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प्रश्न : आपकी क्रिकेट खेलने में रुचि कैसे जागृत हुई?
उत्तर : हम लोग रेलवे क्रिकेट कालोनी, बधवार पार्क,मुंबई में रहते थे। वहां हर शनिवार-रविवार को टेनिस बाल क्रिकेट होता था। टीम में १० लडके और मैं अकेली लडकी हुआ करती थी। स्कूल में मैं टेबल-टेनिस और बास्केटबाल भी खेलती थी। मैंने महाराष्ट्र स्कूल के लिये भी खेला। वहां बहुत कडी प्रतियोगिता होती थी। इस समय क्रिकेट महिलाओं के लिये नये खेल के रुप में उभर रहा था जिसमें मुझे सुनहरा अवसर दिखाई दिया। मैंने सोचा क्यों न अपने शौक को ही आगे बढ़ाया जाये और इसी में नाम कमाया जाये। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो मुझे गर्व होता है कि मैंने सही निर्णय लिया था।

प्रश्न : अर्थात आप अपने निर्णय से संतुष्ट हैं कि महिला होकर भी आपने इस खेल को चुना और इतना नाम कमाया?
उत्तर : बिलकुल, १९७१ में मैंने पढ़ा कि महिलाओं के लिये एस.एस.सी.आय. में क्रिकेट क्लब की शुरुवात हो रही है। मैंने तुरंत वहां जाकर अपना नाम रजिस्टर करवाया। यहीं से मेरे क्रिकेट करियर की शुरुवात हुई।

प्रश्न : क्रिकेट की कोचिंग कैसे हुआ करती थी?
उत्तर : क्रिकेट में ही रुचि रखने वाली एक महिला थी आलु बामजी। इनके नाम के शुरुवाती अक्षरों को लेकर हमने आल्बीज क्रिकेट क्लब की शुरुवात की। वो इस क्रिकेट क्लब को संभालती थी। हर बुधवार शाम और शनिवार सुबह हमारी प्रैक्टिस होता थी। विजय मर्चंट उस समय सी.सी.आय. के प्रेसिडेंट थे। उनकी फैक्टरी से कोच आते थे जो हमें क्रिकेट की कोचिंग देते थे।

प्रश्न : क्या आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी खेल से संबंधित रही है जिससे आपको प्रोत्साहन मिला हो?
उत्तर : ऐसा नहीं था। हमारे यहां कोई खेल खेलता नहीं था, परंतु खेल में रुचि जरुर थी। हमारे माता-पिता ने हमें प्रोत्साहन दिया। मेरी बडी बहन भी कुछ समय के लिये भारत के लिये खेली फिर उन्होंने अपना करियर दूसरे क्षेत्र की ओर मोड लिया।
माता-पिता की ओर से केवल इतनी सख्ती थी कि उस समय की न्यूनतम पढ़ाई ‘मैट्रिक’ करना ही है। स्नातक करना आवश्यक नहीं था। मैंने एक वर्ष जयंत कॉलेज में पढ़ाई की परंतु उसी समय मुझे रेलवे में नौकरी मिल गई और मैंने पढ़ाई को अलग रखकर क्रिकेट पर ध्यान देना शुरू कर दिया क्योंकि उस समय पढ़ाई की आवश्यकता नौकरी के लिये ही हुआ करती थी।

प्रश्न : क्रिकेट और रेल्वे की नौकरी दोनों के बीच सामंजस्य कैसे बना?
उत्तर : मुझे नौकरी भी क्रिकेट के कारण ही मिली थी। मैं भारत के लिये खेलती उस समय कमलापति त्रिपाठी रेल मंत्री थे और उनकी बहू हमारे क्लब की अध्यक्षा थी। क्लब के एक कार्यक्रम में कमलापति त्रिपाठी आये थे और उन्होंने हमसे कहा कि अगर आपको कोई परेशानी है तो आप कह सकतीं हैं। मेरे हाथ में नौकरी की अर्जी थी ही। मैंने उनसे कहा कि मुझे नौकरी की जरूरत है और उन्होंने उसी वक्त आदेश जारी कर दिये। सन १९७६ में मैने रेलवे की नौकरी श्ुरू की।

