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विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृति भारतीय संस्कृति है। भारत की भूमि में मूर्त-अमूर्त संस्कृति की स्पष्ट छाप है जो सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है। पहले पाठन-श्रवण द्वारा भावी पीढ़ी को सांस्कृतिक विचारधारा से परिचित कराया जाता था। शनै: शनै: वैज्ञानिक प्रगति के साथ ही प्रचार-प्रसार के माध्यम से भी परितर्वन आया।

समाज में जनसंचार के बदलते माध्यमों के साथ ही प्रिंट मीडिया के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया के आगमन से कम समय में अधिकाधिक लोगों तक कोई भी सूचना, खबर पहुंचाना आसान हो गया है। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से भारतीय संस्कृति एवं भारतीय सांस्कृतिक विचारधारा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है।

भारतीय टेलीविजन कि शुरुआत १९५६ में शिक्षा कार्यक्रमों के प्रसारण के परीक्षण के साथ हुई। छोटे परदे के कार्यक्रम १९७० के मध्य में शुरू किए गए। उस समय केवल एक राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन ही था, जो सरकार द्वारा अधिकृत था। १९८२ में भारत में नई दिल्ली एशियाई खेलों के साथ टी वी प्रोग्रामिंग में क्रांति आई। उसी वर्ष भारत में पहली बार रंगीन टी वी का आगमन हुआ। रामायण और महाभारत कुछ लोकप्रिय टेलीविजन श्रृंखलाओं में से थे। १९८० के दशक के अंतिम हिस्से तक अधिक से अधिक लोगों के पास अपने टीवी सेट हो गए थे। परंतु चैनल एक ही था। इसलिए सरकार ने एक अन्य चैनल खोल दिया जिसमें कुछ भाग राष्ट्रीय प्रोग्रामिंग और कुछ भाग क्षेत्रीय प्रोग्रामिंग का था। इस चैनल को डीडी-२ और बाद में डीडी मेट्रो के रूप में जाना जाता था। १९८१ में, सरकार ने अपने बाजार खोले और केबल टेलीविजन की शुरुआत हुई। तब से उपलब्ध चैनलों की संख्या में एक बड़ा उछाल आया है। इस समय निजी क्षेत्र में १७९० एवं सरकारी क्षेत्र में १९० चैनल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्द्धन कर रहे हैं। इसमें भारत के सभी राज्यों के हजारों कार्यक्रम है। छोटे परदे ने कई मशहूर हस्तियों को जन्म दिया है और उनमें से कुछ आज अपने लिए राष्ट्रीय ख्याति अर्जित कर चुके हैं। कामकाजी महिलाओं और युवाओं में टी वी धारावाहिक बेहद लोकप्रिय हैं। कुछ प्रमुख धारावाहिक निम्न हैं-

रामायण
भारत में सर्वप्रथम पौराणिक महाकाव्य ‘रामायण’ का निर्माण रामानंद सागर ने भव्य पैमाने पर किया जिसका प्रसारण २२ जनवरी, १९८७ से ३१ जुलाई, १९८८ तक दूरदर्शन के राष्ट्रीय केन्द्र से हुआ। ३५ मिनट की अवधि वाला यह धारावाहिक ७८ कड़ियों में प्रसारित हुआ था। ‘वाल्मीकि रामायण’ एवं तुलसीदास-कृत ‘रामचरितमानस’ पर आधारित इस पौराणिक धारावाहिक का निर्माण, लेखन, निर्देशन रामानंद सागर ने किया। राम का सम्पूर्ण जीवन विश्व के लिए प्रेरणा का केन्द्र बिन्दु बना। सात काण्डों में समाहित इस महाग्रंथ में इतिहास, भ्ाूगोल, दर्शन, राजनीति, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि सभी पक्षों का वर्णन है। नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से महाकाव्यों की पौराणिक कहानियों को पहुंचाने में निश्चय ही प्रसार भारती का विशेष योगदान रहा है।

