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विगत पांच सहस्त्राब्दियों में भारत के राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक जीवन को जितना श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरित्रों ने प्रभावित और अनुप्रणित किया है, उतना अन्य किसी चरित्र ने नहीं किया है। राम के बिना सनातन भारत की संस्कृति और संस्कार की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। हिंदू संस्कृति और परिवार में जन्म से लेकर मृत्यु तक राम ही बसे हुए हैं। अतएव जब हिंदू परिवार में व्यक्ति का जन्म होता हैं तो शिशु रूप में राम ही जन्म लेते हैं और जब मृत्यु होती है तो सगे-संबधी ‘राम नाम सत्य है’ के साथ अंतिम संस्कार करते हैं। भारतीय जीवन में जो भी आचरण योग्य है, मर्यादित है, समुन्नत एवं समृद्ध है, अनुपम है और अप्रतिम है, वह सब राम के चरित्र में प्रतिबिंबित होता है, जिसका अनुसरण, अनुगमन हर हिंदू के लिए जीवन की सफलता का पथ प्रशस्त करता है। राम का व्यक्तित्व, कर्तृत्व और आचरण उन जीवन मूल्यों को रेखांकित करते हैं जो भारत की मनीषा एवं चेतना के आधार हैं। यही कारण है कि यह भारत देश अनादि काल से अनेक संकटों का सामना करता हुआ आज भी नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विश्व में अपनी श्रेष्ठता को स्थापित करने का दावा रखता है।
जिस इश्वाकू वंश में राम ने जन्म लेकर संपूर्ण विश्व को मानवीय आचरण के सर्वोच्च आदर्श की राह दिखाई, उस वंश की विशेषताओं को जानना आवश्यक है, जिससे पता चलता है कि जीवन में किसी आदर्श की स्थापना करनी है, तो उसके लिए पी़ढ़ी-दर-पीढ़ी कितनी तपश्चर्या और त्याग की आवश्यकता होती है। राम का धरती पर जन्म रधुवंश में राजा दिलीप से लेकर दशरथ तक की एकांतिक साधना, वेद सम्मत जीवन जीने की अविचल, उत्कट अभिलाषा, मानवीय मूल्यों के प्रति असंदिग्ध आस्था का ही परिणाम है। कवि कुलगुरु कालिदास के रघुवंश में इन राजाओं की जीवनचर्या के बारे में अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया है। राम जैसा पुत्र प्राप्त करने के लिए दस-दस पी़ढियों का तप करना पड़ता है। रघुवंश के मंगलाचरण में कालिदास ने ऐसे रघुवंशी राजाओं के जीवन वृत का वर्णन किया है, जिसे केवल जानना ही नहीं, बल्कि समझना, फिर अनुकरण करने के लिए अपनी मन:स्थिति बनाना आज की परिस्थिति में अधिक समीचीन जान पड़ता है। कालिदास ने लिखा-
सोहऽमाजन्म शुद्धानामा फलोद्य कर्मणाम।
आसमुद्रद्वितीशा नामादा करथवर्त्मनाम॥
यथाविधिहुताग्नीनाम यथाकार्मार्चर्तार्थनाम।
यथाऽपराघ दण्डाना यथाकाल प्रबोधिनाम॥
त्यागाय समृतार्थानां सत्याय मिताभाषिणाम।
यगसे निजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिणाम॥
छैशवेऽ म्यस्त विझाणाम यौवने विषयैषिणाम।
वार्धक्ये मुनिक्ृतीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम॥
उपर्युक्त चार श्लोकों में कालिदास ने रघुवंशीय राजाओं के जीवन का वर्णन किया है, जिनका जन्म शुद्धता, पवित्रता का आदर्श था। वे समृद्धि के उपासक थे, त्यागपूर्ण जीवन जीते थे, शैशव में सभी का विद्याध्ययन, यौवन में विषयों का सम्यक उपभोग, वृद्धावस्था में मुनिवृत्ति से रहने वाले और अंत में योग द्वारा देह विसर्जन करने वाले रघुवंशी परिवार में राम का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मिकि ने रामायण में राम को मर्यादा पुरुषोत्तम, धर्म के साक्षात विग्रह के रूप में अंकित किया है। राम साक्षात विग्रह वान धर्म- जीवन के कठिन तम क्षणों में जिन्होंने सदैव धर्म अर्थात अपने कर्तव्य का पूरी दृढ़ता तथा विनम्रता से पालन किया-वैसा चरित्र विश्व में ‘राम’ के अलावा कहीं नहीं मिलता। और चरित्र की इस श्रेष्ठता, और उदात्तता के कारण ही मध्ययुग में गोस्वामी तुलसी ने उनको साक्षात ईश्वर ही मान लिया-
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहि तह मोह निसा लवलेसा
