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सम्पूर्ण देश में अप्रैल के पहले सप्ताह में एक अलग ही मुद्दे पर गहमागहमी थी। इस गर्मागर्म बहस का मुद्दा था महामार्गों पर स्थित शराब की दुकानें। उच्चतम न्यायालय के फैसले के कारण इन दुकानों को अब ५०० मीटर के दायरे से आगे ले जाना होगा। फैसला तो स्वागतार्ह और आश्वासक है, परंतु इसे लेकर भी पक्षविपक्ष में जोरआजमाइश चल रही थीं। एक ओर पीने वालों को यह दूरी असह्य लग रही थी, वहीं दूसरी ओर महिलाएं इन दुकानों को राजमार्गों से हटवाकर गांवों में ले जाने का कस कर विरोध कर रही थीं। क्योंकि इससे गांवों का तानाबाना ही बदलने वाला है। इसलिए देशभर में महिलाओं के आक्रामक तेवर समझे जा सकते हैं।

कहा जाता है कि शैतान समाज की शांति भंग करता है। समाज के विकास में रुकावट पैदा करता है। मां-बहनों की इज्जत से खिलवाड़ करता है। दुनिया के हर बुरे कर्मों का स्रोत शैतान ही है। लेकिन शैतान जहां पहुंच नहीं सकता वहां शराब शैतान की प्रतिनिधि बन कर हाजिर हो जाती है और शैतान की अपेक्षानुसार तहसनहस करवा देती है। राजमार्गों पर शराब में धुत्त तेज वाहन चलाने से होने वाली भीषण दुर्घटनाएं और जहरीली शराब पीने से होने वाली सैकड़ों मौतें बहुत भयानक प्रभाव छोड़ती हैं। किसी परिवार का व्यक्ति हमेशा के लिए विदा होने पर उस परिवार का इतिहास-भूगोल ही बदल जाता है। यह हम अपने आसपास निरंतर देखते रहते हैं। लेकिन ये घटनाएं कब तक ध्यान में रहें? रोज कोई न कोई नया मामला उभरता है और हमारी राज्य सरकारें आंखों पर पट्टी बांध कर गहरी नींद सो जाती हैं। हर घटना के बाद उसकी चर्चा जरूर होती है; लेकिन सरकार के समक्ष शराब से मिलने वाले राजस्व की ‘मुद्रा’ जल्द ही सबकुछ शांत करा देती है, लीपापोती हो जाती है। यही क्यों ‘ड्रंक एण्ड ड्राइव’ करने वालों पर कार्रवाई करते समय पुलिस का संख्याबल भी कम पड़ जाता है। परंतु, उच्चतम न्यायालय के फैसले के कारण महामार्गों पर पांचसौ मीटर के भीतर किसी भी तरह से शराब बिक्री नहीं होगी। उच्चतम न्यायालय का यह निर्णय जड़ पर ही प्रहार था।

