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भारत विश्व का प्राचीनतम देश है, जहां की संस्कृति एवं इतिहास का उल्लेख संस्कृत वाङ्मय में आज भी उपलब्ध है, उसे दुर्भाग्यवश बर्बर विदेशी आक्रमणकारी आततायियों ने सदियों तक लूटा, उसका रूप -रंग, आकार -प्रकार, भाषा-साहित्य व भूगोल तक को बिगाड़ा, यहां तक कि इतिहास को भी विकृत कर डाला। इतिहास का अर्थ होता है उन घटनाओं का वर्णन करना जैसा उस समय विशेष पर हुआ था-इति+हास। किन्तु विदेशी-विधर्मी सत्ताधीशों ने ऐसा न करके अपनी सत्ता को चिरस्थायी और सुदृढ़ बनाए रखने के लिए अतीत की घटनाओं को स्वार्थपूर्ति हेतु मनमाना तोड़ामरोड़ा और बिगाड़ा। अंत-अंत में अंग्रेज कूटनीतिज्ञों ने भारत में अंग्रेज विद्वानों द्वारा आँग्ल भाषा में अन्य विषयों की भांति इतिहास की भी पुस्तकें भारतीय विद्यार्थियों को पढ़वा कर उनके मस्तिष्क को भ्रमित करने का जघन्य कार्य किया। उन्हीं के आधार पर शोध करवा कर भ्रमित निष्कर्ष निकाला। वे ही भारतीय विद्वान व इतिहासकार समाज में प्रतिष्ठित किए गए और वे ही अंतिम सत्य प्रमाणित कर दिए गए।
जहां यह असत्य है कि आर्य भारत में बाहर से आए तथा उन्होंने यहां के द्रविड़ों को खदेड़ कर दक्षिण की ओर धकेल दिया तथा उनका दमन कर उनके ऊपर अपना सांस्कृतिक व राजनैतिक वर्चस्व स्थापित कर लिया, वहीं उनका (लार्ड मैकाले का) यह प्रचारित करना कि संस्कृत भाषा व साहित्य प्रतिगामी, संकीर्ण तथा कपोल -कल्पित मनगढ़ंत किस्से-कहानियों का घटिया भंडार मात्र है, उनकी दंभपूर्ण व साम्राज्यवादी नीति का ही पोषक है। उनका यह कहना कि भारत के संस्कृत, अरबी फारसी भाषाओं के ग्रंथ, अंग्रजी भाषा के एक पुस्तकालय के एक आलमारी के एक खाने के बराबर हैं सर्वथा महत्वहीन हैं। वस्तुत: यह उनका अनर्गल प्रलाप ही है। ऐसा सहस्त्रों उदाहरण उनके ऐसे अनर्गल व दंभपूर्ण भ्रामक तथ्यों से भरे पड़े हैं।
ऐसी ही एक विसंगति आद्य शंकराचार्य के काल-क्रम के बारे में अंग्रजों ने स्थापित कर दी। उन भ्रमित इतिहासकारों के अनुसार उनकी जन्म-तिथि ज्येष्ठ शुल्क पंचमी संवत ७३१ विक्रमी (सन ७८८ ईसवी) प्रचारित और मान्य कर रखी गई है किन्तु यह सर्वथा भ्रामक है। उनकी वास्तविक जन्म तिथि उसके भी १२६७ वर्ष पूर्व संवत ५०६ ई. पूर्व होने का उल्लेख संस्कृत के प्राचीन वाङ्मय में उपलब्ध है। इस भ्रामक तिथि के आधार सन ७८८ ईसवी में ‘अभिनवशंकर’ नाम के एक श्रेष्ठ आचार्य का होना है। उन्होंने देश में बहुत सारे मठों की स्थापना की थी इसलिए परवर्ती विद्वानों ने उन्हें ही आद्य शकंराचार्य होने का भ्रम पाल लिया। अंग्रजों के साम्राज्य संरक्षण में यह तिथि सुविधाजनक होने से सन ७८८ ईसवी ही अंग्रज इतिहासकारों ने प्रमाणिक मान कर प्रचारित कर दी।
