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“जो शास्त्र सम्मत है वही टिकाऊ है। गैलीलियो के सिद्धांत शास्त्र सम्मत थे, इसीलिए टिके। उनके विरोधी नहीं बचे। संघ विरोधियों की समझ में नहीं आया इसलिए हीन भावना पालने की कोई आवयकता नहीं है। …जिन सिद्धांतों पर संघ आजतक चला, बढ़ा; वह शास्त्रीय स्वरूप संघ कार्यकर्ताओं व शुभचिंतकों की समझ में आ जाए तो उसका अधिक परिणामकारक उपयोग हो सकता है।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को नब्बे वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। परंतु, विगत ९० वर्षों से केवल राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले ही नहंीं बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले संघ जैसे संगठन का भारत के वैचारिक क्षेत्र में तटस्थ रूप से आकलन नहीं हुआ। जो हुआ भी है, वह पूर्वग्रह से ग्रसित है। स्वातंत्र्योत्तर काल में केवल संघ ही ऐसा संगठन है जो राजनीतिक, वैचारिक विरोध के बावजूद लगातार बढ़ता जा रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कांग्रेसी, समाजवादी, साम्यवादी इ. जैसे स्वयंभू प्रगतिवादी संगठन थे। आज उनका प्रभाव कम हो गया है। डार्विन के सिद्धांत के अनुसार जो वस्तुएं समयानुरूप होती है वे बढ़ती जाती हैं एवं जो समयानुरूप नहीं होतीं उनका लोप होता जाता है। वास्तव में देखा जाए तो इस सिद्धांत के अनुसार प्रगतिशील समझे जाने वाले आंदोलनों का प्रभाव क्यों घटता गया एवं ‘प्रतिगामी’ समझे जाने वाले संघ का प्रभाव क्यों बढ़ता गया, जैसा प्रश्न देश के बुद्धिजीवियों के जेहन में उठना चाहिए था। परंतु अपना वैचारिक दिवालियापन छिपाने के लिए, वे लोग निर्लज्जता से ‘संघ का बौद्धिक विकास हुआ है क्या?’ जैसा प्रश्न पूछने लगे। ऐसे प्रश्नों से हीनभावना पालने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि आगे यदि भारत का बौद्धिक विकास करना है तो उसके लिए नई बौद्धिक चिकित्सा की रूपरेखा की आवश्यकता है। यह काम प्रसार माध्यमों में काम करने वाले वर्तमान विचारवान एवं बुद्धिजीवियों के बस का नहीं है। यह ध्यान में रखते हुए नया मार्ग निर्मित करने की आवश्यकता निश्चित ही है।

आधुनिक वैचारिक क्षेत्र
आज के वैचारिक क्षेत्र में तीन प्रमुख धाराओं पर चर्चा की जाती है- वाम, दक्षिण एवं सनातनी। जिन्हें धार्मिक जीवनमूल्य आधुनिकता के विपरीत और मानव स्वतंत्रता को दबाने वाले लगते हैं तथा साथ ही साथ जो संपत्ति निर्माण की अपेक्षा आर्थिक व सामाजिक समानता को अधिक महत्व देते हैं, वे वामपंथी (बांये) विचारधारा के कहलाए गए। जो बुद्धिजीवी विषमता को अपरिहार्य मान कर अधिक संपत्ति निर्माण को महत्व देते हैं उन्हें दक्षिणपंथी (दायें) विचारधारा का माना गया। जो पारंपारिक जीवनमूल्यों को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें सनातनी कहा गया। आज के इस वैचारिक युद्ध में पर्यावरणवादी, वैश्विकीकरणवादी व उनके विरोधी, नास्तिक-आस्तिकवादी जैसे अनेक लोग प्रवेश कर गए हैं। इस वैचारिक युद्ध में शत्रु कौन एवं मित्र कौन, यह समझना मुश्किल है। मुस्लिम समाज में अनेक पंथ, उपपंथ हैं एवं उसमें सच्चा मुसलमान कौन है, इसके लिए आपस में युद्ध छिड़ा रहता है परंतु जब गैर मुस्लिमों से ल़ड़ने का वक्त आता है तब वे सभी गुट आपस में एक हो जाते हैं। ठीक उसी तरह इन बायें, दायें एवं अन्य विचारधारा के लोगों में आपस में प्रचंड वैचारिक युद्ध छिड़ा रहता है परंतु ‘सनातनी’ समझे जाने वाले संघ के विरूद्ध लड़ाई में वे एकजुट हो जाते हैं क्योंकि संघ उन्हें आधुनिक विश्व का संकट नजर आता है।

ऐसा माना जाता है कि सत्रहवीं सदी में ‘रेन देकार्त’ ने आधुनिक विश्व को वैचारिक दिशा देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। ‘मेरी विचारशक्ति ही मेरे अस्तित्व का कारण है’ तथा ‘सब शंकाओं से मुक्त हुए बिना सत्य का अस्तित्व सिद्ध नहीं होता’, इन दो पंक्तियों ने पूरी तरह से विचारों की दिशा ही बदल दी। आत्मा के अस्तित्व की बजाय बौद्धिक विचार एवं श्रद्धा की अपेक्षा चिकित्सा को अधिक महत्व प्राप्त हुआ। अनुभूतिजन्य ज्ञान यह सच्चा ज्ञान न होकर प्रयोगसिद्ध, प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित ज्ञान ही सच्चा, जैसे आधुनिक विचार की नींव निर्मित हुई। भावनात्मक व संवेदनशील आकलन निराधार व काल्पनिक माना जाने लगा। इसका प्रभाव केवल वैज्ञानिक क्षेत्र तक सीमित न रहते हुए कला, साहित्य से लेकर राजनीति, समाज जैसे आयामों तक फैल गया। इससे एक नई जीवनदृष्टि तैयार होने लगी जिसे ‘भौतिकवाद’ कहा गया। अर्थात् भौतिक जगत को केन्द्र में रख कर किया हुआ विचार। यहां पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक जैसी पारलौकिक श्रद्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। इस वैचारिक दृष्टिकोण से आधुनिक जीवन पद्धति का निर्माण हुआ। इसी से विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का निर्माण हुआ। उन्होंने पारंपरिक धर्मानुकूल जीवन मूल्यों एवं राजभक्ति को चलन से बाहर कर दिया। राजभक्ति की अपेक्षा राष्ट्रभक्ति को अधिक महत्व प्राप्त हुआ। अब वैश्वीकरण के कारण राष्ट्रभक्ति से भी आगे जाकर नए वैश्विक मूल्यों की खोज की जा रही है। इस नए वैचारिक नक्शे पर संघ को कहां रखें? यह आकलन न होने के कारण संघ के संबंध में वैचारिक खालीपन आया है। टालते भी नहीं बनता, समझ में भी नहीं आता और इसलिए टीका-टिप्पणी भी नहीं करते बनती। मीडिया में काम करने वाले बुद्धिजीवियों का यह संकट हमें समझना चाहिए।

संघ स्थापना
संघ-जीवन की दूरदृष्टि एवं उसकी व्याप्ति को समझने के लिए संघ स्थापना की पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है। अंग्रेजों का राज्य स्थिर होने पर उसके पीछे की आधुनिक संस्कृति, विचार एवं उससे उत्पन्न जीवन-मूल्यों की पहचान होने लगी। १८५७ सरीखी स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ कर हमें स्वतंत्रता मिल जाएगी जैसे भोले विचारों से बाहर आकर समाज के नेताओं में धारणा बनने लगी कि इस नई संस्कृति, उनके मूल्य एवं नए-नए जीवन-मूल्यों को स्वीकार किए बिना कोई चारा नहीं। धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद; वैचारिक स्तर पर न्या. रानडे, राजनीतिक स्तर पर लोकमान्य तिलक, गोखले; सामाजिक स्तर पर म. फुले, शाहू छत्रपति; इस तरह अनेक स्तरों पर विचारमंथन जारी था। इस परिवर्तन की आवश्यकता के साथ ही साथ हजारों वर्षों से जिस सांस्कृतिक आधार पर यह समाज आस्तित्व में है उस संस्कृति का सामर्थ्य एवं दोषों की चर्चा भी हो रही थी। पुराने में से क्या रखना, क्या छोड़ना, नए में से क्या ग्रहण करना क्या टाल देना, जो पुराना है उसे किस प्रकार हटाना और जो नया है उसे किस प्रकार समाहित करना, जैसे मुद्दों पर गहन मंथन चल रहा था। यूरोपियन विचार मंथन का प्रभाव इस विचार मंथन पर भी था। इसी प्रकार इस राष्ट्रीय आंदोलन और विचारप्रवाह का मुस्लिम आंदोलन से तालमेल बनाए रखने का प्रश्न भी गंभीर था। मुस्लिम समाज की भावना थी कि अंग्रेजों ने उनसे देश छीना था। मुस्लिम बादशाहों ने देश पर शासन किया था। इसकी यादें उस समाज के मन में ताजा थीं। लोकतांत्रिक मूल्यों को स्वीकार करने पर मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से कम रहेगी, जिससे हिन्दुओं का राजनीतिक महत्व बढ़ना निश्चित था। नए भारत में वे शासक बनने वाले थे। इसके कारण मुस्लिम समाज में बहुत उद्विग्नता थी। हिंदू समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया एवं मुसलमान समाज की बेचैनी से उत्पन्न हिंसक व धार्मिक प्रतिक्रिया की पार्श्वभूमि में संघ की स्थापना हुई।

रेने देकार्त ने जिन बातों के आधार पर आधुनिक विचार जगत की नींव रखी उन सूत्रों का उसे आत्म साक्षात्कार हुआ ऐसा उसने लिख रखा है। विज्ञान आत्म साक्षात्कार से प्राप्त सिद्धांतों को मान्यता नहीं देता फिर भी अनेक वैज्ञानिक सूत्र वैज्ञानिकों को आत्म साक्षात्कार के द्वारा ही पता चले एवं बाद में उन्हें प्रयोग द्वारा सिद्ध किया गया। संघ निर्माण डॉ. हेडगेवार द्वारा अनुभूत आधुनिक राष्ट्रनिर्माण का ऐसा ही एक अत्म साक्षात्कार था। अनुभव के माध्यम से उसे समझने की प्रक्रिया अनवरत जारी है। आधुनिक राष्ट्र के चैतन्य तत्व को समझने के लिए बाहरी जगत से जोड़ कर रखने वाला तत्व होता है एवं स्वतंत्रता की आकांक्षा रखने वाला चैतन्य तत्व होता है। प्रत्येक व्यक्ति में यह संघर्ष शुरू से ही रहता है। पर जिस व्यक्ति में यह क्षमता होती है कि वह स्वयं में शुरू इस संघर्ष को समाजव्यापी कर सकें वह महापुरुष कहलाता है। प्रत्येक राष्ट्र में समाज की स्वातंत्र्यकांक्षा जागृत करने वाले राष्ट्रपुरुषों की जो परंपरा निर्मित होती है, उसी में से राष्ट्र के चैतन्य तत्व का निर्माण होता है और समाज की समूहशक्ति बलवती होती है। डॉ. हेडगेवार ने संघ की कार्य प्रणाली से सामूहिक चैतन्य तत्व जागृत कर उसके आधार पर परिवर्तन करने का प्रयत्न किया। यह प्रयत्न किसी एक विशिष्ट क्षेत्र से संबंधित नहीं था, वरन् सर्वव्यापी था। वह अध्यात्मिक नहीं था वरन भौतिकवादी था। वह मोक्षवादी, व्यक्तिनिष्ठ नहीं था वरन् समूह भावना का निर्माण करने वाला था। उसकी कार्य-प्रणाली पारंपरिक न होकर आधुनिक थी। अंग्रेजों से उसको स्वीकार करने में उन्होंने कोई संकोच नहीं किया। वैचारिक चर्चाओं की अपेक्षा अनुभवजनित प्रेरणा व कार्यकुशलता पर उनका जोर था। संघ ने इसका एक अलग शास्त्र तैयार कर विगत ९० वर्षों में समाज में उसे आरोपित किया। उसकी एक परंपरा व प्रभाव का निर्माण किया। वह शास्त्र एक वस्तुस्थिति के रूप में समाज के सामने है। इतिहास की कसौटी पर जो शास्त्र सम्मत है वही टिकाऊ है। गैलीलियो के सिद्धांत शास्त्र सम्मत थे, इसीलिए टिके। उनके विरोधी नहीं बचे। संघ विरोधियों की समझ में नहीं आया इसलिए हीन भावना पालने की कोई आवयकता नहीं है। अंधों को प्रकाश नहीं दीखता, यह आंखों का दोष न होकर अंधे की शारीरिक अक्षमता होती है। परंतु जिन सिद्धांतों पर संघ आजतक चला, बढ़ा; वह शास्त्रीय स्वरूप संघ कार्यकर्ताओं व शुभचिंतकों की समझ में आ जाए तो उसका अधिक परिणामकारक उपयोग हो सकता है। इसलिए समझ महत्वपूर्ण है, जैसे कि सूर्य प्रकाश हमें उपलब्ध है, उसका नैसर्गिक उपयोग होता ही रहता है परंतु शास्त्रीय जानकारी से उसका अधिक अच्छा उपयोग किया जा सकता है।

नई राह की आवश्यकता
जिस प्रकार आत्म साक्षात्कार के माध्यम से प्राप्त खोजों को भी प्रयोगशाला में सिद्ध होने के बाद ही मान्यता मिलती है, उसी प्रकार आत्म साक्षात्कार से निर्माण व प्रत्यक्ष अनुभव की कसौटी पर सिद्ध प्रयोग को भी सामाजिक स्तर पर मान्यता दिलवानी हो तो उस प्रयोग की समीक्षा करना भी आवश्यक है। हेगले ने हिंदुओं की ब्रह्मकल्पना को कल्पनानिष्ठ, संदिग्ध एवं व्यक्तिनिष्ठ कहा है फिर भी उस तक पहुंचने के लिए महर्षि पतंजलि ने सूत्र तैयार किए एवं वे आज सर्वमान्य हैं। राष्ट्रवाद के संदर्भ में संघ का विचार करने से पूर्व ऐतिहासिक एवं वैचारिक विकासक्रम में हेगले पर हुए अन्याय पर विचार करने की आवश्यकता है। हेगले ने चैतन्यतत्व के आधार पर मानव-मुक्ति एवं उससे निर्मित हुई ‘सामूहिक राष्ट्रीय आकांक्षा’ के जो विचार रखे, उसे मार्क्सवाद ने बेध दिया। मार्क्स ने पूंजीवाद में शोषित मजदूर वर्ग की शोषण मुक्ति का सिद्धांत रखते समय हेगले के द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का आधार लिया परंतु उसका मूल्यांकन बिलकुल हेगले के विरुद्ध किया। मार्क्स का मूल्यांकन था कि व्यक्ति का स्वयं का कोई मन नहीं होता है बल्कि वह जिस वर्ग में होता है उस वर्गीय भावना का एक भाग मात्र होता है। इस मूल्यांकन के प्रवाह में उसने चालबाजी से राष्ट्रवाद को ‘शोषक वर्ग का हथियार’ और ‘अधिनायकवाद स्थापित करने का मार्ग’ घोषित कर दिया। राष्ट्रवाद आक्रामक होता है और उसके कारण युद्ध होते हैं, ऐसी उसकी धारणा थी। जर्मनी में नाजी एवं इटली के फासीज्म जैसे अधिनायकवादी एवं विकृत राष्ट्रवाद के कारण लोगों को इस धारणा पर विश्वास होने लगा। उसी समय शुरू हुए द्वितीय महायुद्ध के कारण मार्क्स की भविष्यवाणियों को शास्त्रीय सिद्धांत का रूप प्राप्त हुआ। इसी कारण हेगले के स्वातंत्र्यकांक्षी राष्ट्रचेतना के निर्माण पर पूरा विचारमंथन नहीं हुआ। यूरोपियन बौद्धिक युग में जिस प्रकार धार्मिकता को तुच्छ ढंग से देखा गया उसी भावना से राष्ट्रवाद को देखा गया। आधुनिक युग में नवनिर्माण में राष्ट्रीय प्रेरणा के योगदान का गहराई से वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं हुआ। दूसरे महायुद्ध के बाद के शुरुआती वर्षों पर कम्यूनिजम व बाद के समय पर वैश्वीकरण का प्रभाव पड़ने से सभी चर्चाएं उसी के अनुरूप होती रहीं। अब पुनः वैश्वीकरण की प्रतिक्रिया में राष्ट्रवाद की चर्चा हो रही है। परंतु आधुनिक मानस, राष्ट्रीय परंपरा व इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के संदर्भ में राष्ट्रीय चैतन्य का नया आविष्कार कैसा होगा? इस पर आवश्यक गंभीरता से विचारमंथन भी अभी प्रारंभ नहीं हुआ है।

संघ की ओर ‘राष्ट्रप्रेरणा का निर्मितिक्षम आविष्कार’ इस दृष्टि से देखने की अपेक्षा मुस्लिम विरोध पर खड़ी, इक्कीसवीं सदी को ध्यान में न रखने वाली राजसी शक्ति के रूप में देखने की आदत प्रचार माध्यमों द्वारा डाली गई है। राष्ट्रीय स्वतंत्रता की इच्छा सर्वव्यापी होने के बावजूद उसका प्रगटीकरण तात्कालिक कारणों से होता है। जिस समय संघ स्थापना हुई उस समय मुसलमानों के प्रश्नों ने उग्र रूप धारण कर लिया था। इन प्रश्नों की छाया में ही पिछले १०० सालों से देश की राजनीति संचालित हो रही है। इन्हीं प्रश्नों के कारण देश का विभाजन भी हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी यह प्रश्न अनुत्तरित रहा है। ‘निर्भयता’ स्वतंत्रता की आकांक्षा का मूलमंत्र है। मुस्लिम प्रश्नों का व उसके जुड़ाव में सेमेटिक, धार्मिक अल्पसंख्यकों का सतत डर की छाया में विचार करना या निर्भयता से विचार करना, एक प्रमुख मुद्दा है। संघ, भाजपा, हिंदुत्ववादियों पर बिना किसी डर से टीका करने वाले एक सम्पादक को मदर टेरेसा पर लिखे गए एक संपादकीय को वापस लेकर माफी मांगनी पड़ी थी। मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करने की बात पर दंगों के डर से एक सेक्युलर समाचारपत्र को माफी मांगनी पड़ी थी। इस मानसिक गुलामी की पृष्ठिभूमि में यदि कोई स्वाभिमान की भाषा बोलता है तो वह द्वेष फैलाने वाला और सांप्रदायिक कहलाता है। श्री रामजन्मभूमि पर हिंदू समाज की अनेक मांगें न्यायसंगत हैं परंतु सांप्रदायिक कह कर उनको इन्कार कर दिया जाता है। संघ की प्रेरणा से अनेक विद्यालय, दवाखाने, बैंक और अन्य सेवाकार्य चल रहे हैं। अनेक ईसाइयों एवं मुस्लिमों ने भी इसका लाभ लिया है। संघ की प्रेरणा यदि मुस्लिम द्वेष की होती तो यह कैसे संभव होता? संघ ने अपने कार्य से सर्वव्यापी राष्ट्रभावना के अनेक पहलू प्रगट किए हैं। संघ की विचारधारा रही है कि हम काम करते जाएं, लोगों को वह अपने आप समझ में आएगा। वह लोगों को समझ में आया और उसका भरपूर प्रतिसाद भी लोगों से मिल रहा है। परंतु बुद्धिजीवियों को वह समझ में नहीं आ रहा है। क्योंकि अपने देश की सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियां जानने की अपेक्षा वे पश्चिम की ओर आंख गड़ाए हैं। पश्चिमी देशों की नवनिर्माण की क्षमता समाप्त हो गई है और इसलिए वे हिन्दू तत्वज्ञान का नए दृष्टिकोण से विचार कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि अनेक प्रश्नों के समान यह शिवधनुष उठाने की तैयारी भी संघ को ही करनी होगी। अपना समर्थन करने के लिए नही, क्योंकि जो स्पष्टीकरण मांग रहे हैं उन्हें वह देने की आवश्यकता भी नहीं और अब संघ को उसकी आवश्यकता भी नहीं। परंतु राष्ट्रप्रेरणा के आधार पर निर्मित होने वाले और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए पोषक, अनुभवसिद्ध नए सांस्कृतिक विचारों की विश्व को आवश्यकता है।

अंतिम पर महत्वपूर्ण- संघ पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया जाता था। सन १९८३ में पुणे में ‘सामाजिक समरसता मंच’ की स्थापना हुई। उसके बाद मंच ने एक के बाद एक कार्यक्रम आयोजित करना प्रारंभ किया। यह देख कर वहां के एक वामपंथी कार्यकर्ता ने कहा, ‘यदि हम संघ को नहीं छेड़ते तो ही अच्छा था। एक बार संघ का रोड रोलर चलने लगा तो हम कहीं के भी नहीं रहेंगे।’ इस पर और अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।

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