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माणिक प्रभु का जीवनकाल सन १८१७ से सन १८६५ तक का है। दत्त संप्रदाय में माणिक प्रभु का अनन्य साधारण महत्व है। माणिक प्रभु की माताजी को भगवान ने दृष्टांत दिया एवं मार्गशीर्ष शुद्ध पूर्णिमा अर्थात दत्त जंयती के दिन माणिक प्रभु का अवतार हुआ। इसी कारण माणिक प्रभु को दत्तावतार माना जाने लगा और इस संप्रदाय में दत्त जंयती याने माणिक प्रभु के जन्मोत्सव के रूप में ही मनाने की परंपरा रुढ़ हुई।
निजाम के प्रभुत्व वाले हैदराबाद का तत्कालीन मराठवाडा एवं आंध्र, तेलंगाना का कुछ क्षेत्र माणिक प्रभु का प्रमुख कार्यक्षेत्र रहा है।
दत्त संप्रदाय में गुरु-शिष्य परंपरा नहीं है। जिन जिन विभूतियों पर भगवान दत्तात्रय की कृपा हुई उन्होंने स्वतंत्र रूप से अपना कार्यक्षेत्र निश्चित किया। इसलिए ये संप्रदाय अन्य संप्रदायों के समान संगठित नहीं दिखाई देते। माणिक प्रभु के विषय में भी यही कहना होगा।
माणिक प्रभु का चरित्र भी अन्य संतों के समान अनाकलनीय, गूढ़ एवं रहस्यमय चमत्कारों से समृद्ध है। परंतु वे सारे चमत्कार व्यक्तिगत अनुभवों से संबधित होने के कारण एवं चमत्कार यह संप्रदाय के प्रसार की नींव नहीं हो सकती इस विचार से उन चमत्कारों का उल्लेख यहां नहीं किया जा रहा है। जिन्हें जिज्ञासा है उनके लिए श्री माणिक प्रभु संस्थान, माणिक नगर की ओर से प्रकाशित पुस्तक ‘संत माणिक प्रभु चरित्र’ पढ़ने हेतु उपलब्ध है।
गत दो सौ वर्षों में आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत जो संत महात्मा हुए हैं, उनमें माणिक प्रभु का स्थान महत्वपूर्ण है ऐसा निश्चित रूप से कहना होेगा। उनके समकालिकों में श्री स्वामी समर्थ अक्कलकोट, शिर्डी के साईबाबा, शेगांव के गजानन महाराज, ब्रह्मचैतन्य गोंदेवलेकर महाराज का उल्लेख करना होगा।
सामाजिक एकता की प्रक्रिया में जिन बातों की कमी खटकती है, १५० वर्षों पूर्व माणिक प्रभु ने उनकी कल्पना की थी और उसी को ध्यान में रखकर उन्होंने सभी जाति, धर्म, पंथ और संप्रदायों को एकता एवं बंधुत्व की भावना के दृढ़ीकरण के उद्देश्य से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने का संदेश दिया।
संतों के उपदेश सरल लोकभाषा में होते हैं यह अनुभव तो हम सभी को है। परंतु कुछ लोग अपने धर्म -पंथ के प्रचार प्रसार में अन्य धर्मों अथवा पंथों की निंदा करने लगते हैं। इसके कारण एक दुसरे के प्रति मन में कलह एवं द्वेष पैदा होता है और वे आपस में झगड़ने लगते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि सभी में एक ही परमात्मा विराजता है। इसी परिस्थिति को ध्यान में रखकर एवं ‘आत्मा’ को अधिष्ठात्री देवता मानकर ‘सकलमत संप्रदाय’ की स्थापना का निर्णय कितने दूरगामी विचारों का है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। श्री माणिक प्रभु ने सभी धर्मों, पथों एवं मतों के उद्गम स्थान एवं उनका अंतिम साध्य इसका यथार्थ लाभ हो, विश्व के सभी लोगों में बंधुत्व भाव उत्पन्न हो, एवं उनमें समन्वय हो इस विचार से ‘सभी में एक ही परमात्मा, न करें किसी की निंदा’ इस सूत्र वाक्य से ‘सकलमत संप्रदाय’ नाम से एक लोकोत्तर संप्रदाय की स्थापना की। आपस में प्रेम की पक्की नींव पर खड़े इस संप्रदाय ने प्रत्येक को यही सिखाया एवं सिखा रहा है कि अपने अंदर की ‘प्रेमत्व’ की भावना को पहचाने एवं उसके माध्यम से अपने मूल स्वरूप को खोजें। माणिक प्रभु के तत्वज्ञान से प्रभावित एक यवन नवाब ने प्रभु से अत्यंत विनीत भाव से कहा कि, ‘‘महाराज यदि आप मुसलमान होते तो मैं इसी क्षण आपका शिष्य बन गया होता। इस पर प्रभु ने हंस कर कहा कि कुरान में अल्ला को ‘रब उल आलमिन’ कहा गया है यह मुझे पता है परंतु ‘रब उल मुसलीम’ ऐसा कहा है यह उल्लेख कहीं नहीं है। यह सुन कर नवाब प्रभु का कुरान अध्ययन देखकर निरुत्तर हो गया। परमात्मा यह संपूर्ण जगत का अधिपति है। हटवादी लोग धर्म अथवा मतविभिन्नता के कारण अंधे होकर मेरा धर्म अच्छा दूसरों का बुरा कहते हैं। इन लोगों को माणिक प्रभु द्वारा यवन नवाब को दिया गया उत्तर मार्गदर्शक है। इसका आज भी क्यों नहीं विचार होना चाहिए?
