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दि. ८ मार्च २०१४ को विश्व महिला दिन संपन्न हुआ। हम सभी उससे आनंदित हैं।
फिर मां की महिमा क्या उस एक दिन तक ही सीमित होती है? बालक का व्यक्तित्व गढने में माता का हिस्सा कितना होता है? उसमें उसका अपना अधिकार कितना होता है?

बालक को वास्तव में जन्म देते, उसके बाद वह पाठशाला में दर्ज हो, तब तक चोबीसों घंटे उसकी परवरिश करने का कष्टप्रद काम मां ही तो करती है। लेकिन बालक का पाठशाला में जाना और उसके बाद का उसका जीवन-विकास इसमें उस मैय्या का हिस्सा कहां तक होता है? आम तौर पर इस महत्वपूर्ण निर्णय में उस माता का हिस्सा कहीं कुछ होता ही नहीं ऐसा कहने का मेरा इरादा नहीं, परंतू प्रत्येक परिवार इस संदर्भ में खुद अपने यहां की हालत कैसी है, असल में क्या होता है, इसे लेकर इस मातृदिन के अवसर पर साचे, तो भी काफी होगा।

फिर भी परिवार के ऊपर गां का भी सही अधिकार होता है। ऐसी व्यवस्था को मातृसत्ताक परिवार व्यवस्था कहा जाता हैं, यह हम सभी ने कहीं न कहीं सुना है। अपने देश में एक-दो ही इलाकों में ही क्यों न हो, यह व्यवस्था विद्यमान है। उसकी मात्रा गिनती न करने जितनी अल्प हो, तो भी उसका होना ही इस उपलक्ष्य में ध्यान देने योग्य है।

मेघालय की गारो और खासी टोलियों में आज भी मातृसत्ताक प्रणाली का अस्तित्व है। दक्षिण भारत के केरल में भी वह इसी तरह अल्प मात्रा में बनी हुई है। तो आखिर क्या होती हे यह मातृसत्ताक प्रणाली? इन परिवारों में से माता क्या सही माने में अपने अधिकारों का प्रयोग करती है? आज मेघालय में असल में क्या दिखाई देता है?

मेघालय के खासी परिवारों में से बर (दूल्हा) विवाह होने पर अपनी मां का घर छोड, अपने माता-पिता, भाई-बहनों को छोड ससुराल में, माने पत्नी के मायके में निवास करते जाता है। पत्नी के माता-पिता हों, तो सास यह परिवार की प्रधान होती है। वहां के कानूनों के तहत मां की जायदाद की वारिस लडकी ही होती है। (लडके विवाह के बाद अपनी पत्नी के मायके में जाते हैं।) किसी मां के एक से अधिक लडकियां हों, तो उनमें से सबसे लडकी मां की जायदाद की वारिस होती है। इसके बदले में अपने मातापिता की जिम्मेदारी भी उस छघेटी लडकी की होती है। (प्रत्यक्ष व्यवहार की दृष्टि से यह उचित ही है, क्योंकि लडकियों में से सबसे छघेटी लडकी अपने माता पिता की जिम्मेदारी सबसे अधिक अवधि तक निभा सकती है। और तो और यह लडकी उम्र में सबसे छघेटी होने से मातापिता की जिम्मेदारी निभाते उसका शारीरिक जोश भी बडी बहनों की अपेक्षा अधिक होगा। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि, छघेटी लडकी को एकमात्र वारिस कहते समय इस समाज के पुरखों ने काफी कुछ सोचा होगा!)

विवाह करते ससुराल आये हुए दूल्हे को-पति को आखिर घर के काम करने ही पडते हैं। पति का एक महत्वपूर्ण काम माते प्रजोत्पादन में सहायता करना। पति का (मर्द का) और एक महत्वपूर्ण काम माने घर के ताकत लगाकर करनेलाय काम करना। इन कामों में पहला होता है लकडी काटना। लकडी काटना वैसहे तो मेहनत का काम। औरतें सलाइयां-छडें बटोरने का काम करती हैं। मर्दों के लकडी काटने पर उसे ढोने का काम औरतें लडकियां ही करती हैं।

सिर्फ मेघालय में ही नहीं, तो समूचे पूर्वांचल में ‘झूम’ प्रकार की खेती होती है। झूम की खेती माने पहले जंगल काटकर साफ करते वहां एक-दो बरस खेती करना। उस जमीन की उर्वरता घटी, तो वह स्थान छोडकर दूसरा जंगल तोड उसकी सफाई करना…खेत जोतने का काम भी बडी मेहेनत का होता है। यह काम भी मर्दों के ही जिम्मे होता है। (बेचारे करते हैं आखिर, इन्कार करते किससे क्या कहेंगे? अपने मायके लौटने की सुविधा तो होती नहीं।)

