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आखिरकार वह घड़ी आ ही गई, जिसका इंतजार करीब एक दशक से किया जा रहा था। इस जुलाई में भारत कर प्रणाली में सुधार के लिहाज से बहुत बड़ी छलांग लगाने जा रहा है क्योंकि अप्रत्यक्ष कर की नईॠषभ वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली लागू होने जा रही है। पूरे देश को एक जैसे बाजार में बदलने वाले और किसी भी सामान या सेवा की कीमत पूरे देश में एक जैसी करने वाले इस कर के लागू होने से तीनों को आसानी होने जा रही है- कारोबारियों को, जनता को और सरकार को भी। कारोबारियों को आसानी इसलिए होने जा रही है क्योंकि उन्हें मूल्यवर्द्धित कर (वैट), सेवा कर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क, चुंगी आदि के झंझट से निजात मिल जाएगी; उनके स्थान पर केवल जीएसटी देना होगा और स्वाभाविक है कि कागजों के भारी पुलिंदे भी नहीं रखने पड़ेंगे। जनता को वस्तुएं पहले से कुछ सस्ती मिल सकती हैं क्योंकि कारोबारियों को कई स्थान पर कर नहीं देना होगा और इस वजह से कीमतें घटेंगी। सरकार को इसलिए आसानी होगी क्योंकि किसी भी स्तर पर कर की चोरी की आशंका बहुत कम हो जाएगी, जिससे राजस्व बढ़ना लगभग तय है।

हालांकि जीएसटी पर ढेर सारी बातें हो चुकी हैं फिर भी इसके बुनियादी तथ्यों पर एक नजर डालना जरूरी है। अभी तक किसी भी वस्तु पर वैट की दर हरेक राज्य में अलग होती है। यदि कोई निर्माता किसी राज्य में उत्पादन करता है तो वहां उसे वस्तु पर उत्पाद शुल्क देना पड़ता है फिर उसका उत्पाद यदि सात राज्यों से होकर गुजरता है तो उसमें प्रवेश शुल्क आदि जुड़ जाता है और बाद में हरेक राज्य में वैट की अलग-अलग दर और सेवा कर के कारण उत्पाद की कीमत बहुत अधिक और अलग-अलग हो जाती है। आपने अगर ध्यान दिया हो तो खाने-पीने की तमाम वस्तुओं पर भी आपको अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग कीमत लिखी दिख जाएगी। इसके पीछे कर की ये विसंगतियां भी जिम्मेदार हैं।
हम इस बात पर गौर करते हैं कि जीएसटी के आने से बाजार और अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कैसे होगा और कारोबारियों के साथ आम उपभोक्ता को राहत कैसे मिलेगी?

सरल कर ढांचा
जीएसटी लागू होते ही तमाम तरह के कर खत्म हो जाएंगे और वस्तु तथा सेवा पर एक ही कर लगेगा, जिससे कर व्यवस्था खासी सरल और पारदर्शी हो जाएगी। कम से कम दस्तावेज रखने होंगे और कारोबारियों को भी राहत मिलेगी। इससे विनिर्माण को भी तेजी मिलेगी। माना यह जा रहा है कि जीएसटी लागू होने से जीडीपी की विकास दर में १ से २ फीसदी का इजाफा होगा।

कर राजस्व में इजाफा
सरकार को उम्मीद है कि कर ढांचा सरल होगा तो कर देने वालों की संख्या भी बढ़ेगी, जिससे कर राजस्व में बढ़ोतरी होगी। सरकार यूं भी बढ़ते राजकोषीय घाटे से परेशान है और क्रिसिल की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि घाटे को कम करने के लिए जीएसटी रामबाण साबित होगा। बात सही भी है क्योंकि सरकारी खर्च कम करने के ज्यादा रास्ते नहीं हैं, इसलिए कर राजस्व में वृद्धि ही खजाने की सेहत को सुधारेगी। राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने हाल ही में माना भी है कि जीएसटी से कर के दायरे में आने वालों की संख्या बढ़ जाएगी और खजाने की सेहत सुधरेगी।

वाजिब कीमत
आम आदमी के लिए भी जीएसटी राहत भरा होगा और माना जा सकता है कि इसके लागू होने के बाद वस्तुएं सस्ती हो जाएंगी। असल में फिलहाल उत्पाद शुल्क से लेकर दूसरे राज्य में सामान जाने पर लगने वाले आयात शुल्क, चुंगी, प्रवेश कर, केंद्रीय बिक्री कर और वैट आदि लगने के बाद उपभोक्ता को जो मूल्य देना होता है, वह ज्यादा होता है और उसमें पारदर्शिता भी नहीं होती। लेकिन जीएसटी आने पर सभी अप्रत्यक्ष कर खत्म हो जाएंगे और सामान की कीमत कुछ नीचे आएगी क्योंकि उसमें केवल एक ही कर वसूला जाएगा और वह भी सामान की बिक्री के समय। सस्ता होने पर सामान की खपत भी बढ़ेगी, जिसका फायदा विनिर्माण क्षेत्र को होगा।

