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पूर्वोत्तर भारत के सात राज्य सप्तभगिनी कहलाते हैं। ये राज्य प्राकृतिक आभा से मनोरम तो हैं ही, अपनी लोक संस्कृति के लिए भी विख्यात हैं। खानपान से लेकर पहनावा तक भिन्नता के कारण पर्यटक बेहद आकर्षित होते हैं

उत्तर पूर्व के राज्य भारत का अविभाज्य हिस्सा है। यहां के सात राज्य भारत भर में सप्तभगिनी के नाम से मशहूर हैं। सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया में इन्हें इसी नाम से जाना जाता है। एकता उनके संबोधन में ही है। जिस प्रकार सगी सात बहनें प्रेम और अपनेपन से रहती हैं वैसे ही ये सात राज्य भी एकत्रित हैं। ये सारे राज्य भले ही समानता लिए हुए हों, पर जब इनके पास जाने का मौका मिलता है; तब ध्यान में आता है कि यहां का हरेक राज्य अपनी खासियत लिए हुए हैं चाहे रहन-सहन की बात हो या खाने-पीने की। हर राज्य की अपनी विशेषता है, हर राज्य पर्यटकों को अपनी ओर अपनी खास शैली से आकर्षित करना है। ये सात राज्य कुल मिला कर २,६५,००० वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। इनका रहन-सहन प्रमुख रूप से ब्रह्मपुत्र और बराक इन दो नदियों पर अवलंबित है। यहां की पर्वत शृंखलाएं, घने-अनछुए जंगल, विशिष्ट प्रदेश के प्राणी, वनस्पती पृथकता लिए हुए हैं। सब से महत्वपूर्ण है यहां की अविरत बारिश। इन सबके कारण इन राज्यों की सुंदरता बढ़ गई है। यहां की सुंदरता किसी को भी अपनी ओर खींच सकती है। इस प्रदेश में हम कुछ अलग ही, आकर्षण महसूस करते हैं।

पूर्व के हिस्से में असम राज्य है। असम के आसपास सारे राज्य गोलाकार रूप में खड़े हैं। हर राज्य की अपनी विविधता है। झरने, तालाब, जलप्रयानों के कारण सारे राज्य सुजलाम् सुफलाम् हैं। इनके कारण प्रकृति की सुंदरता में चार चांद लग गए हैं। असम की पूर्व की सीमा से, ब्रह्मपुत्र के दक्षिण के अरुणाचल प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है। असम राज्य के दीमापुर मार्ग से कोहिमा में यानी नगालैंड राज्य में प्रवेश किया जाता है। असम के सुंदर शहर तेजपुर मार्ग से अरुणाचल प्रदेश में जाया जाता है। पहले इन सारे राज्यों मे जाने के लिए सरकार का परमिट लगता था। पिछले दो सालों से सिर्फ अरुणाचल प्रदेश में जाने के लिए इनरलाइन परमिट लगना है। अरुण यानी सूर्य- भारत में सूर्य की पहली किरणें जिस राज्य पर पड़ती है उस राज्य को अरुणाचल प्रदेश कहते हैं। असम से केवल ८० कि.मी. पर मेघालय राज्य है। मानो ये सात राज्यों की पर्वत शृंखला बनी है। पानी से लबालब मेघों ने गारो, खासी और जैंटिया इन पर्वतों को घेर लिया है। उत्तर पूर्व के पांच राज्य असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नगालैंड ये पर्यटकों के लिए खास आकर्षण के केंद्र हैं। आजकल की इक्कीसवीं सदी का पर्यटक पुराने पर्यटकों से ज्यादा चयनशील है। वह हमेशा नई खोज की तलाश में रहता है। ऐसे पर्यटकों के लिए उत्तर पूर्व के राज्य सुयोग्य स्थल हैं।