प्रश्न : अपने जब खेलना शुरु किया तब से लेकर अभी तक महिला क्रिकेट में क्या बदलाव आये हैं?
उत्तर : उस समय की तुलना में आज की स्थिती कई गुना अच्छी हैं। हमने शुरुवाती दिनों में बहुत मुश्किलों का सामना किया। हम बिना आरक्षण के रेल में, बस में सफर करते थे। जब पहली बार भारत से बाहर जाकर खेलने का मौका आया तो हमें अपनी जेब से पैसे भरने पडे थे। १९६१ के वर्ल्डकप में हमारे पास पैसे नहीं थे। तब हमने अखबार में दिया कि महाराष्ट्र के हम चार खिलाडी (१ पूना और ३ मुंबई की) वर्ल्डकप खेलने नहीं जा सकते क्योंकि हमारे पास पैसे नहीं हैं। उस समय अंतुले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने हमसे संपर्क किया और कहा कि आप परेशान मत हो, महाराष्ट्र सरकार आपकी मदद करेगी। उन्हीं की वजह से हम वर्ल्डकप खेल पाये।
आज स्थितीयों में काफी सुधार आया है। सुविधाओं में सुधार हो रहा है और खिलाडियों में भी सुधार हो रहा है। परंतु बी.सी.सी.आय. से जो प्रोत्साहन मिलना चाहिये वह नहीं मिल रहा है। घरेलू क्रिकेट जितना हम खेले आज उतना नहीं खेला जा रहा है। आज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की ओर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

प्रश्न : घरेलू क्रिकेट न खेलने के कारण क्या नुकसान हो रहा है?
उत्तर : इसका सबसे बडा नुकसान है कि हमारी अगली पीढ़ी नहीं आ पा रही है। आप देख रहे होंगे कि पिछले कई वर्षों से वही टीम खेल रही हैं। हालांकि वो लोग अच्छा खेल रहे हैं परंतु उनको ‘रिप्लेसमेंट’ नहीं मिल रहे हैं। अत: खिलाडी अच्छा खेले या न खेलें हमें उन्हे खिलाना ही पडता है। अगर इन खिलाडियों को अंडर-१६ और अंडर-१९ के खिलाडियों से प्रतियोगिता मिले तो और अच्छा होगा। मेरे खयाल से उनकी ओर ज्यादा ध्यान देना जरूरी हैं।

प्रश्न : क्या इस आयु सीमा की कुछ लडकियां आपकी नजर में हैं जो अच्छा खेल रहीं हैं?
उत्तर : अगर हम ढूंढें तो जरूर मिलेंगी। उसके लिये टूर्नामेंट होने जरूरी हैं। अंडर-१९ के टूर्नामेंट तो हैं परंतु उनको अहमियत नहीं दी जा रही है। उनको आगे बढ़ाने के लिये कम से कम एक अंतरराष्ट्रीय सीरीज की आवश्यकता है। चाहे यह टीम जाये या कोई बाहर की टीम यहां आये। इससे पता चलेगा कि किस स्तर का खेल ये लडकियां खेलती हैं और कहां सुधार की जरुरत है। इन लडकियों के सामने भी एक लक्ष्य होगा कि हमें भारत के लिये खेलना है, विदेशी खिलाडियों के साथ खेलना इत्यादि।
अंडर-१६ की भी आवश्यकता है क्योंकि स्कूल-कालेज सें लडकियां नही आ रही हैं। युनिवर्सिटी क्रिकेट न के बराबर हो गये हैं। पहले जिस स्तर पर युनिवर्सिटी क्रिकेट होता था अब वैसा कुछ नहीं हुआ।

