हिंदी विवेक : we work for better world...

आज दुनिया में इस्लामिक आतंकवाद गजब ढा रहा है। इस्लामिक आतंकवाद के पीछे जो विचारधारा है, वह यह है कि इस्लाम को जो कबूल करें उन्हें ही जीने का हक है। इसी तरह की विचारधारा केरल में कम्युनिस्ट भी चला रहे हैं और जो उनकी विचारधारा को नहीं मानता उन्हें जीने का हक नहीं है यह मान कर चल रहे हैं। इसी कारण केरल में आए दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो रहे हैं। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया जा रहा है। संघ कार्यालय पर बम हमले हो रहे हैं। जो कम्युनिज्म का विरोध करते हैं अथवा कम्युनिज्म के आड़े आते हैं उनका यही हाल होगा यह कह कर केरल में कम्युनिस्टों का हिंसाचार राजनीतिक आश्रय पर हो रहा है। केरल में मुख्यत: वहां की कम्युनिस्ट पार्टियों से रा. स्व. संघ को संघर्ष करना पड़ता है। स्वतंत्रता पूर्व से ही यह संघर्ष जारी है और आज भी समाप्त नहीं हो रहा है। कम्युनिस्टों के मन मंष संघ को लेकर इतना द्वेष क्यों है? यह जान लेना आवश्यक है।
केरल में संघ का प्रारंभ सन १९४२ में हुआ। दत्तोपंत ठेंगडी, दादाजी डिडोलकर, शंकर शास्त्री, विट्ठलराव पेंढारकर, भास्करराव कळंबी इत्यादि प्रचारकों के अथक परिश्रम के कारण केरल में संघ कार्य तेजी से बढ़ने लगा। जैसे-जैसे संघ शाखाएं बढ़ती गईं वैसे-वैसे कम्युनिस्टों का विरोध भी बढ़ता गया। कम्युनिस्टों के संघर्ष की तीन कालावधियां हैं। पहली कालावधि संघ बंदी के पहले की। १९४८ से १९६७ तक दूसरी और १९६७ के बाद तीसरी कालावधि है। पहले चरण में संघ के कार्यक्रमों में बाधा डालना, शाखाओं पर छोटे-मोटे हमले करना आदि बातें अक्सर होती थीं। १९५७ में केरल में ई.एम.एस .नंबूदिरिपाद के नेतृत्व में पहली बार साम्यवादी शासन आया। उसके बाद संघ शाखाओं और स्वयंसेवकों पर हमले तेज हो गए। साम्यवादी नीतियों का आघात हिंदू समाज पर होने लगा। मुसलमानों को संतुष्ट करने की राजनीति उन्होंने अपनाई। मुस्लिम लोगों को उन्होंने अपना मित्र बनाया। अनेक स्कूलों में शुक्रवार को छुट्टी दी जाने लगी। इस कारण हिंदू समाज पर अन्याय होने लगा है, ऐसी भावना कुछ कम्युनिस्टों में भी आने लगी। इस कारण कुछ कम्युनिस्ट कार्यकर्ता कम्युनिस्ट पार्टी को अलविदा कह कर संघ या जनसंघ में शामिल हो गए। कम्युनिस्टों की हिंदू विरोधी नीति के कारण संघ का काम केरल में गति से बढ़ने लगा।
संघ कार्यकर्ता की पहली हत्या तेलीचेरी में हुई। रामकृष्णन नामक युवक शाखा का मुख्य शिक्षक था। उसके तुरंत बाद पच्योली में एक संघ शाखा पर १००० से ज्यादा मार्क्सवादियों ने हमला किया। यहां पर संघ स्वयंसेवक और मार्क्सवादियों में बड़ा संघर्ष हुआ। इसमें २ मार्क्सवादी मारे गए। अनेक घायल हुए। ५०-६० संघ स्वयंसेवक भी गंभीर रूप से घायल हुए। कम्युनिस्ट अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए वैचारिक मतभेद छोड़ कर हिंसक संघर्ष पर उतर आए थे। संघ के विचारों का प्रभावी होने का मतलब है कम्युनिस्टों का वैचारिक प्रभाव घटना यह मानकर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए कम्युनिस्ट