आचार्य शंकर के जीवन क्रम को समझने के लिए एक बार यहां काल गणना का विचार करना आवश्यक है। वर्तमान समय में विश्व भर में अंग्रेजी काल गणना ईसवी सन प्रचलित है जबकि भारत के सभी धार्मिक अनुष्ठान व संस्कार तथा सामाजिक-सांस्कृतिक पर्व विक्रमी संवत पर आधारित हैं, जो ईसवी सन २०१६ से ५७ वर्ष पूर्व २०७३ विक्रमी संवत के रूप में विद्यमान है। विदेशियों की तो बात ही छोड़ें अधिकांश भारतीय विद्वानों तक को यह ज्ञात नहीं है कि विक्रमी संवत तथा ईसवी सन के पूर्व विश्व में युधिष्ठिर संवत ही प्रचलित था। ज्ञातव्य है कि द्वापर युग महाभारत काल (युद्ध के बाद) आज सन २०१६ से ५,१५४ वर्ष पूर्व अर्थात ईसा पूर्व ३,१३८ में समाप्त होकर कलिकाल प्रारंम्भ हो गया था। धर्मराज युधिष्ठिर के राज्यारोहण -३,१३६ ई.पू. के दिन से विश्व में युधिष्ठिर संवत का प्रचलन प्रारंभ हुआ था। जहां तक विक्रमी संवत के प्रचलन का प्रश्न है वह युधिष्ठिर संवत के ३,०७६ वर्ष बाद प्रयोग में आने लगा था। दूसरे शब्दों में विक्रमी संवत के पूर्व ३,०७८ वर्ष तक सम्पूर्ण विश्व में युधिष्ठिर संवत का ही प्रचलन था। किन्तु वर्तमान विश्व पुराने इतिहास को ईसा पूर्व कह कर ही काल गणना का आकलन करता है। इसके कारण हम यहां आचार्य शंकर के जीवन क्रम का उल्लेख भी ईसा पूर्व कह कर ही करेंगे।
स्वामी ज्ञानानन्द सरस्वती का ‘शंकर श्वेत-पत्र’
काशी में परिव्राजक संन्यासी स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती द्वारा स्थापित ‘आद्य शंकराचार्य शोध संस्थानम्’ के अंतर्गत शंकराचार्य संबंधी अनेक महत्वपूर्ण शोध किए जा चुके हैं। उन्होंने आचार्य शंकर के जन्म दिन वैशाख शुल्क पंचमी संवत २०५६ वि., दिनांक १७ मई सन २००२ को ‘शंकराचार्य महासहस्त्राब्दि दिग्विजय समारोह’ के अवसर पर वाराणसी नगर निगम के प्रेक्षागृह में विद्वानों के सम्मुख एक ‘शंकर श्वेत-पत्र’ प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने ऊपर उल्लेखित-अभिनव शंकर के जन्म वर्ष ७८८ ईसवी के होने को भ्रमवश आद्य शंकराचार्य का जन्म दिन प्रचारित करने का उल्लेख किया था। इस भ्रम के कारण भारतीय इतिहास की अनेक प्रचलित तिथियों में संशोधन की आवश्यकता है।
आचार्य शंकर की जन्मतिथि ५०६ ई.पू होने का एक विशेष ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध है। उनसे पूर्व मीमांसा के उदभट विद्वान आचार्य कुमारिल भट्ट की भेंट तथा शास्त्रार्थ होना एक ऐतिहासिक सत्य है। कुमारिल भट्ट आचार्य शंकर से आयु में ४८ वर्ष बड़े थे। संस्कृत वाङ्मय में उनका जन्म -काल युधिष्ठिर संवत २०७७ अथवा ५५७ ई.पू. निर्धारित है। शंकराचार्य से प्रभावित हो उन्होंने बाद में संन्यास ग्रहण कर लिया तथा सुरेश्वराचार्य आध्यात्मिक नाम प्राप्त किया।
श्वेत पत्र के अनुसार धर्मग्रंथ ‘संस्कृत चन्द्रिका’, राजा सुधन्वा के उपलब्ध ताम्रपत्र, कांत्रची के ५४ वें आचार्य सर्वज्ञान सदाशिव कृत ‘पुण्यश्लोक मंजरी’, आचार्य शंकर के शिष्य तथा उनके प्रथम जीवनी लेखक चित्सुरवाचार्य द्वारा लिखित ‘वृहत्शंकर विजय ग्रंथ’, स्वामी दयानंद सरस्वती के ’सत्यार्थ प्रकाश’, पंडित उदयवीर शास्त्री कृत ‘वेदांत दर्शन का इतिहास’, प्रसिद्ध पाश्चात्य डॉक्टर विन्सेण्ट आदि के प्रमाण आद्य शंकराचार्य के इस सही जन्म-तिथि के प्रमाण पर्याप्त हैं।
