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केरल में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के द्वारा किए गए हिंसाचार के विरोध में ‘फोरम अगेंस्ट कम्युनिस्ट टेरर’ की ओर से पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया गया। जगह-जगह इस हिंसाचार और केरल के कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के विरोध में नारे लगाए गए, हजारों लोग इन प्रदर्शनों में सहभागी हुए; परंतु मुख्य धारा की मीडिया ने इसकी सुध नहीं ली। लेगी भी क्यों? जब उसने हिंसाचार की घटनाओं को ही दरकिनार कर दिया तो उसके विरोध में प्रदर्शन करने वाले आंदोलनों से उसका क्या लेनादेना?
हिंसा या आतंकवाद शब्द सुनते ही हमारे मस्तिष्क में सब से पहले कश्मीर और सीमावर्ती इलाकों के नाम आते हैं। परंतु केरल में इससे कहीं अधिक भयावह परिस्थिति है। यह परिस्थिति देश की आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही है; क्योंकि आम जनता तक खबरें पहुंचाने का सशक्त माध्यम अर्थात मीडिया इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए है। उसने केरल में घट रही घटनाओं पर इस तरह मौन साधा है मानो वह भारत का राज्य है ही नहीं।
रोहित वेमुला और जेएनयू के छात्र की आत्महत्या पर कैमरे के सामने हाथ में माइक लिए दो-दो दिन चिल्लाने वाले मीडिया कर्मियों के लिए क्या केरल में मर रहे लोग कोई मायने नहीं रखते? क्या उन लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है? क्या उनके परिवार जनों के प्रति समाज का कोई दायित्व नहीं है? शायद इन सभी प्रश्नों के उत्तर ‘नहीं’ है इसलिए ये घटनाएं न मुख्य धारा के किसी चैनल की ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनी और न ही अखबार के पहले पेज की ‘हेडलाइन’।
इस घटना की ओर (जानबूझकर) ध्यान न देने के कुछ कारण ये भी हो सकते हैं कि मरने वालों में अधिकतर कार्यकर्ता या तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं या भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता हैं या फिर ऐसे लोग हैं जिन्होंने किसी कारणवश वामपंथ छोड़ दिया है। इन लोगों के अलावा भी मरने वालों में कुछ लोग शामिल हैं परंतु उनका प्रतिशत बहुत कम है। कुल मिलाकर मामला यह है कि जो लोग वामपंथी नहीं हैं, वे केरल में मौत के शिकार हैं। केरल में आए दिन घटने वाली हिंसाचार की घटनाओं ने इस हरित भूमि को रक्तरंजित कर लाल रंग में बदल दिया है। वामपंथी विचारधारा के मूल में ही हिंसा है इसलिए उनके द्वारा हिंसाचार करना तो समझ में आता है। परंतु मीडिया का इन मामलों को उजागर न करना समझ से परे है।
इतने गंभीर विषय पर मुख्य धारा की मीडिया की उदासीनता मीडिया के दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न उपस्थित करती है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का इस तरह किसी क्षेत्र विशेष से उदासीन रहना वहां की जनता को दुर्लक्षित करना है। जिन लोगों की जान गई वे लोग चाहे जिस संगठन के लिए काम करते हों, चाहे जिस राजनैतिक पार्टी के समर्थक हों वे सबसे पहले इस देश के नागरिक हैं। अफजल गुरु और बुरहान वानी जैसे आतंकवादियों के जनाजे का लाइव टेलीकास्ट करने वाली मीडिया केरल के इन निर्दोष लोगों की हत्या के विषय पर मौन है।
पत्रकारिता से मीडिया बनते समय इस क्षेत्र में जो मूलभूत परिवर्तन हुआ है वह है व्यावसायिकता का। जब तक तत्वों के आधार पर पत्रकारिता की गई तब तक वह सत्य के साथ रही; परंतु जब से मीडिया के रूप में उसने कारोबार में कदम रखा है तब से उसका आधार धन हो गया है। अब चैनलों की टीआरपी किस समाचार से बढ़ेगी इस विचार को केंद्रित करके खबरें दिखाई जाती हैं। और जाहिर सी बात है कि चुनावों के परिणामों या क्रिकेट मैच की जीत की तुलना में केरल के हिंसाचार को अधिक टीआरपी नहीं मिलेगी।