उच्चतम न्यायालय के आदेश से अब देशभर के लाखों होटल, परमिट रुम, बीयर बार बंद हो चुके हैं। अदालती फैसले से जिनका कारोबार प्रभावित हुआ है वे अब दूसरा ही पैंतरा ले रहे हैं। उनका दावा है कि पर्यटन व्यवसाय को बढ़ावा देने और विदेशी पर्यटकों को सेवाएं देने के लिए वे इस व्यवसाय में हैं; क्योंकि इससे देश को कीमती विदेशी मुद्रा मिलती है। लेकिन उच्चतम न्यायालय का निर्णय इसमें बाधा पैदा कर रहा है। यह तर्क तो हुआ शराब बेचने वालों का, परंतु विभिन्न राज्य सरकारें भी इससे पलायन के हथकण्डे खोज रही हैं। एक के बाद एक राज्य इसमें से बचने के मार्ग खोजते नजर आ रहे हैं और इस तरह उच्चतम न्यायालय के फैसले को लगभग निष्प्रभ ही कर रहे हैं। अब बचने का रास्ता यह निकाला जा रहा है कि महानगरों में आने वाले महामार्ग के हिस्से को ही सम्बंधित महानगरपालिकाओं को सौंप दिया जाए, ताकि उसे महामार्ग कहा नहीं जा सकेगा, वह शहर का रास्ता भर रह जाएगा। महामार्ग नहीं रहा तो शराबबंदी की बात ही कहां- न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी! कई राज्यों ने अपने राज्यों से गुजरने वाले महामार्गों का इस तरह दर्जा घटा दिया है। यह तो बड़ी चालाकी हुई। गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल, राजस्थान आदि पर्यटनबहुल राज्यों की यही स्थिति है। वहां अनेक राजमार्गों एवं शहरों से लगी सड़कों का राजमार्ग का दर्जा ही खत्म ही कर दिया गया। इसके लिए उन्हें ‘डिनोटिफाइड’ कर दिया गया। तकनीकी तौर पर बदलाव कर उस राजमार्ग को स्थानीय अथवा शहर की सड़क में परिवर्तित कर दिया गया। जब राजमार्ग ही नहीं होगा तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का बंधन भी नहीं होगा। जिस पंजाब को नशामुक्त करने का नारा लेकर कांग्रेस सत्ता में आई वहां भी इस तरह की चालाकी कर शराब के धंधे को बचा लिया गया। अब तो लगभग सभी विचारधाराओं की सरकारें इसी का अनुसरण करते दिखाई दे रही हैं।

राष्ट्रीय और राज्य मार्गों पर शराबबंदी का आदेश देकर अदालत ने कई लोगों एवं उनकी गृहस्थी को बचाने का प्रयास किया है। लेकिन तब भी यह प्रश्न बना रहता ही है कि यह शराबबंदी ५०० मीटर के दायरे तक ही सीमित क्यों? शराब उत्पादन रोकने की दृष्टि से उच्चतम न्यायालय कोई कदम क्यों नहीं उठाता? एक ओर मुंबई के डांस बार जल्द से जल्द शुरू करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में हो रहे प्रयास और दूसरी ओर ५०० मीटर की यह सीमा ये दोनों बातें न्यायपूर्ण नहीं लगतीं।

हम बिहार को पिछड़ा मानते हैं, लेकिन वहां शराबबंदी पर ही वोट मांग कर सरकार अस्तित्व में आई है। गुजरात सरकार हमेशा शराबबंदी जारी रखती है। उसका राजस्व पर कोई परिणाम होता नहीं दीखता। उल्टे, बिहार में अपराधों, दुर्घटनाओं में बड़े पैमाने पर कमी आई है और गुजरात में भी पर्यटन फलफूल रहा है। शराब से राजस्व मिलता है इस भ्रम में सरकारें युवा पीढ़ी को बरबाद कर रही हैं। चुनाव और शराब का रिश्ता हर चुनाव में सामने आता है। चुनाव में मुफ्त में मिलने वाली शराब उन्हें हमेशा के लिए अपना ग्राहक बना देती है। जिस युवा पीढ़ी को हम राष्ट्र की सम्पदा मानते हैं और भारत को दुनिया का सब से युवा देश मानते हैं उसी युवा पीढ़ी को राजनीति बिगाड़ रही है। न्यायपालिका को चुनाव और शराब का रिश्ता भी ध्वस्त कर देना चाहिए। महामार्गों पर प्रतिबंधित दुकानें गांवों में न फैले इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। राज्य सरकारों को शराब उद्योग से बहुत बड़ी राशि राजस्व के रूप में मिलती है। इसी कारण शराब के ठेकों, दुकानों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। देश में कहीं भी और यहां तक कि शहर से लेकर गांव तक जनसुविधा मिलने का टोटा होगा, लेकिन शराब के अड्डे, बार, पब जरूर बहुतायत से मिल जाएंगे। शराब की हर दुकान के सामने दिखने वाली भीड़ अपनी आर्थिक सुस्थिति का पैमाना माने या बरबादी का इस पर अपने राजनीतिक नेताओं को चिंतन करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस सभी की सीमा बांध दीं यह स्वागतार्ह है। लेकिन इस हद को पार कर कोई बे-हद नहीं होगा इसकी कोई गारंटी है?

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