निर्यात में वृद्धि
जीएसटी के कारण विनिर्माण क्षेत्र की लागत घटने से विदेशी बाजार में भी भारतीय उत्पाद सस्ते हो जाएंगे। इसका फायदा निर्यातकों को होगा और निर्यात बढ़ने से राजकोषीय घाटे के मोर्चे पर सरकार को खासी राहत मिलेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यह क्रांतिकारी कर प्रणाली है, लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि जीएसटी लागू करने वाले दूसरे देशों में इसका नतीजा कैसा निकला और यह कितना सफल रहा। भारत के लिहाज से उन देशों के अनुभव काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। अभी १६० से भी अधिक देशों में किसी न किसी रूप में जीएसटी लागू किया गया है। पिछले ५० वर्षों से यूरोप में इस प्रकार की कर प्रणाली लागू है। एशिया प्रशांत क्षेत्र में भी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के रूप में इसे व्यापक स्वीकृती प्राप्त है। रोचक तथ्य यह है कि दुनिया भर में इस समय जीएसटी के ४० से भी अधिक अलग-अलग मॉडल प्रचलन में हैं और प्रत्येक की अपनी-अपनी विषेशताएं हैं।

सिंगापुर और न्यूजीलैंड जैसे देशों में लगभग हरेक वस्तु पर एक ही दर से कर वसूला जाता है। दूसरी ओर इंडोनेशिया में पांच सकारात्मक दरें हैं, एक शून्य दर है और ३० से भी अधिक श्रेणियों की वस्तुओं एवं सेवाओं को जीएसटी से बाहर रखा गया है। चीन में जीएसटी केवल वस्तुओं पर तथा मरम्मत और प्रसंस्करण सेवाओं पर वसूला जाता है। ऑस्ट्रेलिया में जीएसटी संघीय कर है, जिसे केंद्र वसूलता है और राज्यों को बांट देता है। कनाडा का मॉडल जरूर कुछ जटिल है। वहां भी भारत की तरह जीएसटी केंद्र और राज्यों के बीच बंटा है। इसमें केंद्र सरकार द्वारा वसूला जाने वाला संघीय कर है और राज्यों के लिए प्रांतीय खुदरा बिक्री कर है। इसके अलावा केंद्र और राज्यों के वैट भी अलग-अलग हैं। ब्राजील में भी दोहरा जीएसटी वसूला जाता है और राजस्व को केंद्र तथा राज्यों के बीच बांट दिया जाता है।

लेकिन इन सभी देशों में जीएसटी की दर भारत की ही तरह विवाद का कारण बनी रही है और कई स्थानों पर तो अब भी इस पर मतैक्य नहीं है। कुछ देशों में जीएसटी के स्थान पर वैट लागू है, लेकिन कुल मिलाकर यह कर वहीं वसूला जाता है, जहां वस्तुओं अथवा सेवाओं का उपभोग किया जाता है। बहरहाल दरों का ढांचा सबके लिए दिक्कत का विषय है। इसमें भी केवल कनाडा और ब्राजील में ही दोहरा जीएसटी ढांचा लागू है। कनाडा में भी इसके लागू होने से पहले भारत की ही तरह तगड़ा विरोध हुआ था, लेकिन वहां की सरकार ने लागू होने के फौरन बाद इसकी दरों को दो बार घटा दिया और विरोध लगभग शांत ही हो गया। अलबत्ता कुछ देशों को जीएसटी की दर बढ़ानी भी पड़ी है। इसमें महंगाई की दिक्कत आई है क्योंकि यदि जीएसटी की दर पहले से लागू कर दर से अधिक होगी तो महंगाई हर हाल में बढ़ेगी, जैसा सिंगापुर में १९९४ में जीएसटी लागू होते समय हुआ था। इसीलिए किसी भी देश को कम से कम बेहद आवश्यक वस्तुओं को तो कम दर के दायरे में ही रखना होगा। भारत में अधिकतर खाद्य पदार्थों को ५ प्रतिशत की श्रेणी में रखा भी गया है।

इन सबके बीच मलेशिया का अनुभव भी हमें कुछ सिखाता है। मलेशिया ने जीएसटी लागू करने से पहले उसका ढांचा तैयार करने में लगभग डेढ़ वर्ष का समय लिया, जो उसकी सफलता के लिए जरूरी भी था। भारत में भी समय तो लिया गया है, लेकिन देश के आकार, कारोबारियों की संख्या और जीएसटी की जटिलता को देखते हुए यह समय अपर्याप्त भी साबित हो सकता है। मलेशिया में भी पूरे डेढ़ वर्ष मिलने के बाद भी जीएसटी पूरी सुगमता से लागू नहीं हो पाया था, इसलिए भारत में चुनौती काफी बड़ी होगी। जीएसटी नेटवर्क से जुड़े अधिकारियों ने हाल ही में बताया भी है कि अभी लगभग ४० प्रतिशत कारोबारी इस नेटवर्क पर पंजीकरण करा ही नहीं सके हैं। जाहिर है कि उनके लिए दिक्कतें हो सकती हैं।

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