महाभारत
‘रामायण’ के पश्चात् हिन्दू धर्म में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पौराणिक महाकाव्य ‘महाभारत’ की कथा पर भव्य धारावाहिक ‘महाभारत’ का प्रसारण राष्ट्रीय दूरदर्शन पर हुआ। बी आर चोपड़ा द्वारा निर्मित रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित इस भव्य धारावाहिक का प्रसारण २ अक्टूबर, १९८८ से लेकर २४ जून, १९९० तक ४५ मिनट की अवधि तक प्रत्येक रविवार को ९४ कड़ियों में प्रसारित हुआ। इसकी स्क्रिप्ट प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. राही मासूम रज़ा ने लिखी थी।
बी.बी.सी. लंदन द्वारा यूनाइटेड किंगडम में दिखाए गए इस धारावाहिक की पहुंच वहां लगभग ५० लाख दर्शकों तक रही। राष्ट्रीय चैनल पर नब्बे के दशक में दिखाए जाने वाले इस धारावाहिक में महाभारत काल की सम्पूर्ण कथा को ६ पीढ़ियों तक (अर्थात् महाराज शांतनु से लेकर अभिमन्यु पुत्र राजा परीक्षित तक) दिखाया गया था। ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ के राष्ट्रीय दूरदर्शन पर प्रसारण से न केवल इसके अनगिनत महत्वपूर्ण वृत्तांत लोगों के बीच में आए बल्कि इनके महत्त्वपूर्ण पात्र जैसे- राम, सीता, हनुमान, कृष्ण, धृतराष्ट्र, गांधारी, भीष्म, अर्जुन, कर्ण आदि भी लोकप्रियता के ऊंचे पायदानों पर पहुंचे। इन धारावाहिक में दिखाए जाने वाले देव राम, सीता, हनुमान, कृष्ण, शिव के प्रति लोगों की अगाध श्रद्धा और विश्वास जगाने में ये पौराणिक नाटक सफल रहे।

ओम नमो शिवाय
‘ऊँ नमो शिवाय’ का निर्माण जुब्बी कोचर ने महादेव, विश्वनाथ आदि अनेक नामों से विभ्ाूषित शिव को केन्द्र में रखकर १९९७ में किया। इसका प्रसारण भारतीय दूरदर्शन के दोनों चैनलों ने २०८ कड़ियों में किया। धारावाहिक के निर्देशक धीरज कुमार के अनुसार, उपर्युक्त शोध ९ वर्षों में पुरा हुआ है जिसमें सम्पूर्ण भारतीय सांस्कृतिक विरासत को देखा जा सकता है। इस धारावाहिक के प्रमुख पात्रों में शिव (जय समर सिंह) तथा पार्वती (गायत्री शास्त्री) की भ्ाूमिका में थे।

गुरू मानियो ग्रंथ
भारतीय दूरदर्शन ने सिक्ख समाज तथा भारतीय जनमानस से संवाद स्थापित करने के लिए गुरूग्रंथ साहब की गुरू गद्दी के ३०० वर्षों पर ‘गुरू मानियो ग्रंथ’ नाम से गायक रवीन्द्र ग्रेवाल के मधुर स्वरों में प्रस्तुत किया जिसमें सिक्ख इतिहास, सिक्खी सिद्धक, वैशारवी, बानी सद्गुरू की, गुरू दी नगरी, खैर दातिया तथा बुबुला पानी दा का मधुर स्वरों में सम्पूर्ण भारत में प्रसारण हुआ तथा सभी प्रसार भारती अभिलेखागार में संरक्षित किए गए हैं।

छत्रपति शिवाजी
छत्रपत्रि शिवाजी के पराक्रम, देशभक्ति तथ प्रजावत्सलता से प्रभावित होकर निर्माता-निर्देशक विनय आपटे ने ‘छत्रपति शिवाजी’ नामक धारावाहिक का निर्माण किया जिसे दूरदर्शन ने बारी-बारी से कई कड़ियों में प्रसारित किया है। यद्यपि छत्रपति शिवाजी धारावाहिक के निर्माता-निर्देशक तथा प्रसार भारती के बीच कुछ विवादों के कारण यह धारावाहिक कुछ समय के बाद शुरू हो पाया। इस धारावाहिक के माध्यम से भारतीय इतिहास के मराठा शासक ने जनमानस में सकारात्मक प्रभाव डाला है।

चाणक्य
भारतीय राजनीति, कूटनीति के श्रेष्ठतम नायकों में चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरू ‘चाणक्य’ का विशेष स्थान है। राजनीति के महापंडित कौटिल्य जिन्हें ‘चाणक्य’ नाम से जाना जाता है। इनकी कथा पर आधारित धारावाहिक ‘चाणक्य’ ४७ कड़ियों में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ। इसका प्रसारण ८ सितम्बर, १९९१ से लेकर ९ अगस्त, १९९२ तक हुआ। इसका लेखन, निर्देशन, निर्माण चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने किया था। इस धारावाहिक में गुप्तकाल के ३४० बी.सी. से लेकर ३२१ बी.सी. तक की कथा के दौरान चाणक्य के जन्म, उनका बचपन, उनकी शिक्षा-दीक्षा, चन्द्रगुप्त मौर्य की कथा, नंदवंश का काल, तत्कालीन भारत की राजनीति, सभी की ज्ञानपरक जानकारी इस नाटक में मिलती है।