प्रश्न : लडकों की तुलना में इस स्तर के खेल कम हुए हैं या दोनों के कम हो गये हैं?
उत्तर : लडकों के लिये तो कई टूर्नामेंट होते हैं। क्लब क्रिकेट हैं, अंतरशालेय, अंतरमहाविद्यालय है। लडकियों के लिये इन सब को आयोजित करना बहुत मुश्किल है।

प्रश्न : भारत में क्रिकेट इतना लोकप्रिय है फिर क्या कारण है कि महिला क्रिकेट पुरुषों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पा रहा है?
उत्तर : इसका मुख्यत: कारण है प्रचार। लडकों के छोटे स्तर के टूर्नामेंट का कितना प्रचार किया जाता है। किसी ने अंतरशालेय प्रतियोगिता में ३०० रन बनाये तो खेल पेज पर बडी सी हेडलाइन आ जायेगी और भारत में महिलाओं का वर्ल्डकप हुआ उसकी खबरें पहले दिन को छोडकर कितनी आई? एक लडकी ने शतक जमाया उसकी खबर केवल एक कॉलम में दी थी। वर्ल्डकप की शुरुवाती खबरें भी नकारात्मक रूप में आई। अगर पाकिस्तान की समस्या न आई होती तो वर्ल्डकप कब आया कब गया किसी को पता नहीं चलता। यहां मीडिया और टी. वी. की भूमिका बहुत मायने रखती है। उन्हे महिला क्रिकेट का प्रचार करना ही चाहिये।

प्रश्न : घरेलू क्रिकेट में पुरुषों के लिये जैसे रणजी ट्राफी होती है क्या वैसे ही महिलाओं के लिये कुछ है?
उत्तर : इनके लिये एक ५० ओवर का नेशनल हैं और एक टी-२० का नेशनल टूर्नामेंट है। परंतु वह बहुत कम है। मेरे हिसाब से दो दिनों के मैच होने जरूरी है क्योंकि जब तक कोई पिच पर टिकेगा नहीं, लंबा समय नहीं बितायेगा, तब तक वह किसी भी तरह का क्रिकेट नहीं खेल सकता। हमारे समय में हमने ४ दिन के टेस्ट मैच भी खेले हैं। आज टेस्ट क्रिकेट पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है। ५० और २० ओवर के मैच ही ज्यादा हो रहे हैं। असली क्रिकेट टेस्ट क्रिकेट ही है। इसी से खिलाडियों की ताकत, पिच पर टिकने की क्षमता, आदि पता चलता है। ५० और २० ओवर के मैच भी हों लेकिन लंबे अंतराल के भी मैच हों। भले ही दो दिन के ९०-९० ओवर के मैच हों। जब भी कोई सीरीज हो तो टेस्ट मैच होने ही चाहिये। लडके फिर भी एक सीरीज में ४ टेस्ट तो खेलते ही है। टेस्ट क्रिकेट खेलने पर रिटार्यमेंट के बाद के फायदें भी खिलाडियों को ही अधिक होंगे। तब भी यही देखा जाता है कि खिलाडी ने कितने टेस्ट क्रिकेट खेले अत: हर खिलाडी का लक्ष्य यही होना चाहिये कि मैं भारत के लिये टेस्ट क्रिकेट खेलूं।

प्रश्न : आज जो युवा खिलाडी आ रहे हैं वे खुद ५०-५० या २०-२० अधिक खेलना पसंद करते हैं इसकी क्या वजह है?
उत्तर : पुरुषों के क्रिकेट में इसकी वजह पैसा है। आज खेल इतना व्यापारिक हो चुका है कि लडके सोचते हैं कि हम केवल आय. पी. एल. ही खेल लें तो भी चलेगा। उनमें प्रतियोगिता बहुत है अत: जो मौका उन्हे मिलता है वे उसका फायदा उठाना चाहते हैं। उन लोगों के लिये केवल टेस्ट क्रिकेट खेलना ही आवश्यक नहीं है। उनके पास कई अन्य विकल्प भी हैं। वे सोचते हैं कि टेस्ट क्रिकेट खेल भी उतना ही कमा रहे है और आय.पी.एल के ४ ओवर खेलकर भी उतना ही कमा रहे है।

