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संसदीय स्थायी समिति ने देशहित औेर राष्ट्र सुरक्षा मामले पर महत्वपुर्ण सुझाव दिया है। सुझाव में कहा गया है कि जो भी सरकारी नौकरी में प्रवेश करेगा, उन्हे पहले 5 वर्षो के लिए सेना में काम करना अनिवार्य किया जाये। इससे सेना की मानव संसाधन क्षमता बढ़ेगी और कमियां दुर होगी।

भारतीय थल सेना में 7 हजार अधिकारी और 20 हजार से अधिक सैनिकों की आवश्यकता है। वायु सेना में 150 अधिकारी और 50 हजार सैनिक तथा नौसेना में 150 अधिकारी और 15 हजार सैनिकों की कमी है।

     वर्तमान समय में भारत सरकार के विविध विभागों में 30 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी कार्यरत है। इसके अलावा सभी राज्य सरकारों के अधिन 2 करोड़ से अधिक कर्मचारी सेवारत है। इनमें से कुछ मेनपावर का सैन्य कार्यो में उपयोग करने से दो फायदा होगा। इनका मानधन राज्य और केंद्र के खातों से जाने के कारण डिफेंस बजट नहीं बढ़ेगा और हमारी सुरक्षा भी मजबुत होगी। विगत 4 वर्षो से डिफेंस क्षेत्र के आधुनिकिकरण हेतु पर्याप्त राशि नही दी गई है। जिससे सेना की अधोगति हो रही है। अनेकानेक सामाजिक कारणों के चलते डिफेंस बजट नही बढ़ाया जा सकता।

आज की स्थिति में 68 फीसदी से अधिक युध्दक सामग्री बेहद पुरानी हो चली है। केवल 24 फीसदी ही उपयोग के योग्य है और मात्र 8 फीसदी ही आधुनिक है। यह सैन्य स्थिति निश्चित रुप से देश के लिए घातक है।

इसका दुसरा फायदा यह है कि राज्य और केंद्र सरकार के कर्मचारियों में देशप्रेम,देशभक्ति,अनुशासन और विपरित परिस्थिति में काम करने की क्षमता विकसित होगी। जिससे वह देशवासियों से अच्छा व्यवहार करेंगे और उनके कार्य का दर्जा भी बढ़ेगा।

* सरकारी कर्मचारियों को आधुनिक प्रशिक्षण जरुरी

आनेवाले समय में प्रत्येक सरकारी अधिकारी व कर्मचारियों को सेना में 5 वर्षो की सेवा अनिवार्य रुप से देनी होगी। इसके पुर्व भी एैसा सुझाव दिया गया था परंतु इसे अमल में नही लाया जा सका

था। आर्थिक रुप से कमजोर पड़ने पर देश की रक्षा हेतु रक्षा खर्च कम कर

सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए, इस पर ध्यान देना होगा। इसके लिए सरकारी कर्मचारियों का योग्य उपयोग कर सैन्य बजट में कमी लाई जा सकती है। हालांकि इससे कौन सी चुनौतियां हमारे सामने आएंगी, इस पर भी विचार करना चाहिए।

सेना में शामिल होनेवाले सरकारी कर्मचारियों को आधुनिक प्रशिक्षण देना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों को एैसे क्षेत्रों में तैनात किया जा सकता है जहां खतरा कम हो। उदाहरण के लिए भारत- चीन सीमा सहित म्यांमार,नेपाल,बांग्लादेश की शांतिपुर्ण सरहदों पर इन्हे भेजा जा सकता है। हिंसक गतिविधियों वाले क्षेत्रों को छोड़ कर सभी क्षेत्रों में इनका योग्य उपयोग किया जा सकता है। इस योजना को अमल में लाने से सभी सरकारी कर्मचारियों को प्रतिकुल परिस्थिति में रहकर काम करने का अनुभव मिलेगा। अपने कार्यक्षेत्र में वापस आने पर उन्हे अपनी जिम्मेदारियों  का सदा ही भान रहेगा और वह पुरे सर्मपर्ण भाव से जनता की सेवा कर पाएंगे।

* कायरों को तत्काल सरकारी नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाए

जो भी सरकारी अधिकारी व कर्मचारी अपनी कायरता का परिचय देते हुये सेना में काम करने से इंकार करेगा, एैसे लोगों को तत्काल नौकरी से बाहर कर देना चाहिए। एैसा देखा गया है कि पुलिस में भर्ति हुए युवक माओवादी इलाकों में जाने से डरते है और राजीनामा तक दे देते है। इतना ही नहीं कुछ लोग अर्धसैनिक बलों और सीआरपीएफ में जाने की भी हिम्मत नही कर पाते। उन्हे केवल सुरक्षित स्थानों और आसान काम करने में ही रुची होती है। जैसे सेंट्रल इंडियन सिक्योरिटी फोर्स में जाना पसंद करते है, जो एयरपोर्ट की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालती है। चुनौति भरे क्षेत्रों में जाने से डरने वाले कायर लोगों को नौकरी से निकालना राष्ट्रहित में है।

यह नियम नए लोगों के साथ ही पुराने कर्मचारियों पर भी लागु किए जाने की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बहुतायत में कर्मचारी सामान्य जनता से अच्छा व्यवहार नही करते और न ही उन्हे सही ढ़ंग से अपनी सेवा प्रदान करते है। इसका मुख्य कारण सरकारी कर्मचारियों में कर्तव्य परायणता,निष्ठा,देशप्रेम,पारदर्शिता एंव सदव्यवहार का घोर अभाव होना है। अब से ही सही सरकारी कर्मचारियों को दुर्गम क्षेत्रों में भेजा जाए, जिससे सामान्य लोगों से व्यवहार करने की उनकी पद्धति में सुधार हो सकें।

