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उर्दू गज़ल के चाहने वाले दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं; और यह बड़ी खुशी की बात है। इसमें पुरानी फिल्मों के संगीत का बड़ा योगदान रहा है। संगीतकार मदन मोहन, नौशाद, सी. रामचंद्र जैसे कई महान संगीतकारों ने इस विषय में अपनी छाप छोड़ी है। जगजीत सिंह, अनूप जलोटा, तलत अज़ीज़ जैसे कलाकारों को तो हम हमेशा बार बार सुनते ही हैं। कुछ और नाम इस फैहरिस्त में जोड़ने होंगे। मेंहदी हसन, गुलाम अली का हम पर यह ऋण रहेगा कि इस विधा से उन्होंने न सिर्फ परिचित ही कराया; बल्कि यहां के अनेक गायकों को उनसे प्रेरणा मिली हैं। सच है कि कला या कलाकारों को किसी किस्म की सीमाएं नहीं रोक सकतीं। आबिदा परवीन, सलमा आगा, नाहीदा अख्तर इ. फनकारों को सुनने का आनंद हम से कौन छीन सकता है?
जब यह खयाल आया, कि गजल की इस विधा को अपनाने वाली या उसे आगे ले जानेवाली गायिकाओं के नाम कौन-कौन से हैं? तब पहला नाम जो याद आया वह था ‘बेगम अख्तर’ का, जिनको मल्लिका-ए-गज़ल का खिताब किसी संस्था या सरकार ने नहीं दिया था। वह तो उनके सुनने वालों ने उन्हें बड़े प्यार से अता किया था! उनके नाम से शकील की एक गज़ल तो हर किसी को याद होगी…
ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूं आज तेरे नामपे रोना आया…

गज़ल का जिक्र हो तो, हमारी भारतरत्न लताजी, तथा आशाजी को हम कैसे भूल सकते हैं? हमारा भाव-विश्व ही उनके सुरों से जुड़ा हुआ है। लताजी की वो गजल…
हाले-दिल यूं उन्हें सुनाया गया
आंख ही को जुबॉं बनाया गया.. (जहांआरा )

या अदालत फिल्म से-
यूं हसरतों के दाग मुहब्बत में धो लिए
खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए…
जैसी गज़लें भुलाएं नहीं भूलतीं ।

आशा जी की गायी ‘उमरावजान’ की गज़लें भी हमारे दिल के बिल्कुल पास रही हैं। चित्रा सिंह को भी हमने सुना, प्यार दिया ।
दर्द बढकर फुगां न हो जाए
ये जमीं आसमां न हो जाए….
दिल में डूबा हुआ जो नश्तर है
मेरे दिल की जुबां न हो जाए….
दिल को ले लीजिए जो लेना है
फिर ये सौदा गिरॉं न हो जाए…
आह कीजे मगर लतीफतरीन
लब तक आकर धुआं न हो जाए…

चित्राजी की गायी यह गज़ल आज भी हमारे दिल में ताज़ा है। दुख यह है, कि उनके साथ एक ऐसी दुर्घटना घटी कि उन्होंने गाना ही छोड़ दिया । उन्हें जो सदमा लगा वह उन्होंने इस तरह सह लिया और जब्त भी किया; उनकी आह इतनी ‘लतीफतरीन’ निकली कि लोगों तक न पहुंची। लेकिन उस आह से उनके सुर भी अंदर ही अंदर दब के रह गए।

चलिए, ये तो सब कल की बातें हुईं। मन में विचार आता है, कि क्या आज कोई नई गायिकाएं गज़ल को ले के उभर रहीं हैं या हमें सिर्फ पुराने खज़ाने को ही खोलते रहना होगा?

खुशी की बात है, कि आज भी गायिकाओं को गज़ल लुभा रही है और नए-नए नाम सामने आ रहे हैं्। भले, वे पुरानी गज़लें गाना ही ज्यादा पसंद करतीं हों; लेकिन उनका अपना एक अलग अंदाज जरूर है।

हाल ही में मैंने एक नई गायिका को सुना। मेरे लिए नई; हो सकता है कि आपने बहुत पहले उन्हें सुना होगा। जयंती नाडिग। उनकी आवाज में मैंने जो गजल सुनी वह जगजीत सिंह जी ने सुर में बांधी थी; लताजी के सुर में एक अल्बम में भी आई है।
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्ला
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्ला….
मैंने तुझ से चांद सितारे कब मॉंगे?
रौशन दिल बेदार नजर दे या अल्ला…
सूरज सी इक चीज तो हम सब देख चुके
सचमुच की अब एक सहर दे या अल्ला…..
या धरती के जख्मों पर मरहम रख दे
या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्ला…

पाकिस्तान के शायर कतील शिफाई की लिखी यह गज़ल लता जी ने पहले भी गायी है । फिर भी जयंती जी यह गज़ल गाने में इतनी सफल हुईं है कि पलभर हम भूल जाते हैं कि यह लता नहीं है! जयंतीजी की भावभीनी आवाज हमारे दिल को छू लेती है। गज़ल का आशय तो सुंदर है ही; पर गाने वाले की आवाज आशय को सामइन के दिलों तक पहुंचाती है। आवाज का प्रभावपूर्ण माध्यम होना जरूरी होता है। और, जयंती जी किसी भी तरह लताजी से कम नहीं ठहरीं।