इस श्वेत पत्र के अनुसार राजकुमार सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का जन्म आज से ३८६६ वर्ष पूर्व, १८८७ ई.पू. हुआ था। बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार देश भर में १५०० वर्षों तक अर्थात तीसरी शताब्दी ई. पूर्व तक रहा। उस काल खण्ड में वेदों, बलिप्रथा, यज्ञ तथा विभिन्न कर्मकाण्डों का प्रबल विरोध हुआ। सनातन धर्म लुप्तप्राय हो चला था। संस्कृत का स्थान ‘पाली’ भाषा ने ले लिया। कालांतर में बौध्द धर्म के कारण देश में अनाचार, पापाचार व अराजकता फैलने लगी थी। दैवी कृपा से उस समय आचार्य शंकर का आविर्भाव हुआ। उन्होंने वैदिक सनातन धर्म को पुनर्जीवित कर पूरे देश में पुनर्स्थापित कर दिया। संस्कृत फिर से लोक भाषा बन गई। उस हिसाब से आचार्य शंकर की जन्म तिथि ई.पू. ५०६ सत्य प्रमाणित होती है।
आचार्य शंकर जन्मजात अद्वितीय एवं असाधारण व्यक्ति थे। आपका जन्म केरल प्रदेश के ‘अलुवाई’ नगर के निकट पूर्णा नदी के तट पर स्थित ग्राम ‘कालडी‘ में माता आर्याम्बा की कोख से हुआ था। उनके पिता शिवगुरु का निधन शंकर के दो वर्ष की आयु में ही हो जाने से उनकी मां ने कुछ संबंधियों की सहायता से उनकी शिक्षा की व्यवस्था की। ३ वर्ष आयु में ही उनका अक्षर ज्ञान प्रारंभ होकर ५ वर्ष आयु में गुरुकुल में उनका प्रवेश कराया गया। उसी समय उनका उपनयन संस्कार हुआ। उनकी विलक्षण प्रतिभा का ही प्रमाण था कि मात्र ३ वर्षों में अर्थात ८ वर्ष की आयु में ही उनका चारों वेदों का अध्ययन पूर्ण हो चुका था जबकि सामान्यत: एक वेद के अध्ययन में ही १२ वर्ष का समय लगता था। ६ वर्ष की आयु में उन्होंने बच्चों के लिए ‘बाल-बोध संग्रह‘ पद्यों की रचना कर डाली थी।
वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना करना उनके जीवन का लक्ष्य था। उसके लिए उन्हें संन्यास आश्रम ग्रहण करना आवश्यक लगा। असहाय माता के एकमात्र अवलम्ब होने के कारण वे शंकर के संन्यास आश्रम ग्रहण करने के संकल्प को स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं। तब शंकर ने एक लीला की। मां की उपस्थिति में वे पूर्णा नदी में स्नान करने उतरे तथा ग्राह द्वारा उनका पैर गहरे पानी में खींच ले जाने का बहाना कर मृत्यु होने का भय दिखा कर उन्होंेने मां से संन्यासी बनने की अनुमति प्राप्त कर ली। बिना अनुमति लिए संन्यास ग्रहण करके वे मां को असंतुष्ट नहीं करना चाहते थे, किन्तु उन्हें संन्यास लेना था। इसलिए उन्होंने यह युक्ति निकाली थी। संन्यास धर्म की मान्यता के विपरीत ही उन्होंने मां को अंतिम काल में उनके पास उपस्थित रहने का वचन भी दे दिया। उस समय उनकी आयु थी मात्र ८ वर्ष की।