अपने हिंसक तंत्र को अपनाने लगे थे। वह किस हद तक हिंसक और घिनौने हो गए थे उसका उदाहरण चंद्रन की हत्या का मामला है। चंद्रन अपने दो बच्चों और पत्नी के साथ रहता था। उन्होंने कुछ मार्क्सवादियों के खिलाफ पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कर दी थी। उसी दिन १५-२० क्रोधित मार्क्सवादियों ने उनके घर में जाकर पत्नी और दो बच्चों के सामने चंद्रन की निर्मम हत्या कर दी। हत्या करके लौटते समय चंद्रन की पत्नी के गले की साढ़े पांच तोले की माला भी कम्युनिस्ट हमलावरों ने खींच ली और कहा- ‘‘इस प्रकरण में पुलिस केस होगा, जिसके लिए हमें पैसे की जरूरत पड़ेगी। इसलिए हम यह माला ले जा रहे हैं।’’
केरल का यह संघर्ष प्रमुखता से राजनीतिक स्वरूप का संघर्ष है। संघ कार्य राजनीतिक नहीं है। संघ कार्य वैचारिक है। साम्यवाद में संघ की वैचारिक चुनौती को स्वीकारने की ताकत नहीं है। कम्युनिस्टों के सारे काम राजनीतिक रूप से और राजसत्ता को केंद्र में रख कर ही निर्धारित होते हैं।
सन १९६७ में तत्कालीन मार्क्सवादी सरकार ने ‘मुल्लापुरम’ को मुस्लिम बहुल जिला बनाने का निर्णय लिया, तब संघ ने उसका तीव्र विरोध करके आंदोलन छेड़ दिया। यह घटना रा. स्व. संघ की केरल में हुई प्रगति में मील का पत्थर साबित हुई। इसका परिणाम यह रहा कि सारे देश का ध्यान इस आंदोलन ने अपनी ओर आकृष्ट किया। पर वोट की राजनीति करने वाले मुख्यमंत्री नंबूदिरीपाद सरकार ने मुल्लापुरम जिला अलग बनाया। अपने लिए अलग जिला मिलने पर मुसलमान मुंहजोर हुए और हिंदुओं पर दहशत जताने के इरादे से गुंडागर्दी करने लगे। हिंदुओं के धार्मिक जुलूसों में बाजे बजाने पर मनाई थोपी गई। हिंदुओं के शादी -जुलूसों पर हमले होने लगे। सामने से कोई मुस्लिम व्यक्ति आते दिखाई दिया तो उसके सम्मान में हिंदू व्यक्ति ने कमर में खोंची हुई धोती नीचे छोड़- फैलाने की जबरदस्ती हिंदुओं पर होने लगी।
केरल में संघ कार्य का प्रारंभ होने के बाद इस लज्जास्पद और भयग्रस्त वायुमंडल में तेजी से परिवर्तन आता दिखाई देने लगा। संघ कार्य के कारण हिंदू समाज शौर्यसंपन्न तथा विजीगिषुु बना हुआ है।
केरल के संघकार्य की अपनी एक विशेषता है। रा. स्व. संघ हिंदू समाज के सभी स्तरों में गहराई तक पहुंचा है। हिंदू समाज को संगठित करने के लिए जाति-पाति में बंटे हिंदू समाज की दूरी बढ़ाने वाली घातक और निंदनीय प्रथाओं पर अंकुश लगा। संघ के कारण समरसता आ गई। संघ को इस कार्य में मिली सफलता से हिंदू समाज संगठित हो गया। केरल की प्रत्येक तहसील में संघ कार्य फैला है। विविध स्तर की जरूरतों की पूर्ति करने वाले सेवा कार्य समाज तक वैचारिक रूप से पहुंच रहे हैं। कल तक जाति-उपजातियों में बंटा हिंदू समाज संघ में आने के बाद अपनी जातिगत अस्मिता को बिल्कुल भूल ही गया है। संघ ने पिछले छह दशकों मे केरल के हिंदू समाज में जो परिवर्तन लाया है, वह गौरवपूर्ण ही है। केरल के संघकार्य की एक विशेषता है कि इस राज्य में संघ को जितना संघर्ष करना पड़ता है उतना अन्य किसी भी प्रांत में नहीं। वहां तीन ताकतों से संघ को संघर्ष करना पड़ता है। एक ओर से मुस्लिम कट्टरपंथी, दूसरी ओर से ईसाई कट्टरपंथी और तीसरी ओर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी। इन तीनों ने हिंदुत्ववादी रा. स्व. संघ से उसकी स्थापना से ही शत्रुता की है। लेकिन पिछले सात दशकों में उनसे मुकाबला करते-करते केरल में संघ ने लक्षणीय मार्गक्रमण किया है और अपना वैशिष्ट्यपूर्ण स्थान पूरे केरल राज्यभर में प्रस्थापित किया है।