एक दूसरा पक्ष यह भी है कि मीडिया मालिकों या सम्पादकों में एक ऐसी लॉबी भी है जिनके स्वयं के विचार वामपंथी हैं। अत: उनको केरल में हो रहे हिंसाचार में कुछ गलत दिखाई ही नहीं देता। वे तो इस बात से खुश होते होंगे कि वहां उनकी विचारधारा के लोग उपना दबदबा बनाने में कायम हैं। केरल में पिछले कई वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता निरंतर कार्य कर रहे हैं। उनके द्वारा लोकहित तथा केरल राज्य के विकास हेतु किए गए कार्यों के कारण केरलवासियों के मन में संघ के प्रति आस्था बढ़ रही है। वामपंथियों का मर्मस्थान यही है। वे जानते हैं कि अगर संघकार्य बढ़ा तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए वे स्वयंसेवकों पर निरंतर हमले करते रहते हैं। केरल की राज्य सरकार का वरदस्त भी इन्हें प्राप्त है। घटना होने पर मीडिया को घटना स्थल तक न पहुंचने देने की कवायद शुरू होती है और अगर किसी तरह समाचार बन भी जाए तो चैनलों के मालिकों व सम्पादकों की टीम में बैठे इनके आका उस समाचार को चलने नहीं देते।
सोशल मीडिया अर्थात फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर आदि पर जरूर केरल से संबंधित समाचार आते रहते हैं परंतु अभी भी देश कीअधिकांश जनता खबरों के लिए मुख्यधारा की मीडिया पर ही निर्भर है।
मीडिया के साथ ही समाज का एक वर्ग और है जो आम जनता के अधिकारों के लिए जागृत होता है। वह वर्ग है मानवाधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का, मानवतावादियों का। केरल मामले में दुर्भाग्य से मानवाधिकार के तथाकथित ठेकेदार भी अपना मुंह सिले बैठे हैं। जिन लोगों को इशरत जहां की मौत पर रोना आ रहा था, जिन्होंने उसके एनकाउंटर को झूठा साबित करने के लिए दिन-रात एक कर दिए उनके मन में देशद्रोही इशरत के लिए तो संवेदनाएं हैं, परंतु केरल में मृत लोगों के प्रति नहीं। देश में बढ़ रही असहिष्णुता को देख कर हायतौबा मचाने वाली अवार्ड वापसी गैंग भी खामोश बैठी है। क्या इन लोगों को असहिष्णुता केवल तभी दिखाई देती है जब आतंकवादियों या देशद्रोहियों को सजा सुनाई जाती है? केरल में हो रही घटनाओं ने सहिष्णुता के कौन से नमूने सामने रखे हैं? अपनी विचारधारा से भिन्न विचारधारा रखने वाले लोगों की हत्या करना क्या सहिष्णु होने का लक्षण हैं?
मीडिया, मानवतावादी लोग, अवार्ड वापसी गैंग सभी केरल की घटनाओं पर अपना मुंह सिले बैठे हैं। इन सभी की चुप्पी का एक मात्र कारण यही है कि वहां की घटनाओं में हिंसा का शिकार कोई अल्पसंख्यक नहीं है। वहां के लोगों के लिए आवाज उठाने हेतु इन लोगों को विदेशों से किसी भी प्रकार की कोई अर्थिक सहायता नहीं की जाएगी। वरन इनके लिए तो केरल की घटनाओं का विरोध करने का मतलब होगा स्वयं की रगों में बहने वाली विचारधारा का हनन करना।
वामपंथ से पोषित मीडियाकर्मी, मानवतावादी तथा अवार्ड वापसी गैंग कभी भी केरल की घटनाओं को सामने नहीं आने देंगे क्योंकि वहां संघर्ष उनके अस्तित्व का है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्ति से प्रेरित विचारधारा का विस्तार उनके लिए सबसे बड़ा खतरा है, अत: जानबूझकर ये प्रयत्न किए जा रहे हैं कि इन घटनाओं की ओर आम जनता का ध्यानाकर्षण न हो और इसका कोई विरोध न कर सके।

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