सहज प्रकासरुप भगवान। नहिं तेह पुनि बिग्यान बिहाना॥
श्री राम सत चित आनंद स्वरुप सूर्य है। वहां अज्ञान, मोहरूपी रात्रि नाममात्र के लिए भी नहीं है। राम स्वभाववश ही प्रकाश रुप हैं, ज्ञान स्वरूप भगवान ही हैं। अत: जब १४ वर्ष के वनवास के बाद रामजी का अयोध्या आगमन होता है और उनका राज्यभिषेक होता है तो समस्त अयोध्या में आनंद ही आनंद व्याप्त हो जाता है। तुलसी ने वर्णन किया-
राजा राम जानकी रानी। आनंद अवघ अवघ रजघानी।
रघुपति चरित्र देखि पुरबासी। पुनि पुनि कह हिं घव्य सुखराही॥
श्री रामजी का चरित्र और उनके प्रशासन की कुशलता देख कर सभी प्रजाजन स्वयं को धन्य मानते हैं। उत्तरकांड में तुलसी ने ऐसे रामराज्य का संक्षिप्त वर्णन किया है। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के स्वतंत्र भारत के शासन प्रशासन की वही कल्पना की थी और इसका उल्लेख वह समय-समय पर बड़ी गंभीरता और गौरव के साथ करते थे। गांधीजी ने आजाद भारत का वैसा ही सपना देखा था, जैसा कि राम के राज्य में शासन व्यवस्था का स्वरूप था। सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा सहिष्णुता के साथ रहने को गारंटी, व्यक्ति की गरिमा का सम्मान, मानवीय मूल्यों का निष्ठा के साथ सभी के आचरण में दर्शन, यही तो गांधीजी की आजाद भारत की कल्पना थी। यह बात दूसरी है कि आजादी के ७० वर्ष की समयावधि में गांधीजी के उत्तराधिकारी होने के दावा करने वालों ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल करके राम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। तथापि, गांधीजी का भारत का संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन ही इस तत्व से प्रेरित था, जिसके मूल में सत्य, अहिंसा और सहिष्णुता की भावना थी और यही कारण था कि गांधीजी के विचार ने न केवल भारत की आजादी को बल्कि विश्व के अनेक देशों के स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग और अफ्रीका के नेल्सन मंडेला ने अपने-अपने देशों में जिस तत्व का सहारा लिया, वह गांधीजी का ही अवदान था और गांधीजी सत्य, शील, सौंदर्य और सहअस्तित्व के विग्रह राम से ही तो प्रेरित थे।
महात्मा के स्वराज्य और सुराज की कल्पना केवल मानव के कल्याण तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके रामराज्य की विचारधारा में प्रकृति, पर्यावरण, पशुपक्षियों के संरक्षण- संवर्धन भी शामिल था, जिसका उल्लेख तुलसी ने राम की शासन व्यवस्था का वर्णन करते हुए किया है। रामचरित मानस में रामराज्य के अंतर्गत समाज में प्रजा के सभी जन किस प्रकार से अपने जीवन का निर्वाह करते थे, उसका बड़ा ही अद्भुत वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के अंतिम अध्याय में किया हैं।
रामराज्य की विशेषताओं की गोस्वामी तुलसीदासजी निषादराज के मुंह से कहलवाया है। निषादराज राम राज्याभिषेक के बाद अयोध्या से विधिवत विदा होकर वापस अपने घर आते हैं और अपने परिवार वालो को रामराज्य की विशेषताओं के बारे में बताते हैं।
राम राज बैठे त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई।
निषादराज कहते हैं कि जब से राम राजगद्दी पर बैठे हैं, उससे तीनों लोकों में प्रसन्नता और हर्ष का वातावरण छाया हुआ है। सभी प्रकार के शोक, दु:ख से मुक्ति मिल गई है। कोई किसी से वैर नहीं करता। श्री रामचंद्र के व्यक्तित्व और आचरण के प्रताप से समाज में सभी प्रकार के भेदभाव समाप्त हो गए हैं। सुराज की पहली शर्त ही यह होती है कि राज्य का शासन इस प्रकार से चले, जिसमें समाज में किसी से किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और सभी लोग एक दूसरे के साथ प्रेम और एक्य भाव से रहे। रामराज्य में शासन का उद्देश्य था विषमता को समाप्त कर समाज में सर्वत्र सभी को अपने-अपने गुणों और क्षमता के आधार पर विकास और प्रगति के समान अवसर उपलब्ध कराना; अतएव किसी का किसी से न तो वैर था और न ही इर्ष्या थी।
निषादराज आगे कहते हैं-