लेकिन इन दो कामों के अलवा मर्दों का जीवन वैसे मस्तीभरा ही होता है। वैसे वे भी बडी ही मस्ती में रहते हैं। जिनकी अपनी खेती नहीं होती या लकडी काट लाने का काम ज्यादा नहीं होता और खेत भी जोतना जरूरी नहीं होता, ऐसी जगह प्रजोत्पादन में पत्नी की सहायता करना और फुर्सत के समय धूम्रपान करना-शराब पीना ये ही दो काम उनके अपने होते हैं। (यह वर्णन सुनकर-पढकर महाराष्ट्र में से कितने ही मध्यवर्गीय पुरुष खासी पुरुषों से निश्चित रूप में ईर्ष्या करेंगे। ’हम अगर खासी होते, तो कैसा बढिया होता!’ ऐसा बारबार वे सोचेंगे। लेकिन कैसे करें? इस जनम में तो कहीं संभव नहीं।) लेकिन अपने यहां के पुरुष अपनी पत्नी को कम से कम एक बार शिलांग-जोवाई तक ले चलें और वहां की औरतों के जीवन का दर्शन कराएं। उससे अपने यहां के मध्यवर्गीय मर्द अपनी औरतों-बच्चों के हित में कितना क्या करते हैं, इसका यहां की औरतों को लिहाज हो सकेगा। (इसचलए मेरे पुरुष दोस्तों, अगली छुट्टियों में जरूर जरूर मेघालय हो आएं!)

यह मामला सही माने में ऐसा कहीं अनोखा है कि, आज भी वुमने इस मातृसत्ताक परिवार प्रणाली होनेवाले इलाकों का चक्कर लगाया, तो चकित करनेवाली कितनी सारी बातें चकित कराने वाली दिखाई देंगी। शिलांग के साथ सभी ओर पान-तमाखू की दूकानों पर लडकियों की ही भीड़ होती है। मुंह में गिलोरी भरते आते-जाते पीक थूकनेवाली औरतें यहां हमेशा ही दिखाई देतीह हैं। होटल में, रेस्टांरंट में अकेली-अकेली औरतें सभी ओर हम देख सकते हैं। भरपेट खाना खाकर वे पान मुंह में ठूंसती हैं और साथ ही एकाध सिगारेट-बीडी भी सुलगाती हैं। मंडी में बहुत सारी चीजें बेचनेवाली इन औरतों के बर्ताव में कभी भी कुछ नरमाई नहीं होती। इतना ही नहीं तो किसी हदतक मगरूरी ही होती है। अपने समाज में उनका जो बढा चढा स्थान है, उसीमें से यह मगरूरी पानी होगी (ग्राहक के साथ झल्लाते पेश आनेवाली औरतें हमें सिर्फ खासी इलाके में ही दिखाई देती हैं।)

आजकल के जमाने में अपने बच्चे क्या करें, इसे तय करने में उसकी भूमिका निर्णायक न हो, तो भी उसे महत्वपूर्ण माना जाता है। हमारे यहां युवक युवतियों की छेडछाड करते हैं। उन्हें लुभाना, घूमाना-फिराना, बन सके तो धोखा देना ऐसे खेल वे खेलते हैं। लेकिन ऐसी करामातें यहां लडकियां ही करती हैं। परिवार में पिता अपने लडके जवान बने, तो गांव की शरारती युवतियों से बचने की सलाह बारम्बार उन्हें देते चलते हैं। (बेचारे!) ‘लडकियां पीछा करेंगी, इसलिए अंधेरा होने के पहले (सात बजने के पहले) घर लौट आना।’ ऐसी उनके भले की बातें पिता अपने लडकों को मनाते-समझाते रहते हैं।

दोपहर के समय किसी खासी बस्ती में से घूमे, तो दिखाई देता है कि, सभी काम औरतें ही करती चलती हैं। रास्तों पर, दूकानों में आदि सभी ओर दिखाई देती हैं, वे औरेतं, लडकियां और छघेटे ब्चे! जचवान या अधेड उम्रके पुरुष नकहीं दिखाई ही नहीं देते। (उनके लिए घर में कुछ थोडे काम होते हैं और उनके न होते वे धूम्रपान करते या शराब पीते पडे होते हैं।

औरत सारा दिन मेहेनत कर रही है, ऐसा चित्र पूर्वांचल में ही नहीं, तो सारे भारत में चारों ओर दिखाई देता है। और तो और यहां मुंबई की भी हालत कुछ अलग नहीं। लेकिन खासी इलाके की खासियत यही कि, वहां की औरत यह सबकुछ अपने अधिकार में करती है। खुद निर्णय कर ही करती है। मर्द को क्या करना चाहिए,उसे कितनी-कैसी छूट दें, यह वही तय करती है। वह परिवार प्रमुख होती है। घरबार उसका अपना होता है। मर्द का बर्ताव सही न हो, कहते-सुनाते भी वह मान न रहा हो, तो उसे पहने कपडों पर ही घर से बाहर कराने का उसे अधिकार होता है और खासी औरतें अपनी गरज के मुताबिक उसका प्रयोग भी करती है।

नौकरी करनेवाले, उच्चशिक्षित खासी युवकों के मन में खासकर पुणे-मुंबई या दिल्ली-चेन्नई क्षेत्र में पढाई कर लौटे हुए युवकों के मन में क्या हम औरतों के हाथों की कठपुतली बने रहें, ऐसा सवाल धीरे धीरे पर निश्चित रूप में उभरने लगा है। मालून नहीं, कल क्या होगा लेकिन कम से कम आज गारो-खासी क्षेत्र की औरतें सभी आधिकारों का उपभोग कर रही हैं। वहां वह केवल माता नहीं, तो परिवार प्रमुख भी है। उसकी भूमिका निर्णा्यक होती है। इसके माने यही कि, वहां माता सही माने में ऊंचे स्थान पर है। ‘मदर्स डे’ के दिन वहां की माताएं सिंहासनारूढ होकर बडे प्यार से अपने बच्चों का निहारती होंगी।

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