता’’ यह एकमात्र विचार ध्यान में रखा जाता है। इस विषय के सामाजिक, तकनीकी, मानसिक एवं युद्धशास्त्र के संदर्भ में विविध पहलू ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रत्येक नवरात्रि के त्योहार में एक स्त्री के रूप में मेरे मन में प्रश्न पैदा होते हैं कि दुर्गा जब युद्ध क्षेत्र में गई थीं तब देवों ने उसके कर्तृत्व के बारे में, स्त्रीत्व के बारे में या सुरक्षा के बारे में क्या प्रश्न उपस्थित किए होंगे? क्या चर्चा की होगी? इससे भी आगे जाकर मैं यह विचार करती हूं कि सब देवताओं में शक्ति रूप में वास करने वाली देवी होती है। देवता वही फिर उसका ‘‘स्त्रीत्व’’ यह केवल संयोग है या प्रकृति की निर्मिति ही ऐसी है कि स्त्री रूप यह अधिक आक्रामक होता है? खैर यह प्रश्न भले ही मैंने यहां उपस्थित किए हों फिर भी भारतीय थल सेना ने इस विषय पर हर तरह से ‘‘तैयारी’’ (तकनीकी, सामाजिक और मानसिक) की है।

एक और महत्व का मुद्दा मैं यहां उपस्थित करना चाहती हूं। ‘‘ेााग्े ग्े ंात्गन्ग्े‘‘ पूर्वोत्तर भारत में पोस्ंिटग के समय एक इनफैन्ट्री यूनिट के साथ साधारण एक माह के लिए हमारी इंजीनियर्स की टुकड़ी जाने वाली थी। सर्वेक्षण के काम, जिसे कहा जाता है, इसके लिए मेरे कमांडिग ऑफिसर ने मेरी नियिुक्त की। एक माह तक हम रात में २.३० बजे निकलते, सुबह चार बजे तक निश्चित स्थान पर पहुंचते और सर्वेक्षण कर सुबह ९ बजे तक वापस लौटते थे। इसका कारण यह था कि ५००० से ६००० मीटर तक (अनुमानता १५००० मीटर) की ऊंचाई वाले पर्वतों के मध्य में बादल घिर आते थे या बरसात शुरू हो जाती थी। इसलिए सुबह का यह समय सर्वेक्षण के लिए उत्तम था। उसके बाद आकर रिपोर्ट बनाना यह हमारी दिनचर्या थी। उस एक यूनिट एवं इंजीनियर्स की टुकड़ी इसमें मैं एकमात्र महिला थी। उस एक माह में इनफैन्ट्री के अधिकारियों ने मुझे बताया कि जब उनके यूनिट को ज्ञात हुआ कि एक महिला अधिकारी आ रही हैं तब वे चिंतित होकर पूछ रहे थे कि कौन उसे कौन सम्भालेगा? यह प्रश्न जब उनके इंचार्ज ने मेरे सी.ओ. से पूछा तो सौभाग्य से मेरे सी.ओ. ने उत्तर दिया किसी को उसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। वह खुद अपने को सम्भाल लेगी। यह उत्तर देकर वे अपने निर्णय पर अटल रहे। वहां हिमालय की पर्वत मालाओं में हम तंबुओं में रहे। हवा से किसी का तंबू उड़ना, बरसात का पानी तंबू में घुसना, सर्वेक्षण करते समय अचानक तेज बारिश होना और उसके कारण बंकर्स में फंसना ऐसी अनेक घटनाएं घटती थीं। उस एक माह में इनफैन्ट्री के अधिकारियों को पहली बार समझ में आया कि महिला अधिकारी क्या काम करती हैं और क्या कर सकती हैं। उस समय तक उन्होंने कभी भी महिला अधिकारी के साथ काम नहीं किया था। सुनीसुनाई जानकारी के आधार पर अपना मत बनाया था। इस प्रकार का अनुभव आने पर उनका मत परिवर्तन हुआ और उन्होंने यह मान्य भी किया।

अब तक का मेरा विविध क्षेत्रों का अनुभव भी यही बताता है कि व्यावसायिक जीवन में स्त्री पुरुष समानता साध्य करने हेतु अपना काम निष्ठापूर्वक करते रहना यही एकमात्र उपाय है। प्रत्येक संस्था में कालानुरूप बदलाव आते रहते हैं। सेना भी इसका अपवाद नहीं है। बरसों से महिला अधिकारियों को दिया जाने वाला प्रशिक्षण, कार्य, उनको दी जाने वाली जिम्मेदारी, काम का स्वरूप इन सब में बदल होता रहा है और आज भी होगा। महिला अधिकारियों को शिक्षा, रु ंहम्प् और मेडिकल कोर्स के अलावा अन्य शाखाओं में परमनंट कमीशन मिलने की संभावना निश्चित है।

भारतीय सेना की और एक विशेषता याने साहस एवं खेल। इन दोनों प्रकारों में भारतीय सेना की महिला अधिकारियों के विविध अभियानों के उदाहरण दिए जा सकते हैं। सन २००६ में समुद्र में हुई ‘‘ऑल वुमन क्रू सेलिंग एक्सपिडेशन’’ यह एशिया का सभी महिला क्रू के प्रतिनिधित्व वाला समुद्री अभियान था। २०१२ की आर्मी वुमेन एवरेस्ट एक्सपिडेशन यह और एक उदाहरण है। पैरा ग्लाइडिंग माउन्टेनीयरिंग जैसे विविध साहसी खेलों में महिला अधिकारियों की सहभागिता रहती है। महिला एवं पुरुष अधिकारियों के संयुक्त अभियानों के भी उदाहरण हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की शांति सेना में विविध देशों में कार्यरत भारतीय सेना की टुकड़ियों में भी महिला अधिकारियों का समावेश होता है।

लिंग विविधता वाली किसी भी संस्था में कार्य के वातावरण को साधारणता तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। अलग अलग और असमान, एकसरीखा और बराबर तथा अलग-अलग और बराबर। मेरे अनुसार भारतीय सेना में काम का वातावरण लिंग विविधता के दृष्टिकोण से ‘‘एक सरीखा एवं बराबर’’ इस श्रेणी में रखा जा सकता है। अधिकतर पुरूष होने के कारण और एक संस्था के नाते वहां सेवा करने हेतु स्त्रियों ने भी पुरुषों के समान व्यवहार करना अर्थात स्त्रियोचित गुणों को बाजू में रखना पुरुषोचित गुणों को अंगीकार करना। यह सेना की आवश्यकता है। सेना को पुरुष प्रधान कहा जाता है और जब तक वहां महिलाओं की संख्या कम है, महिलाओं की अलग बटालियन नहीं होगी, तब तक यह संख्या पुरुषप्रधान ही रहेगी। प्रत्येक व्यक्ति में चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, कुछ पुरुषों के एवं कुछ महिलाओं के गुण होते हैं। यदि इस क्षेत्र में स्त्रियों को सफल होना है तो पुुरुषोचित गुणों को संजोना महत्वपूर्ण रहेगा।

सेना केवल एक संस्था नहीं बल्कि जीवन पद्धति है। जो सेना की सेवा के बाद भी हमारे जीवन का एक भाग बन जाती है। सेना का सर्वांगीण विचार कर मैंने यह निष्कर्ष निकाला है, ‘‘यह सर्वोत्तम संगठनों में से एक संगठन जिसके साथ काम किया जा सकता है। आवश्यकता केवल अपने आपको उसमें समाहित करने की है।

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