शंकर आध्यात्मिक गुरु की खोज में निकल कर उत्तर में नर्मदा नदी के बीच ऊँ के आकार के पर्वत, राजा मांधाता की तपस्थली ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग तीर्थ स्थान पहुंच गए। वहां वे उस ज्योतिर्लिंग के निकट एक गुफा में तपस्यारत आचार्य गोविंदपाद के यहां पहुंच गए तथा उनका शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। उनके शिष्यत्व में अल्पकाल ४ वर्ष रह कर ही उन्होंने हठयोग, राजयोग तथा ज्ञानयोग की शिक्षा प्राप्त की। यहीं ई.पू. ४६७ में उन्हें शंकराचार्य की उपाधि प्राप्त हुई। गुरु के सानिध्य में रह कर यहीं आपने ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ पर अपना विख्यात भाष्य लिखा। गुरु गोविंदपाद उन्हें परमाचार्य गुरु ‘गौडपाद’ के यहां जाने की आज्ञा देकर परलोक सिधार गए। आचार्य शंकर उनकी अंत्य-क्रिया करके परमगुरु की खोज में निकल पड़े।
महागुरु की खोज में आचार्य शंकर सर्वप्रथम चैत्र शुल्क त्रयोदशी ई.पू.४६७ को काशी गए। वहां मणिकर्णिका घाट पर उन्हें अस्पृश्य चाण्डाल के रूप में भगवान शिव के दर्शन हुए तथा शुद्ध- अशुद्ध, स्पृष्य-अस्पृश्य, म्लेच्छ भाव के घनान्धकार से निकल कर

उन्हें ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हो गया। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर अपनी ही उपाधि ‘शंकर’ प्रदान कर उन्हें भाष्य रचना हेतु बद्रिकाश्रम जाने की प्रेरणा दी। १६ वर्ष की आयु में ही उन्हें काशी के मर्णिकर्णिका घाट पर ही महर्षि वेदव्यास जी के भी दर्शन हुए जिनसे उनकी ८ दिनों तक ज्ञान चर्चा होती रही। आचार्य शंकर ने महर्षि व्यास जी से वहां प्राण त्याग करने की इच्छा व्यक्त की किन्तु व्यास जी उन्हें आगामी १६ वर्षों तक महाभाष्यों का प्रचार प्रसार करने तथा सनातन धर्म व संस्कृति को पुनःस्थापित करने का आदेश देकर अंतर्धान हो गए।
भगवान शिव का आदेश पाकर आचार्य शंकर सीधे बद्रिकाश्रम गए। वहीं उनकी परमाचार्य गौडपाद से भेंट हुई तथा उन्होंने अपने गुरु गोविंदपाद की आज्ञा से उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। आपके शिष्यत्व में रह कर उन्होंने प्रस्थानत्रयी ब्रह्मसूत्र, उपनिषद तथा श्रीमदभवदगीता के भाष्यों की रचना की। बद्रिकाश्रम के वास्तव्य काल में उसी समय आपने ई.पू ४६४ में ‘ज्योतिर्मठ’ की स्थापना की। यहीं से आपको देश के चारों कोनों में ४ पीठ (मठ) स्थापित करने का विचार आया।
इस मानसिक पृष्ठभूमि से दुबारा काशी जाकर वहां के विख्यात दशाश्वमेध घाट से आपने आश्विन शुल्क दशमी को ई.पू ४६२ में दिग्विजय यात्रा की घोषणा करके यात्रा प्रारंभ कर दी। सर्वप्रथम वे मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया ई.पू ४६१ माहिष्मती स्थित प्रकाण्ड विद्वान मण्डन मिश्र से मिले। वहां उनसे शास्त्रार्थ कर उन्हें उनसे कर्मनिष्ठा एवं कार्यकुशलता की प्रेरणा प्राप्त हुई। तदुपरांत वे मार्गशीर्ष शुल्क दशमी को उज्जयिनी के राजा ‘सुधन्वा’ से मिले। उन्होंने आपकी विद्धता से प्रभावित हो ‘सदाशिवपरात्परावतार मूर्ति’, ‘वैदिक धर्म सिद्धानोद्धारक मूर्ति’ बिरुदों से आपको सम्मानित किया। अपनी दिग्विजय यात्रा का प्रथम चरण पूर्ण करके आचार्य शंकर ने ३ वर्ष बाद वैशाख शुक्ल तृतीया ४६० ई.पू को यात्रा का दूसरा चरण प्रारंभ कर दिया। दोनों बार को मिलाकर आपको भाद्रपद पूर्णमासी ४८५ ई.पू को ८ वर्षों में बद्रीनाथ-केदारनाथ व कश्मीर से लेकर दक्षिण में कांची व रामेश्वर तक तथा पूर्व में कामरूप कामाख्या (असम) से लेकर गांधार (अफगानिस्तान) तक के राजा-महाराजाओं सहित दरिद्र जनता तक के लोगों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ जिससे आपको पूरे देश से विषमता को मिटाकर सामाजिक एकीकरण का कार्य करने का सम्बल प्राप्त हुआ। आपने साम्प्रदायिक (पांथिक) भेदभाव को मिटाकर वेदांत दर्शन का प्रतिपादन किया।