श्री माणिक प्रभु का अवतार कार्य एक विशिष्ट काल, देश एवं परिस्थिति में होने के बावजूद भी उसका संबध भूत, भविष्य एवं वर्तमान से है।
माणिक प्रभु संप्रदाय का उल्लेख करते समय एक और महत्वपूर्ण उल्लेख करना आवश्यक है। वह यानी ‘भक्तकार्य कल्पद्रुमादि’ इस ‘ब्रीद वाक्य’ का। इस ‘ब्रीद वाक्य’ की घोषणा बीते कई वर्षों से अखंड रूप से की जा रही है। प्रत्येक संप्रदाय स्थायी होने के लिए एक नियमावली होना आवश्यक है। यह ‘ब्रीदावली’ माणिक प्रभु के संप्रदाय की लिखित नियमावली ही है। माणिक प्रभु का चरित्र इस ब्रीदावली में बीज रूप में समाया है। माणिक प्रभु संप्रदाय का सार याने यह ब्रीदावली। इस संप्रदाय में उपासना हेतु इसी ‘ब्रीदावली’ का प्रयोग किया जाता है। इसके जप से अनेक भक्तों का विस्मयकारक अनुभवों से सामना हुआ है। प्रत्येक कार्य का प्रारंभ इसी ‘ब्रीदावली’ से करने की इस संप्रदाय की परंपरा है। यह ‘ब्रीदावली’ याने प्रभु का गुणवर्णन कर प्रभु के स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली महाशक्ति है। इस ‘ब्रीदावली’ के जप से प्रभु के विशाल, सर्वव्यापी व सर्वकाल भासमान होने वाले स्वरूप का साक्षात्कार होगा ही ऐसा संप्रदाय का दृढ़ मत है। श्री प्रभु के अधिभौतिक, अधिदैविक और आध्यात्मिक स्वरुप का यथार्थ वर्णन इस ‘ब्रीदावली’ में है।
माणिक प्रभु को बचपन में ही ज्ञानयोग एवं सामर्थ्य की प्राप्ति हो गई थी। लौकिक अर्थों में इस लोक के किसी को भी उनका ‘गुरुत्व’ प्राप्त नहीं था फिर भी वे ‘सार्वभौम गुरु’ थे। हिंदी, मराठी, कन्नड, तेलगु, उर्दू, फारसी, अरबी इ. भाषाओं पर उनका प्रभुत्व था। उनकी काव्य प्रतिभा भी विलक्षण थी। उन्होंने देश भर भ्रमण कर विविध तीर्थक्षेत्र देखें एवं वहां की देवताओं पर स्तुतिपरक रचनाएं लिखीं। ऐसी करीब ३००-३१० पद्य रचनाओं का संकलन एवं प्रकाशन श्री माणिक प्रभु संप्रदाय की ओर से किया गया है। जिज्ञासु अवश्य अवलोकन करें।
भगवान नारायण षड्गुणों से संपन्न हैं। भगवान नारायण में निहित छह गुण जिन विभूतियों में प्रतीत होते हैं वह विभूति नरदेहधारी होते हुए भी नारायण स्वरूपी होता है यह निर्विवाद सत्य है। श्री माणिक प्रभु के चरित्र का अध्ययन करने से यह बात निश्चित रूप से अनुभव में आती है।
इस लोकोत्तर विभूति का द्विशताब्दी महोत्सव सन २०१७ में आयोजित हो रहा है। यह अत्यंत आनंददायक एवं मंगलमय घटना है। माणिक प्रभु पीठ के वर्तमान पीठाधिपति (डॉ.) श्री सद्गुरु ज्ञानराज माणिक प्रभु महाराज के मार्गदर्शन में श्री क्षेत्र माणिकनगर, जिला बीदर (कर्नाटक) -५८५३५३ में यह समारोह १९ नवम्बर २०१७ से ४ दिसंबर २०१७ के बीच सपन्न होगा। इस महोत्सव में महाकुंभाभिषेक, अखिल भारतीय संत संमेलन, नामचीन गायकों-वादकों के गायन-वादन के कार्यक्रम, सामुदायिक गुरु चरित्र पठन, निःशुल्क चिकित्सा शिविर आदि कार्यक्रमों का आयोजन होगा। इस हेतु अधिक जानकारी के लिए मो. क्र ०९४४८४६९९१३ पर संपर्क कर सकते हैं।

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