भारत एक खोज
सन् १९८८ में पं० जवाहरलाल नेहरू द्वारा रचित ‘द डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ पुस्तक का हिन्दी नाट्य रूपांतरण राष्ट्रीय दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ। ५३ कड़ियों में प्रसारित होने वाले इस धारावाहिक में भारत के ५ हजार वर्षों तक इतिहास समाहित था। ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में भारतीय सांस्कृतिक विरासत, इतिहास और दर्शन समाहित है। ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ का ‘भारत एक खोज’ के रूप में नाट्य रूपांतरण श्याम बेनेगल ने किया था। उन्होंने इसका लेखन, निर्देशन एवं निर्माण कर भारतीय इतिहास, राजनीति और दर्शन को भव्य रूप में समाज के सम्मुख रखा। रामायणकाल से लेकर गुप्तवंश, चोलवंश, सम्राट हर्षवर्धन, पृथ्वीराज चौहान तक के विशाल ऐतिहासिक भाग को इस धारावाहिक में दिखाया गया। भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ नायकों की गाथा इसमें है। भारतीय दूरदर्शन ने ‘भारत एक खोज’ द्वारा भारत की समृद्ध ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक और दार्शनिक परम्परा पर प्रकाश डाला।

काशी की सांस्कृतिक परंपरा
भारतीय ॠषियों-मुनियों के मन-मष्तिष्क में सदैव से ही एकता की भावना रही है। भारतीय मनीषा के अनुसार-‘‘अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवन्तिका:। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिका:।’’(अर्थात् अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची अवन्ति, पुरी तथा द्वारावती श्रद्धेय तथा मोक्षदायिनी हैं।)

वाराणसी को अनेक विशेषणों जैसे ‘मंदिरों का शहर’,‘भगवान शिव की नगरी‘,‘भारत की धार्मिक राजधानी और ‘दीयों का शहर‘ आदि से संबोधित किया जाता है। ज्ञान की नगरी वाराणसी को काशी भी कहा जाता है। वाराणसी का इतिहास भी काफी पुराना है। किवदंतियों से भी प्राचीन और जब इन सबको एकत्र कर दें तो उस संग्रह से भी दो गुना पुराना है। वाराणसी नाम का उद्गम संभवत: यहां की दो नदियों वरूणा और असि नाम के मिलने से हुआ है। यह शहर सदा से ज्ञान, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र रहा है। ॠग्वेद में इस शहर को काशी या कासी नाम से बुलाया गया है।

काशी के महत्व के कारण ही हरेक इंसान की यह इच्छा होती है कि वह जीवन में कम से कम एक बार जरूर जाए। काशी को ‘मृत्यु की नगरी‘ (मुमुक्षु )भी कहा जाता है। यहां अस्सी घाट पर ही एक मुमुक्षु भवन है, जहां काशी में मुक्ति अर्थात मृत्यु की इच्छा लिए लोग आते हैं। उनका तथा शास्त्रों का मानना है कि मौत के बाद शरीर का नाश नहीं बल्कि इंसान को जन्म-मृत्यु से भी मुक्ति मिल जाए। इसीलिए यह मृत्यु की नगरी कहलाई। मणिकर्णिका घाट से कुछ ही दूरी पर काल भैरव मंदिर है। भैरव वह है जो जातक को भय से दूर ले जाता है। यह मौत है जो समय से बंधी है। काल भैरव का अर्थ हुआ-‘समय का भय।’।

यही संत कबीर ने कहा था-‘कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ’। संत रैदास की जन्मस्थली भी यही है। यहीं महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ है जिसकी स्थापना महात्मा गांधी ने राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त के माध्यम से कराई थी जिसने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भ्ाूमिका निभाई। यहां से देश के दूसरे प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने शिक्षा प्राप्त कर भारतीय राजनीति को त्याग, समर्पण तथा अपरिग्रह का संदेश दिया। काशी की इसी पवित्र धरा पर जगद्गुरू शंकराचार्य को एक चाण्डाल ने अद्वैत वेदांत का व्यावहारिक ज्ञान दिया था।