* माओवादी, जमीन व समुद्री सीमा पर तैनाती

पुर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने अपने कार्यकाल के दौरान रक्षा मंत्रालय के कर्मचारियों को दुनिया के सबसे बड़े युध्द क्षेत्र सीयाचीन में अनुभव लेने हेतु भेजा था।इसी तर्ज पर गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय अंतर्गत और मुख्य सुरक्षा से संबंधित सभी कर्मचारियों को एैसे क्षेत्रों में भेजा जाना चाहिए। इसके बाद अन्य सभी कर्मचारियों को क्रमानुसार भेजना चाहिए।

     आंतरिक सुरक्षा के लिए कार्यरत केंद्रिय रिर्जंव सुरक्षा बल की हालत बेहद खराब है। इसमे युवा भर्ती होने के लिए तैयार नही है। राज्य कर्मचारियों को कुछ वर्षो के लिए इस बल में भेज कर उनके राज्यों में काम करना अनिवार्य करना चाहिए।आज मध्य भारत के 6 राज्य माओवाद से ग्रसित है। माओवादी क्षेत्रों में अपने लोगों की सुरक्षा स्थानीय राज्य कर्मचारी सीआरपीएफ और पुलिस के साथ मिलकर अच्छे ढ़ंग से कर सकते है। इससे लोगों में सुरक्षा की भावना प्रबल होगी और उनकी आदिवासी जनता से संवादशैली बेहतर होगी।

सीमावर्ती  क्षेत्रों के राज्य कर्मचारियों को उनके ही क्षेत्र में तैनात अर्धसैनिक बलों के साथ काम करने हेतु भेजा जाना चाहिए। जम्मु कश्मीर,पंजाब,राजस्थान,उत्तराखंड,हिमाचल प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश सहित पुर्वी भारत में यह योजना प्रभावी रुप से चलाई जा सकती है।

इसके अलावा 9 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेश समुद्री किनारों से घिरे हुए है। इन राज्यों के कर्मचारियों को समुद्री किनारों की सुरक्षा के लिए भेजना आवश्यक है। स्थानीय लोगों को उनके ही इलाको की सुरक्षा में तैनात करने से रणनीतिक बढ़त मिलेगी। इसलिए संसदीय स्थायी समिति की ओर से दिए गए प्रस्ताव को तुरंत अमली जामा पहनाना राष्ट्रहित में बेहद जरुरी है।

* टेरिटोरियल आर्मी और होमगार्ड की तर्ज पर हो तैनाती

भारतीय थल सेना में टेरिटोरियल आर्मी (प्रादेशिक सेना) पहले से ही कार्यरत है। इसके अंतर्गत सेना में जरुरत के समय 30-40 प्रादेशिक सेना की बटालियन को भर्ती किया जा सकता है। टेरिटोरियल आर्मी में शामिल लोग सामान्य रुप से देशभक्त नागरिक होते है और अपने – अपने नौकरी एवं व्यापार में रहकर घर परिवार का पालन पोषण करते है। परंतु युध्द की स्थिती में आपातकाल के समय जरुरत पड़ने पर प्रादेशिक सेना में शामिल होकर सेना की सहायता हेतु कश्मीर और पुर्वोत्तर भारत सहित किसी भी हिस्से में तैनात हो जाते है।

      इसी तरह पुलिस विभाग में भी होम गार्ड की व्यवस्था है। जिस समय पुलिस को अधिक ताकत की जरुरत पड़ती है तब पहले से ही सिलेक्टेड होमगार्ड को बुलाया जाता है। इसी तर्ज पर सरकारी कर्मचारियों को भी होमगार्ड और टेरिटोरियल आर्मी के रुप में ढ़ालने (तैयार करने) की जरुरत है। इससे आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी। समिति के रिपोर्ट के अनुसार सीमा की सुरक्षा हेतु सैन्य शक्ति का उपयोग करे परंतु इसके साथ ही आंतरिक सुरक्षा हेतु देश के अन्य स्थानो पर भी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करना बेहद जरुरी है। आंतरिक सुरक्षा को हलके में नही लिया जा सकता।

* प्रादेशिक सेना की तैनाती

सामान्य नागरिकों के सहयोग के आधार पर संकट के समय अधिक संख्या में रिजर्वं बल का निर्माण कर हर चुनौतियों से पार पाने की मुल अवधारणा प्रादेशिक सेना की है। युध्दकाल, आपातकाल, अराजकता एवं गृहयुध्द की स्थिति में स्वयंसेवक राष्ट्रभक्त नागरिकों का यह समुह जिसे हम टेरिटोरियल आर्मी कहते है, बेहद उपयोगी है। प्रादेशिक सेना की संकल्पना सीधे भारतीय सेना को नागरिकों से जोड़ती है। देश को अस्थिर करने की शत्रुओं की नापाक हरकतों का मुहतोड़ जवाब देने हेतु अधिकाधिक लोगों को प्रशिक्षित कर तैयार रखना देशहित में आवश्यक है।

*निष्कर्ष

     अंशकालिन सेवा की अवधारणा राष्ट्र ने स्विकार की है। यह देशभक्ति, सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतिक माना जाता रहा है। इसने नौसेना और वायु सेना में भी अपने पैर पसारे है।

    स्वार्थ, लालच, मोह – माया एवं व्यक्तिगतहित और भाग दौड़ भरी जिंदगी के कारण राष्ट्रहित की भावना लोगों में कम होती जा रही है। जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। एैसे समय में सुरक्षा की दृष्टि से प्रादेशिक सेना अपना महत्वपुर्ण योगदान दे सकती है

This Post Has One Comment

  1. अच्छा लगा, अनिवार्य होना चाहिए

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