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहि भय सोक न रोग
अर्थात सभी लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल अपने-अपने धर्म (कर्तव्य) करते हुए वेदों में बताए गए मार्ग के अनुसार चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी प्रकार का रोग है, न ही शोक है ओर न ही कोई भय सताता हैं।
आधुनिक शासन प्रणाली में, जिस लोक कल्याणकारी (वेलफेयर स्टेट) की परिकल्पना की गई है, वह आज से हजारों वर्ष पूर्व हमारे राष्ट्रजीवन और समाज जीवन का अभिन्न अंग थी, और श्री राम के राज्य में उसका पूरी निष्ठा के साथ शासन, शासक तथा प्रजा द्वारा पालन किया जाता था।
रामराज्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास आगे लिखते हैं-
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज काहू नहिं व्यापा।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।
चारिउ चरन धर्म जग मांहि । पूरि रहा सपने हु अध नाहि।
राम भगति रत अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी।
अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा सब सुंदर सब बिरुज सरीरा
नहिं दरिद्र कोई दूकी न दीना नहिं कोई अबुधनलच्छनहीना
सब निर्दभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।
राम राज नमगेस सुनु सचराचर जग मांहि।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहि॥
रामराज्य में किसी भी प्रकार भौतिक, दैहिक तथा दैविक समस्याएं नहीं थीं। शासन की व्यवस्था इस प्रकार थी, प्रकृति, पर्यावरण तथा पशु-पक्षियों के उचित संरक्षण-संवर्धन के कारण प्राकृतिक आपदाएं नहीं थीं। जल-तालाब, नदियां जल से भरपूर थीं। अकाल, बाढ़ आदि की कोई समस्या नहीं थी। सभी लोग तन मन से स्वस्थ और एक दूसरे की सहायता-सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते थे।

अपने-अपने सामाजिक-सांस्कृतिक-पारिवारिक दयित्वों का पूरी निष्ठा से पालन करते थे। आर्थिक और आचरण की दृष्टि से कोई दरिद्र नहीं था, कोई दुखी नहीं और कोई किसी प्रकार से दीन अर्थात किसी पर आश्रित नहीं था। सभी लोग शिक्षित और दीक्षित थे। स्वभाव से नियमों का पालान करने वाले, अहंकार से मुक्त होकर एक दूसरे का सम्मान करके सुख, शांति से भयरहित जीवन व्यतीत करते हुए समाज जीवन में योगदान करते थे। भारत के संविधान की प्रस्तावना में भी तो यही बात कही गई है, किन्तु उनका अनुपालन और उस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए राज्य के शीर्ष नेतृत्व में जिस चरित्र की आवश्यकता थी उसके अभाव के कारण भारत में आज भी गांधी के राम राज्य की संकल्पना मृगमरीचिका बनी हुई है।
यदि रामराज्य की संकल्पना को साकार करना है, तो पहले लोगों में वैसे ही चरित्र का निर्माण करना होगा। धर्माधिष्ठित राजनीति से ही रामराज्य की स्थापना हो सकती है, किन्तु धर्म का अर्थ रीलिजन, पंथ, सम्प्रदाय, उपासना पद्धति नहीं है बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार सनातन धर्म-जीवन जीने की पद्धति है, उस भाव से राम के आचरण को आदर्श मान कर उसका अनुकरण करने का वातावरण तथा समाज में उसका चैतन्य तथा जागरूकता पैदा करनी आवश्यक है तभी रामराज्य का सपना साकार हो सकता है। राम नवमी के पवित्र अवसर पर जब संपूर्ण हिंदू समाज राम का जन्मोत्सव मना कर स्वयं को धन्य अनुभव करता है, उसीके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि राम जी के चरित्र और उनके आचरण को अपने जीवन का ध्येय बना लेंऔर श्रेष्ठ भारत, समर्थ भारत के निर्माण में अपना योगदान दें। राम जी से यही प्रार्थना है-
तोमार पाताका जारे दाओ तारे बहिबारे दाओ शकती ।
तोमार सेवार महान दु:ख सहिबारे दाओं भक्ती ॥
रामजी आपने अपना झंडा हमारे हाथों में दिया है तो उस झंडे को आगे ले चलने की ताकत भी दो और सब से यही अभ्यर्थना कि हम सब मिल कर रामजी का काम करें।

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