आचार्य शंकर ने सामाजिक -पांथिक एकीकरण के विचार से भारत के चारों कोनों में समाज के मार्गदर्शन हेतु चार पीठों व मठों की स्थापना करके विद्वान संन्यासियों को उनके शंकराचार्यों के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की। ई.पू. ४६४ में आपने बद्रिकाश्रम में ज्योतिष्पीठ की स्थापना से प्रारंभ करके पश्चिम के तीर्थ द्वारिकापुरी में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी ई.पू. ४६२ को शारदा पीठ तथा उसी वर्ष के अंत में फाल्गुन शुक्ल नवमी को दक्षिण में श्रृंगेरी पीठ एवं सब से अंत में पूर्व दिशा के विख्यात तीर्थ जगन्नाथपुरी में वैशाख शुक्ल पंचमी ई.पू.४८५ को गोवर्धन पीठ की स्थापना करके अपना लक्ष्य पूर्ण किया। इसके अतिरिक्त आपने सुदूर दक्षिण के कांचीपुरम में एक अतिरिक्त उपासना पीठ की भी स्थापना की। मीमांसा के श्रेष्ठ विद्वान कुमारिल भट्ट से संन्यासी बने सुरेश्वराचार्य को आपने इस उपपीठ के प्रथम शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। वस्तुत: इस विशाल भारतभूमि के चारों कोनों को आपने श्रेष्ठ धर्माचार्यों (शंकराचार्यों) के संरक्षण में एक सूत्र में बांधने का महान कार्य किया।
जगदगुरू के उपाधी से विभूषित आद्य शंकराचार्य ने अपने जीवन का अंतिम एक वर्ष इ.पू ४७८ में शारदा पीठ (द्वारिकापुरी) में व्यतीत किया। तदनंतर वे अपने अंतिम समय कांची उपपीठ में आ गए थे तथा आधुनिक साधनों से विहीन उस काल में भी सम्पूर्ण देश की आपने अथक पदयात्रा करके सनातन धर्म की पुनर्स्थापना व उसकी सुदृढ़ व्यवस्था करके ई.पू ४७७ में मात्र ३२ वर्ष ६ माह १० दिन की अल्प आयु में ही कांची में ही अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। आस्थावान भक्तों की तो मान्यता है कि वे कामाक्षी देवी के विग्रह में ही विलीन हो गए।
आज जिस सार्वभौम सनातन धर्म को हम पुष्पित-पल्लवित देखकर गौरवान्वित होने का अपना भाग्य सराह रहे हैं उसका एकमात्र श्रेय उन महान विभूति जगद्गुरू आद्य शंकराचार्य को ही है।
स्वामी ज्ञानानंद सरस्वती का ‘शंकर श्वेत-पत्र’ संस्कृत के श्रेष्ठ ग्रंथों पर आधारित शोधपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाणिक दस्तावेज है जिसके परिप्रेक्ष्य में भारत के प्राचीन इतिहास की वर्तमान भ्रांतियों का स्पष्ट निवारण किया गया हैं। भारतीय विद्वानों, शिक्षाशास्त्रियों, इतिहासकारों, राजनेताओं तथा विशेषकर संस्कृत के आचार्यों से अपेक्षा है कि भारतीय इतिहास का सही ढंग से निरूपण करके वर्तमान सहित भावी पीढ़ी को भी लाभान्वित करें।

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