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भारतीय संस्कृति में दान की संकल्पना अति प्राचीन है। समाज व्यवस्था में इसे आदरणीय दृष्टि से देखा जाता है। दान चाहे धन का हो, वस्तुओं का हो या संतान का हर रूप में सम्माननीय है। संतान का दान? अचानक माथे पर बल पड़ गये और दिमाग में विचार कौंधने लगे? जी हां! आजकल इसे किराये की कोख (surrogacy) नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ यह है कि बच्चे की चाह रखनेवाले व्यक्ति या दम्पति के भ्रूण को धन के बदले अपने गर्भ में पालना और प्रसव के बाद बच्चे को उस व्यक्ति या दम्पति को सौंप देना।

अगर बात यहां तक सीमित होती तो इससे श्रेष्ठ दान शायद और कुछ न होता परंतु जहां लेनदेन और पैसे की बात आती है वहां वह दान न होकर उद्योग बन जाता है। आजकल सरोगेसी इसी रूप में समाज में व्याप्त है। इसे एक दूसरे तरीके से भी देखा जा सकता है कि कोख की उधारी तभी प्रकाश में आने लगी जब इसमें पैसे का लेनदेन होने लगा।

पति-पत्नी के नैसर्गिक संबंधों से उत्पन्न संतान को शारीरिक, सामाजिक और न्यायिक तौर पर उचित माना जाता है। परंतु कई बार न्यूनाधिक दोषों के कारण कुछ दंपति संतान विहीन रहते हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति के कारण आजकल कई ऐसे तरीके उपलब्ध हैं जिनसे स्त्री या पुरुष की कमियों को दूर किया जा सकता है तथा उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है।

माता-पिता बनने का एक और तरीका है अनाथ बच्चों को गोद लेना। आज देश में कई अनाथआश्रम हैं, जहां अनाथ बच्चों का पालन पोषण होता है परंतु फिर भी उनके जीवन में माता-पिता एवं परिवार की कमी होती है। ऐसे बच्चों को गोद लेकर उनका माता-पिता बना जा सकता है।

इन सब से अलग एक अन्य तरीका है सरोगेसी। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि इसमें संतान प्राप्ति की इच्छा रखनेवाले व्यक्ति के अंडाणुओं को प्रयोगशाला में निषेचित करते हुए भ्रूण को सरोगेट मां के गर्भ में रोपित किया जाता है। यह सरोगेट मां नौ महीने तक इसे अपने गर्भ में पालती है और जन्म के बाद उसे उस व्यक्ति या दंपति को सौंप देती है। यह सरोगेसी की सामान्य प्रक्रिया है।

प्रश्न यह उठता है सरोगेसी ही क्यों? इसके पीछे कारण यह दिखाई देता है कि आज भी अपने अंश से उत्पन्न संतान को प्राधान्यता दी जाती है। वो ‘मेरी’ संतान है या ‘मेरा खून’ है जैसे वाक्यांश सुनने में भले ही फिल्मी लगते हो परंतु यथार्थ यही है कि अनाथ बच्चे को गोद लेने के बजाय सरोगेसी से उत्पन्न संतान अपनी लगती है। क्योंकि इसमें माता का न सही पर पिता का अंश तो होता ही है। सेरोगेसी का यह भावनात्मक पहलू केवल भारत में ही नहीं हैं वरन दुनिया के तमाम विकसित देशों में भी है। यह इस बात से साबित होता है कि अभी तक सरोगेसी से संतान उत्पत्ति की आस में आनेवाले अधिकतर दंपति विदेशी हैं।

भावनात्मक पहलू पर गौर करने के बाद इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले पैसे पर ध्यान देते हैं। इससे यह तथ्य भी सामने आयेगा कि क्यों विधि आयोग ने इसे उद्योग की संज्ञा दी है। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि क्या सरोगेसी वैध है? इसका उत्तर हां है। दरअसल यह एक कानूनी समझौता है जो सरोगेट मां और नि:संतान दंपति के मध्य किया जाता है। इसमें धन के भुगतान के विषय में स्पष्ट विवरण दिया जाता है। आज सरोगेट मदर को ३ से ४ लाख रुपये मिलते हैं। एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि इस उद्योग का वार्षिक कारोबार लगभग ४५ करोड़ डॉलर का है जिसके सन २०२० तक २ अरब डौलर तक पहुंचने की संभावना है। विदेशियों का भारत की ओर रुख होने का भी मुख्य कारण यही है कि भारत में सरोगेसी पर लगभग ६ लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं जबकि अमेरिका में ३५ लाख। ६ गुना कम खर्च में संतान प्राप्ति होना किसे अच्छा नहीं लगेगा?