केरल में संघ स्वयंसेवकों के लिए यह संघर्ष अत्यंत जानलेवा है। एक तरफ शारीरिक तौर पर मार्क्सवादियों से संघर्ष तो दूसरी तरफ ईसाइयों और मुसलमानों से वैचारिक संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में संघ स्वयंसेवकों पर हजारों न्यायिक मामले ठोंके गए हैं। एक-एक स्वयंसेवक पर १५-२० मामले भी दिखाई देते हैं। कहीं-कहीं स्वयंसेवक को सप्ताह के ६ दिन कोर्ट में जाना पड़ता है। १००० से ज्यादा स्वयंसेवकों पर इस प्रकार के न्यायिक मामले जबरन थोपे गए हैं, ताकि रा. स्व. संघ के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटे।
केरल में गत १९५७ से अब तक हुई हजारों स्वयंसेवकों की हत्याओं एवं हिंसक हमलों के पीछे एक विशिष्ट विचार और तंत्र है। हिंसा और द्वेष उनकी विचारधारा का प्रमुख आकर्षण रहा है। केरल के कम्युनिस्टों को प्रारंभ से ही स्तालिन का आकर्षण रहा है। स्तालिन ने अपने राजनीतिक विरोधियों की निर्मम हत्याएं की हैं। केरल के कम्युनिस्ट थोड़ा भी राजनीतिक विरोध बरदाश्त नहीं कर सकते। खासकर जो लोग कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता थे और उनकी विचारधारा छोड़ कर संघ विचारधारा में शामिल हो गए उन्हें कम्युनिस्ट घेर कर मार डालते हैं अथवा जीवन भर के लिए विकलांग कर देते हैं। कम्युनिस्ट विचारधारा को विरोध करने का क्या परिणाम भुगतना पड़ता है इसे कम्युनिस्ट अपने हिंसक कृत्यों द्वारा दहशत फैला कर दिखलाना चाहते हैं। कम्युनिस्टों का वैचारिक आकर्षण अब लगभग समाप्त हो चुका है। कम्युनिस्टों के वैचारिक संघर्ष और फासिस्ट मनोवृत्तियों से कम्युनिस्ट कार्यकर्ता अब उब से गए हैं। संघ की विचारधारा और सेवा कार्य के वातावरण की ओर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता आकर्षित होकर संघ में शमिल होते हैं। ऐसे पार्टी छोड़ने वाले कार्यकर्ताओं पर, संघ स्वयंसेवकों पर भी कम्युनिस्ट गुंडे हमले करवाते हैं। लगभग ६ दशकों के पूर्व से केरल में संघकार्य आरंभ हुआ है। अपनी विशिष्ट कार्यपद्धति में सेवा कार्य के कारण संघ केरल के हिंदू जनमानस तक पहुंचा है। केरल संघकार्य कम्युनिस्ट विचारधारा को दफना देगा, यह उन्हें आरंभ से ही महसूस हो रहा था। इसी कारण संघ से उन्होंने दुश्मनी कर रखी है।
कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव विश्व स्तर पर दिन-ब-दिन कम होता जा रहा है। इस कारण उन्हें नैराश्य ने घेर रखा है। आजकल केरल में बढ़े हिंसक हमले इसी बात का स्पष्ट उदाहरण है। वैश्विक स्तर पर कम्युनिज्म की हुई हार भारतीय कम्युनिस्टों के नैराश्य का मुख्य कारण है। सोवियत संघ के विघटन के बाद वहां के कम्युनिज्म को भारी क्षति पहुंची है। इस कारण केरल में संघ स्वयंसेवकों पर हिंसक हमले और उनकी हत्याओं की वारदातें बढ़ी हैं। स्तालिन के कार्यकाल में लाखों बुद्धिजीवियों, कलाकारों एवं सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मार दिया गया था। कम्युनिस्ट विचारधारा में मानवी जीवन के प्रति दयाभाव को कोई भी स्थान नहीं है। भारत के कम्युनिस्टों ने समय के साथ अपनी विचारधारा को परिवर्तित नहीं किया है। इस कारण भारत में कम्युनिज्म पराजित हो रहा है। अपने आप में परिवर्तन लाने की बजाय कम्युनिस्टों ने हिंसा का आधार लिया है। आज रूस-चीन जैसे देशों नेे मार्क्स और लेनिन की विचारधारा को दफनाने का प्रयास किया है, वहीं भारत के कम्युनिस्ट हिंसा के आधार पर कालबाह्य हो रही विचारधारा कोे जिंदा रखने का प्रयास कर रहे हैं।
केवल भारत में ही नहीं वरन समूचे विश्व में कम्युनिज्म ध्वस्त हो रहा है। कम्युनिस्ट अपने हिंसक आंदोलनों से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि वे अपने विरोधियों की आवाज दबाने के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। खुद कार्ल मार्क्स ने ही १८४९ में कहा था, ‘‘हम क्रृर हैं, हम से दयाभाव की अपेक्षा न रखें। जब भी हमारा समय होगा तब हम हमारा कार्य एवं दहशतभरा भाव छुपाएंगे नहीं।’’ आज केरल में संघ विचारधारा अपनी जड़ें जमा रही है। इस कारण भारतीय जनता पार्टी जनप्रिय हो रही है। पिछले दो दशकों में संपूर्ण देश में परिवर्तन की एक लहर है। जिसके कारण देश के साथ केरल राज्य की भी आर्थिक व्यवस्था बदल गई है। केरल राज्य में बड़े पैमाने पर कनिष्ठ मध्यवर्ग निर्माण हुआ है। उनकी धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक जरूरतें कम्युनिस्ट विचारधारा पूरी नहीं कर पा रही है। उन जरूरतों की पूर्ति के लिए वह भाजपा की ओर आकर्षित हो रहा है। इस कारण केरल की हिंसक घटनाओं के पीछे संघ परिवार की विचारधारा का यश यह भी महत्वपूर्ण कारण है। आने वाले समय में राष्ट्रवादी शक्ति केरल में सशक्त हो सकती है। इसी भय से केरल में आए दिन हिंसक घटनाएं हो रही हैं। इस पार्श्वभूमि में केरल में हो रही हिंसक घटनाओं की गंभीरता जान लेनी चाहिए। कम्युनिस्टों द्वारा आरंभ की गई इस हिंसक लड़ाई में केरल संघ को अकेले जुझना पड़ रहा है। कोई भी राजनैतिक संगठन संघ के पीछे अपनी पूरी शक्ति के साथ खड़ा दिखाई नहीं देता है।
दुनियाभर की छोटी-छोटी घटनाओं को पूरे दिनभर प्रस्तुत करने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और मानवीयता के नाम पर बुरहान वानी जैसे आतंकवादी का पक्ष लेने वाले मानवाधिकारवादी पत्रकार केरल में हो रहे अत्याचारों पर जानबूझकर चुप्पी साधे हैं। केरल में हो रही इन हिसंक घटनाओं पर संपूर्ण भारतवर्ष में निषेध व्यक्त करना अत्यंत जरूरी है। राष्ट्र को परमवैभव तक पहुंचाने के यज्ञ में हजारों स्वयंसेवकों ने केरल में आत्माहुति दी है। उसे ध्यान में रख कर केरल की यह लाल दहशत खत्म होनी ही चाहिए। सिर्फ केरल ही नहीं संपूर्ण देश इस विचार से प्रेरित होकर अपनी आवाज को बुलंद करेगा तभी यह संभव होगा।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu