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भारतीय नारी के सौन्द्रर्य की प्रशंसा में कई कवियों ने कशीदे पढ़ें हैं | बिहारी ने तो खंजन नयन, सुतवा नाक,पंखुरी से होंठ और पतली कमर को सुंदरता के मापदंड बता दिया था पर समय के साथ सौन्दर्य की परिभाषाएं बदल गई हैं आज एक आत्मविश्वासी,वाककला में निपुण,अपने कार्य को बखूबी करने वाली स्त्री सबसे सुंदर है,जब ऐसी सकारात्मक दृष्टिकोण वाली महिला से कोई मिलता है तो भीतर ही भीतर कह उठता है क्या खूब लगती हो…क्या सुंदर दिखती हो….

सही मायने में सिर्फ बाह्य सौन्द्रर्य का आकलन नहीं होता ,जिस प्रकार बहुत सुंदर वस्तु भी निरूपयोगी हो तो किसी की रुचि की नहीं रह जाती उसी तरह व्यक्ति के कुत्सित विचार उसे असुंदर बना देते हैं ,अंतर्मन में स्थापित दया,करूणा,प्रेम व्यक्ति की सुंदरता द्विगुणित कर देता है | मराठी कवि बा.भ.बोरकर कहते हैं

देखणे ते चेहरे जे प्राजंला चे आरसे,

गोरटे की सावळे,मोल नाही फार से,

ईमानदारी और मानवतावादी विचारों की सादगी से दीप्त चेहरे ही अतिसुंदर हैं |

वैसे तो ईश्वर की बनाई हर वस्तु सुंदर है पर मानव सबसे सुंदरतम है, सत्य,संघर्ष और सद् भावना मनुष्य की सच्ची सुंदरता है |

स्त्री की तुलना पृथ्वी,सृष्टि और नदी से यूं ही नहीं की जाती ,एक स्त्री सचमुच विशाल ह्रदय वाली होती है,उसमें गंभीर गहराई और आकाश सा विस्तार होता है |

सौन्दर्य देखने वालों की निगाह में भी होता है, मन की आँखों से देखो तो सब सुंदर है |

सुंदरता सुरूचिपूर्ण वस्त्रों से और बढ़ जाती है, अपने ऊपर जो जँचे वही वस्त्र पहनने चाहिए, सौन्द्रर्य के इन विभिन्न रूपों को अनुभव करना आवश्यक है | कवयित्री डॉ शरद सिंह कहती हैं

स्त्री तुम उष्मा हो

उर्जा हो

पृथ्वी हो

सृष्टि हो

स्त्री तुम सचमुच सुंदर हो

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