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उत्तरप्रदेश के चुनाव में एक भी मुस्लिम को भाजपा प्रत्याशी न बनाना अपने आप में एक चौकाने वाली व राजनीति में एक नई लकीर को खींचनें के संकल्प वाली घटना थी और योगी के मुख्यमंत्री बनने की बिसात वहीं बिछ गई थी. वर्तमान राजनीति के दौर में जबकि मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति चरम पर है तब २०%मुस्लिम जनसँख्या वाले प्रदेश में एक भी मुस्लिम को टिकिट न देना एक प्रकार से आत्मघाती निर्णय माना गया था.वस्तुतः ऐसा करके अमित शाह ने वोट बैंककी अवधारणा को ही समाप्त कर दिया

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनानें के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य मिशन २०१९ ही है.माना जा रहा है कि समूचे उत्तरप्रदेश में योगी एक बड़े स्टार प्रचारक के रूप में छा गए हैं और वे अपने दम पर चुनावी मैदान की दिशा मोड़ने का माद्दा रखते हैं.वैसे भी पूर्व से ही योगी पूर्वांचल के प्रभावी,निर्णायक व लोकप्रिय नेता माने जाते रहें हैं.उप्र के पूर्वांचल में ६ विधानसभा क्षेत्र आते हैं व सबसे बड़ी बात प्रधानमन्त्री का निर्वाचन क्षेत्र बनारस भी पूर्वांचल में ही आता है.

सतत ५लोस चुनाव जीतनें वाले योगी २००९ का चुनाव दो लाख वोटों से व २०१४ का लोकसभा चुनाव तीन लाख मतों के अंतर से जीत चुकें हैं.लगातार पांच बार सांसद रहना,फायर ब्रांड हिन्दू नेता होना,अपनें तर्कों के माध्यम से सदा हावी रहना आदि ऐसे तर्क थे जिन्होंने भाजपा आलाकमान को योगी के पक्ष में मुख्यमंत्री की आसंदी देनें का निर्णय करवाया.योगी सदा आक्रामक रहते हुए भी एक विशिष्ट प्रकार की विनम्रता को कठोरता से अपनाए रहते हैं यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशिष्टता है.

उत्तरप्रदेश के जातीय समीकरण भी योगी के पक्ष में परिस्थितियों का निर्माण करते हैं.एक संत होनें के कारण योगी पर किसी जाति विशेष का ठप्पा नहीं है.प्रत्येक जाति,पंथ,समाज का व्यक्ति उनमें एक जातिगत छवि के स्थान पर हिन्दू संत कीई छवि को स्पष्ट देख पाता है यह बात योगी के पक्ष में निर्णय करानें में सर्वाधिक असरकारक रही.महंत गौरक्षनाथ परम्परा का गद्दीदार होना उन्हें उत्तरप्रदेश के कई क्षेत्रों में श्रद्धा का पात्र बनाता है यह बात उनके पक्ष में जानी ही थी.

कहना न होगा कि उत्तरप्रदेश का २०% मुस्लिम नागरिक योगी के मुख्यमंत्री बननें से जबरदस्त मानसिक दबाव में आ गया है. एक आम मुस्लिम नागरिक वैसे भी मंदिर मस्जिद के मुद्दे से छुटकारा पाना चाहता है किन्तु कुछ मुट्ठी भर कट्टर मुस्लिम नेता ही हैं जो मंदिर मुद्दे को वोट बैंक की राजनीति के माध्यम से गर्मायें रहतें हैं.योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अब यह कट्टरपंथी मुस्लिम राजनीतिज्ञ नेपथ्य में चले जायेंगे और मंदिर निर्माण का मार्ग भी दोनों धर्मों के लोगों के परस्पर बैठने से ही निपट जाने वाला है.

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