‘सरोगेट मदर’ बनने के लिये अर्थात अपनी कोख को किराये पर देने के लिये मुख्य रूप से गरीब महिलाएं सामने आ रही हैं। सही है, गरीबी किसी से क्या नहीं करवाती! परंतु इन महिलाओं का शोषण भी होता है। जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकार भी खतरे में आ जाते हैं। खासकर तब नि:संतान दंपति विदेशी हों।

सन २००८ में गुजरात के आणंद में सरोगेसी पद्धति से एक बच्ची मानजी यामादा का जन्म हुआ। यह बच्ची जापानी दंपति की संतान थी। मानजी यामादा की कस्टडी का मामला कोर्ट में इसलिये अटक गया था क्योंकि उसके जन्म के पहले ही जापानी दंपति अलग हो गये थे।
सरोगेट माताओं की सुरक्षा हेतु अब एक नये विधेयक का मसौदा तैयार किया जा रहा है। इसके अनुसार उन्हें-
१) फर्टिलिटी क्लीनिक की नौकरी करने की इजाजत नहीं होगी।
२) उन्हें सरोगेसी एजेन्सी के तहत आना होगा।
३) सरोगेट मां की उम्र २१ से ३५ वर्ष के बीच होनी चाहिये।
४) कोई सरोगेट माता एक दंपति के लिये तीन बार से ज्यादा इंप्लांटेशन नहीं करायेगी।
५) अगर सरोगेट मदर शादीशुदा है तो वह अपने पति से सहमति लेगी।
६) यह पद्धति केवल भारतीय दंपति के लिये ही होगी।
७) सरोगेट मां को होनेवाली संतान पर मातृत्व के सभी अधिकार छोड़ने होंगे।
८) सरोगेसी से जन्मी संतान को उसके माता-पिता को स्वीकार करना ही होगा।
९) आइवीएफ को सरोगेसी की शर्तों से अलग रखा जायेगा।

गुजरात का आणंद शहर सरोगेसी के केन्द्र के रूप में सामने आया है। भारत के सहकारी दूध उत्पादन के गढ़ के रूप में पहचाना जाने वाला यह शहर अब सरोगेसी के लिये मशहूर हो चुका है। यहां के सत कैवल अस्पताल और आकांक्षा फर्टिलिटी सेंटर में महीने में औसतन ३० बच्चे पैदा होते हैं। ५०० सरोगेट मदर बनने का रिकार्ड बन चुका है और करीब ६५० से अधिक बच्चे पैदा हो चुके हैं।

भारतीय समाज में किसी महिला की गर्भधारणा से लेकर बच्चे के जन्म तक कई संस्कार किये जाते हैं। गर्भ संस्कार के उत्तम उदाहरण के रूप में हम अभिमन्यु को जानते हैं, जिसने चक्रव्यूह भेदने की कला अपनी माता के गर्भ में सीखी थी। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सरोगेसी जैसी क्रियाओं में वे संस्कार बच्चे को मिल पायेंगे?

रिश्तों का शास्त्र कहता है कि नैसर्गिक क्रियाओं के फलस्वरुप हुई गर्भधारणा, मां के आंचल की छांव, उसका वात्सल्यपूर्ण दूध, पिता की दुलारपूर्ण थपकी ही बच्चे का सांस्कृतिक-सामाजिक व्यक्तित्व बनाती है। किराये की कोख से जन्म लेनेवाले बच्चों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें मुख्य और सबसे बडा मुद्दा है नैतिकता का। पैसे के एवज में नैतिकता प्राप्त करना आज भी नामुमकिन है।

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