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महाराष्ट्र की पावन भूमि को अपनी चरण-धूलि से पवित्र करने वाले श्री स्वामी समर्थ महाराज की कृपा मराठी और गैरमराठी भक्तों पर समान रूप से बरसती रही है। परंतु देश भर में फैले उनके लाखों भक्तों के उनका जीवन-चरित्र पढ़ने और समझने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कारण है, स्वामी जी की एकमात्र प्रामाणिक जीवनी का केवल मराठी भाषा में उपलब्ध होना। मराठी में लिखे जीवन-वृत्त के लेखक थे स्वामी जी का सानिध्य प्राप्त शिष्य ‘गोपालबुवा केलकर’, जिन्होंने स्वयं की देखी, सेवाधारियों द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवजनित लीलाएं ‘मोड़ी लिपि’ में लिखी थीं। वह हस्तलिखित प्रति चिपलूण मठ में अभी भी उपलब्ध है। ज्ञात हो कि १९५० तक महाराष्ट्र में मोड़ी लिपि में ही लिखा जाता था। इस लिपि के जनक हेमाडपंत यथा हेमाद्री पंडित थे जिन्होंने महादेव यादव और रामदेव यादव के शासन काल (१२६०-१३०९) में इसे विकसित किया। चूंकि इस लिपि का मुद्रण देवनागरी की अपेक्षा काफी कठिन था इसलिए १९५० में आधिकारिक रूप से इसका प्रयोग बंद कर दिया गया।

पुस्तक के हिंदी अनुवाद की भी एक कहानी है। इस पुस्तक के अनुवादक ‘सुधांशु परशुराम’ से कोलकाता के भक्तों ने एक हिंदी में लिखित जीवनी की मांग की ताकि वे उनके जीवन चरित्र को अच्छी तरह से समझ सकें। जब सुधांशु जी को पता चला कि हिंदी में अनूदित ऐसी पुस्तक है ही नहीं तो उन्होंने स्वयं इस गुरुतर कार्य का बीड़ा उठाया और उनकी लगभग ८ महीने की तपस्या का फल है- ‘बखर’, जो कि मूल पुस्तक का शब्दश: भावनुवाद है।

इसकी एक और बड़ी खासियत है, और वह है इसकी पुरातन शैली। आधुनिक विद्वान इस पर आपत्ति उठा सकते हैं कि २१वीं सदी में यह कथा आधुनिक शैली और परिष्कृत ढंग से लिखी जानी चाहिए थी पर अनुवादक और सम्पादक का पूरा जोर इसी बात पर रहा कि मूल पुस्तक की शैली में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। ‘बखर’ की सुंदरता को किसी प्रकार की भी आंच नहीं आनी चाहिए। कहानियों का क्रम भी वही है।

अनमोल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और रामचंद्र चिंतामण ढेरे द्वारा संपादित इस पुस्तक में महाराज जी द्वारा बोले गए शब्द भी ज्यों के त्यों ही रखे गए हैं। कुछ लोगों को यह भाषा गंवार लग सकती है लेकिन अनुवादक और सम्पादक के अनुसार, वे सभी शब्द महाराज जी के हैं। इसलिए उनमें बदलाव का अधिकाार हमें नहीं है। उन्होंने वे शब्द कब और क्यों कहे, यह तो वे ही कह सकते हैं। हम सब भक्तगण उनके जीवन-चरित्र से कुछ समझ सकें और अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर पाएं ताकि हम सब का मानव जीवन सार्थक हो सके।

सुधांशु जी के अनुवाद को पढ़ कर ऐसा लगता है मानो सभी घटनाएं आखों के सामने चलचित्रवत गुजर रही हैं। किसी भी लेखक अथवा अनुवादक के लिए स्थिति तब विकट हो जाती है जब किसी महान संत के जीवन-चरित्र से जुड़ी हुई बातों को पिरोना हो। इसलिए किसी भी भाषा से भााषांतर करते समय इस बात पर विशेष ध्यान देना होता है कि मूल भाषा से छेड़छाड़ न करते हुए यथावत भक्ति भावनाओं के साथ, उसी स्वरूप में अनुवादित कर दिया जाए। भाषांतर का कार्य निश्चित ही कठिन रहा होगा पर पर उनकी भाषा सरल, मधुर और गहराई लिए हुए है। साथ ही हिंदी व्याकरण का विशेष ध्यान रखा गया है। इस पवित्र पुस्तक में लिखी गई अक्कलकोट के संत श्री स्वामी समर्थ महाराज के प्रत्येक क्षण की सम्पूर्ण जीवन गाथा भक्तों के तन, मन और मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ेगी।

This Post Has One Comment

  1. इतना प्रभावशाली लेख स्वामी जी के बारे में जानने की तीव्र लालसा बढ़ गई.. ,🙏🙏 आगे उनके द्वारा कही बातों को भी पाठकोँ तक अवश्य पहुचाइए। आपको बहुत बहुत धन्यवाद

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