पूजा गायतोंडे; यह नाम है उस मराठी लड़की का है, जिसकी चर्चा आजकल गज़ल गायन के क्षेत्र में हो रही है। राजकुमार रिज्वी, इख्तियार भट, विकास भाटवडेकर; ये वे नाम हैं जिनसे पूजा ने तालीम ली है या अभी भी ले रही हैं। पूजा ने ऐसी कुछ गज़लें गायी हैं जो, गज़लों के बादशाह मेहंदी हसन साहब ने बड़ी लोकप्रिय की है।
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ….
अब हम दोनों में पहले जैसा रिश्ता नहीं रहा। उल्टा, अब अदावत या नाराजगी का रिश्ता हो गया है। तू जब आएगा तो, मेरा दिल दुखाने का ही इरादा लेकर आएगा। फिर भी आ जा। क्योंकि मुझे छोड़ के (यानि दुख दे के) जाने का मज़ा तो तुझे तभी मिलेगा न, जब तू पहले मुझे मिलने आएगा!
इस गज़ल का हासिले-गज़ल शेर यह है…
कुछ तो मेरे पिंदारे-महब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ….

मुहब्बत के बारे में मेरी जो कल्पना है, मुझे मेरी मुहब्बत पर जो गर्व है; वह तेरी नज़र में झूठ ही सही लेकिन मेरी दृष्टि से वह एक सच है। शायद ये मेरा भरम ही क्यूं न हो! वह मेरा भरम बना रहे यही मैं चाहती हूं। तू मुझसे प्यार करता है यह भरम रखने के लिए तो तुझे आना ही होगा। और भी एक वजह है, जिससे तुझे आना चाहिए…
किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो जमाने के लिए आ….

मुझे अकेला देखकर लोग पूछते हैं कि इसका कारण क्या है ? अब तुम दोनों में वो मुहब्बत नहीं रही? इन सवालों के जवाब तो मेरे पास नहीं है। लोगों के मुंह बंद करने के लिए तो तुझे आना ही होगा। तू मुझ से नाराज है तो यही सही! लेकिन जमाने को दिखाने के लिए तो आ!

हम सब ने यह गज़ल बारबार सुनी है। कभी मेहंदी साहब से, कभी रूना लैला से या दत्तप्रसाद रानडेजी से। पूजा गायतोंडे की आवाज में भी यह गज़ल उतनी ही अच्छी लगती है। बहुतों की गायी हुई गज़ल गाकर दाद लेना कठिन काम होता है, जो करके पूजा ने खुद को साबित कर दिया है; ऐसी मेरी अपनी राय है। मेरी राय तब कायम हुई जब मैंने पूजा से हीर सुनी।
तेरे बज्म में आनेसे ऐ साकी,
चमके मयकदा जामे-शराब चमके।
जर्रा जर्रा नजर आए माहपारा,
गोशा गोशा मिस्ले आफताब चमके …

जब साकी (हरिवंशराय बच्चन जिसे मधुबाला कहते थे) मयखाने में आ जाती है तो सब मयख्वार उल्हसित हो जाते हैं। क्योंकि वह सब को शराब पिलाती है। उसके आने से वहां का कण-कण चमक उठता है, जैसे चांद टूट कर उसका चूरा इधर उधर बिखर गया हो। और, मधुशाला का कोना-कोना भी इतना रौशन हो गया है कि हर कोने में जैसे सूरज उगा हो! ये सब साकी के आने से हुआ!

शराब अच्छी या बुरी यह मुद्दा न उठाते हुए हमें उस चीज का इसलिए मन से स्वीकार करना चाहिए कि इस चीज ने शायरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह अच्छी शायरी का विषय बनी है।

छाया गांगुली ने ‘गमन’ फिल्म के लिए एक अच्छी गज़ल गायी थी। उस पर भी एक नज़र डालें-
आपकी याद आती रही रातभर
चश्मे-नम मुस्कराती रही रातभर…
रातभर दर्द की शम्मा जलती रही
गम की लौ थरथराती रही रातभर…
यादके चांद दिल में उतरते रहे
चांदनी जगमगाती रही रातभर….

इस गज़ल को संगीत में ढाला था जयदेव जी ने। पर्देपर स्मिता पाटील का अभिनय और ‘बैक-ग्राउंड’ में यह गज़ल, ऐसा सीन गमन में था।
गज़ल गानेवाली गायिकाओं की संख्या शायद कम है; लेकिन गुणों में कोई कमी नहीं।
इस क्षेत्र में भी उन्होंने खुद को साबित किया हैं, यह बड़ी गर्व की बात है ।
मशहूर क्लासिकल सिंगर अलका देव-मारुलकर से मैंने गालिब की गज़ल सुनी थी, वह मैं आजतक नहीं भूल पायी-
दहर में नक्शे-वफा वजह तसल्ली न हुआ
है ये वो लफ्ज जो शर्मिंदा-ए-मानी न हुआ…

इस जमाने में वफा कहां बाकी है? इन्सां का बर्ताव तो ऐसे होता जा रहा है कि ‘वफा’ शब्द को भी शर्मिंदा होना पड़ जाएगा! लेकिन अभी भी ऐसा नहीं हुआ है; अचरज की बात है, न?
पुणे की शशिकला शिरगोपीकर भी गज़ल-फनकारां हैं, जिन्हें बेगम अख्तर से तालीम लेने का मौका मिला था। उनका गाया एक शेर देखिए-
दिल लगाने की किसी से वो सजा पायी कि बस्
ऐसी ऐसी इश्क में इस दिल पे बन आयी कि बस् ….
गज़ल का यह सफर ऐसा ही चलता रहेगा, इसमें कोई शक नहीं।

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