प्रश्न : क्या इस तरह की मानसिकता से खेल का नुकसान नहीं हो रहा है?
उत्तर : बिलकुल हो रहा है। खिलाडियों का पैसे कमाने की ओर झुकाव अधिक होने के कारण वे खेलों को अनदेखा कर रहे हैं। परंतु हम इसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। आप को खेल खिलाना है तो उसकी मार्केटिंग भी जरूरी हैं। इसके लिये टी-२० और आय.पी.एल सबसे अच्छे है। आज लगभग सभी देश अपना-अपना लीग मैच खेल रहे हैं। कई खिलाडी अपने देश की जगह दूसरे देशों के लिये खेलना अधिक पसंद करते हैं।
मैं चाहती हूं कि महिलाओं के लिये भी पूरा न सही कुछ स्टेज में आई. पी. एल. आये। मैने सुझाव दिया था कि सेमी फाइनल, फाइनल के बीच में ५ से ६ ओवर के मैच खिलायें जायें। अभी जैसे वर्ल्ड कप के लिये खिलाडी आई थीं, उन्हीं में लेकर एक मिक्स टीम बनायें और उनके बीच मैच खिलायें। इससे उन्हें प्रचार भी मिलेगा और लोगों का मनोरंजन भी होगा। ऐसे कुछ प्रयोगों से महिला क्रिकेट ऊपर आ सकता है।

प्रश्न : पुरुष और महिला क्रिकेट में आर्थिक रूप से क्या अंतर है।
उत्तर : आर्थिक रुप से दोनों में बहुत बडा अंतर है। समय के साथ खिलाडियों का मानधन ज्यादा नहीं बढा है। अत: केवल क्रिकेट खेलकर जींदगी गुजारना मुश्किल है। यहां रेलवे ही एक ऐसा सहारा है जिसके कारण महिला क्रिकेट चल रहा है। पूरे भारत के सारे राज्यों को मिलाकर देखें तो ९५% से ज्यादा खिलाडी रेलवे में ही हैं। पहले एयर इंडिया ने कुछ मदद की पर अब वह भी बंद हो गई है। अत: अपना खर्चा उठाने के लिये उन्हें तब तक नौकरी करनी ही होगी जब तक मैच फीस नहीं बढ़ती या और कहीं से आवक नहीं होती। आज महिलाओं को घरेलू क्रिकेट के लिये २५००रूपये प्रति मैच और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के लिये १लाख रूपये प्रति सीरीज के हिसाब से दिया जाता है। सारे प्रयत्नों के बावजूद भी बी. सी. सी. आई. महिलाओं पर पैसा खर्च करने को तैयार नहीं है और न ही वह किसी विज्ञापन कंपनियों तक जाती है जो महिला क्रिकेट को प्रायोजित करें या उनके अपने विज्ञापनों में लें।

प्रश्न : महिला क्रिकेट का स्तर बढ़ाने के लिये और क्या आवश्यक है?
उत्तर : इस वर्ल्डकप में महिलाओं ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया। थोडी और मेहनत करके अगर वे फायनल तक भी पहुंची होती तो बीसीसीआई को उन्हे मदद करनी पडती। अत: बीसीसीआई से मदद लेने के लिये खिलाडियों को अपना स्तर बढ़ाना ही होगा बीसीसीआई भी यह चाहती है कि पहले आप कुछ करके दिखाओ फिर वह मदद करेगी। एक बार हम फाइनल तक पहुंचे एक बार तीसरे क्रमांक पर रहे। परंतु आगे बढने के लिये जो ‘ब्रेक थ्रू’ चाहिये वह नहीं मिला। अब टीम को यह सोचना होगा कि उनके पास जो खूबियां हैं उनको परिणाम में कैसे बदला जाये और इसी की राह हर कोई देख रहा है।

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