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एसपर्जर सिंड्रोम ऑटिज्म का ही एक प्रकार है. इससे पीड़ित लोगों में सामाजिक कौशल का अभाव पाया जाता है और कभी-कभार उनमें शारीरिक गतिशीलता से संबंधित समस्याएं भी देखने को मिलती हैं. हालांकि उनका भाषायी या संज्ञानात्मक कौशल उनकी इस समस्या से बिल्कुल अछूता रहता है.

कुछ मनोचिकित्सक इसे ऑटिज्म का ही उच्च-कार्यकारी रूप मानते हैं, जिसमें व्यक्ति सब कुछ समझता तो है, लेकिन इसके बावजूद वह समुचित प्रतिक्रिया अभिव्यक्त करने में सक्षम नहीं होता. पूर्व में ऑटिज्म से अलग करके देखा जाता था. शायद यही कारण है कि DSM (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders)अब तक इसे भिन्न नैदानिक श्रेणी में नहीं रखा गया है. वर्तमान में एस्पर्जर सिंड्रोम से पीड़ित लोगों द्वारा जिस तरह का व्यवहार प्रदर्शित किया जाता है, उसे ध्यान में रखते हुए इसे ‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिज्ऑर्डर’ कहा जा सकता है.

इसे थोड़ा और भी बेहतर तरीके से समझने के लिहाज से कह सकते हैं एस्पर्जर सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति दूसरों के दृष्टिकोण को समझने  और उनकी भावनाओं की कद्र कर पाने में असमर्थ होते हैं. उन्हें हर चीज को विस्तापूर्वक जानने में दिलचस्पी होती है और वे व्यवस्थ्ति रहना पसंद करते हैं. कई बार उन्हें देख कर ऐसा लगता है मानो वे बाध्यतता से ग्रसित हों.

 

लक्षण

एस्पर्जर सिंड्रोम से पीड़ित लोगों की सोशल फंक्शनिंग में समस्याएं होती है और वे कई तरह की संचार सेवाएं भी होंती हैं.

– वे अपने हम उम्र लोगों के साथ सामान्य दोस्ताना संबंध विकसित करने में असमर्थ होते हैं.

– दूसरों के सुख-दुख में किस तरह से भागीदार हुआ जाये, यह उन्हें पता नहीं होती.

– ऐसे लोग अपने धुन के पक्के होते हैं. एक बार जो ठान लिया, तो ठान लिया.

– उनके दिमाग में हमेशा कुछ-न-कुछ चलता रहता है. ये लोग शायद ही कभी चुपचाप बैठने का मौका मिलता है.

– उनके द्वारा एक ही काम को बार-बार किया जाता है,जैसे- ऊंगलियो को मोड़ते रहना, किसी को सुनते रहना, किसी काम को बार-बार करना चाहिए.

 

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