वाराणसी में ही विश्व प्रसिद्ध एक तीर्थ स्थल है जिसका नाम सारनाथ है। यहीं पर अपने शिष्यों के साथ महात्मा बुद्ध ने ‘बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि’ का मंत्र दिया था। ज्ञान की अनंत धाराओं का प्रचार -प्रसार यहीं से हुआ। यहीं से बौद्ध धर्म संपूर्ण विश्व में फैला।

यहीं महामना मदन मोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को स्थापित किया। उनके मन में हिन्दू, हिन्दी तथा हिन्दुस्तान को लेकर एकमात्र स्वप्न था। जिस स्वप्न का साकार रूप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आज खड़ा है। अब नरेन्द्र मोदी महामना की तरह ही अतीत एवं वर्तमान में तालमेल बैठा रहे हैं। पवित्र तुलसीदास के अस्सी घाट से स्वच्छ गंगा, स्वच्छ अभियान का श्रीगणेश किया तो एकमात्र संदेश यही था- ‘ तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहें।’

जयति जय उज्जयिनी
भारत की सात मोक्षदायिनी नगरियों में से उज्जयिनी, (उज्जैन, अवन्तिका) है। भारतीय संस्कृति में उज्जैन का विशेष स्थान है। भारतीय दूरदर्शन के अपर महानिदेशक श्री राजशेखर व्यास तीन महत्वपूर्ण, वृत्तचित्रों: ‘जयति जय उज्जयिनी’,‘काल’ तथा ‘द टाइम’ का निर्माण कर चुके हैं जिसका सजीव प्रसारण भारतीय आकाशवाणी एवं दूरदर्शन ने किया है। इसमें भारतीय सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ ऐतिहासिक, राजनीतिक, साहित्यिक स्थलों को भी स्थान दिया गया है। भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की थाती के लिए प्रसिद्ध है और विश्व भर में भारतीय कला, नृत्य, दस्तकारी, शिल्प और परिधान के प्रशंसकों की कमी नहीं है जो प्रसार भारती द्वारा किए गए कार्यों से ही संभव हुआ है।

भारतीय समृद्ध ज्ञान की अनदेखी
लगभग गत ६ दशकों से कांग्रेस सरकार ने भारतीय संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत और दूरदर्शन को एकांगी दृष्टि से जनता को दिखाने का प्रयास किया जिसमें आपातकाल एवं स्वतंत्रता संघर्ष के संबंध में सत्तासीन सरकारी दृष्टि को ही केन्द्र में रखा तथा लोकतंत्र, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, मुगलकालीन हिन्दू प्रतिरोध तथा सिक्ख गुरूओं के बलिदान को उपेक्षित, संकीर्ण तथा दबाने का प्रयास किया है, जो एकपक्षीय, भ्रामक, मनगढंत तथा पूर्वाग्रह से ग्रसित भी हो सकता है। इसमें इस अवधारणा का सरकारी प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा विकास किया गया है कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में सर्वाधिक योगदान कांग्रेस का था। उसने भारतीय जनमानस में सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, श्री गुरूजी, डॉ. हेडगेवार, महामना मदनमोहन मालवीय, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, विनायक दामोदर सावरकर के व्यक्तित्व-कृतित्व को उतना स्थान नहीं दिया जितना कि उन्हें दिया जाना चाहिए। आज की युवा पीढ़ी को यह जानने की तीव्र उत्कंठा है कि ३० जनवरी, १९४८ को महात्मा गांधी की हत्या हुई तो पं. जवाहरलाल नेहरू ने राजनीति एवं मीडिया द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को क्यों दबाया? २५ जून, १९७५ को देश पर थोपा गया आपातकाल सही था या गलत? देश की जनता को यह भी जानने की इच्छा है कि भारतीय दूरदर्शन ने श्रीराम जन्मभ्ाूमि, श्रीकृष्ण जन्मभ्ाूमि तथा श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया?

हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के मूल स्रोत-वेद, उपनिषद्, पुराण, रामायण, महाभारत, भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति, राजनीति, इतिहास और मीडिया से संबंधित साहित्य का अध्ययन करते समय मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अक्षय भंडार होते हुए भी समाज का युवा और बुद्धिजीवी वर्ग परमुखापेक्षी है तथा वह समस्त समस्याओं का समाधान पाश्चात्य दृष्टि से ही करने का प्रयास करता है जबकि भारतीय सांस्कृतिक ग्रंथों में सम्पूर्ण विश्व के समस्याओं का समाधान है।

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