असम इन सारे राज्यों में अग्रणी है। ब्रह्मपुत्र नदी असम की शान है। असम की राजधानी गुवाहाटी है। पर्यटकों को सब से पहले हवाई जहाज या रेल्वे से गुवाहाटी तक आना पड़ता है। वहां से पर्यटकों के मार्ग अलग हो जाते हैं। धार्मिक पर्यटन के लिए गुवाहाटी शहर का बालाजी मंदिर है। यह मंदिर संगमरमर से निर्मित है, बहुत ही सुंदर; ठीक वैसे ही जैसे तिरुपती बालाजी का मंदिर है। विशाल गोपुर (प्रवेश द्वार), विस्तीर्ण मंदिर परिसर पर्यटकों को आकर्षित करता है। वसिष्ठ ऋषि का आश्रम भी प्रसिद्ध है। शांतिमय वातावरण है। संध्या, कान्ता और ललिता इन तीनों नदियों के बहाव इस आश्रम से बहते हैं। यहां पर वसिष्ठ ऋषि तपस्या किया करते थे। इस आश्रम में काले पत्थर की मूर्ति बनी हैं, उसके हाथ में कमंडलु है। गुवाहाटी का नवग्रह मंदिर, जो चित्रांचल पहाड़ी पर बना है, बहुत विख्यात है। इस मंदिर का निर्माण असम शैली में हुआ है। नौ ग्रहों की मूर्तियां शिवलिंग स्वरूप में बनाई गई हैं। व्यक्ति को जिस ग्रह से पीड़ा होगी, जो ग्रहदशा होगी, उससे मुक्ति प्राप्त करने के लिए उस ग्रह की यहां पंडित से पूजा करवाई जाती है। ब्रह्मपुत्र नदी के बीचोबीच बना उमानंद महादेव मंदिर प्रसिद्ध है। नदी के बीच बने द्वीप का आकार मोर जैसा है, इस कारण उसे पिकॉक आयलंड भी कहा जाता है। पार्वती माता को आनंद मिले, इस हेतु भगवान शंकर इस टापू पर आकर रहे थे; इसलिए टापू का नाम उमानंद महादेव द्वीप है। भारत भर में देवी माता के ५२ शक्तिपीठ हैं। उनमें से प्रमुख कामाख्या देवी पीठ है, जो गुवाहाटी शहर में नीलांचल पहाड़ी पर बसा है। किंवदंति है कि ‘का-मे खा’ यानी जन्मदात्री मातारूपी देवी। प्राचीन काल में इस देवी की पूजा विघ्नहत्री मान कर की जाती थी। कामाख्या यानी मनोकामना पूरी करने वाली देवी भी उसे माना जाता है। मोक्षदायीनी देवी के रूप में इसका वर्णन किया जाता है। गुवाहाटी शहर धार्मिक, भाविक श्रद्धालुओं के लिए विविध मंदिरों का शहर है। इस प्रकार पूर्वांचल राज्यों का प्रवेश द्वार यानी गुवाहाटी।

असम में पर्यटन के लिए जाना हो तो ठंड के मौसम में जाना चाहिए। अक्तूबर से मार्च तक जा सकते हैं। विविध अभयारण्य, घने जंगल शौकीन पर्यटकों के आकर्षण केंद्र हैं। चक्रशीला वन्यजीव अभयारण्य गोल्हन लंगूर के रहने का स्थान है। ब्रह्मपुत्र के उत्तर किनारे पर यह अभयारण्य बसा है। प्राकृतिक सुंदरता और दुर्लभ प्राणियों के लिए यह अभयारण्य विख्यात है। यह क्षेत्र केवल शेरों के लिए ही सुरक्षित रखा गया है। वीनोदी वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना १९८० साल में कुछ दुर्लभ वन्य जीवों का संवर्धन करने हेतु हुई। काझीरंगा अभयारण्य संपूर्ण विश्व में एक सींग वाले गेंडे के लिए विखयात है ही।

इस अभयारण्य में एलिफंट ग्रास मीलों तक फैली है। हाथी पर बैठ कर सफारी करते समय एक सींग वाला गेंडा दिखाई पड़ता है। काझीरंगा अभयारण्य का परिसर बोकाखाट गांव से शुरू होता है। हम घने जंगल में प्रवेश करते हैं, सड़क के दोनों ओर फैले चाय के बागान देख कर हम आनंद विभोर हो उठते हैं। मुन्नार के चाय बगान पहाड़ियों पर और काझीरंगा के चाय-बगान मैदानों पर? यह कुदरती करिश्मा नहीं तो और क्या है? पर्यटकों को लुभाने वाली ब्रह्मपुत्र के आयलंड का माजुली द्वीप दुनिया की सब से बड़ी नदी के प्रवाह क्षेत्र का द्वीप है।

डिब्रुगड़ के पास हिम शिखरों की तलहटी में बसा रुक्मीणी आयलंड प्रकृति प्रेमियों को पुकारता है। अब हम उत्तर पूर्व के असम राज्य से मेघालय की ओर जाएंगे। मेघों का आलय (घर) याने मेघालय। मेघालय राज्य में हम प्रवेश करते हैं, टेढ़े-मेढ़े रास्तों से शिलांग पहुंचते हैं। ईश्वर ने इतनी सुंदरता शिलांग को प्रदान की है कि किसी रमणी का सौंदर्य भी इसके समाने फीका पड़ सकता है। गारो, खासी और जेंटिया जैसी पहाडियां यानी संपूर्ण मेघालय। इन पर्वतशृंखला पर दौड़ने वाले बादल कभी अपने सामने जमीन पर उतरते हैं या कभी गहरी घाटी में दिखाई देते हैं। पूरा वातावरण जादुई, मदहोश लगता है। कितना भी गंवार, बेरुखा इन्सान हो वह इस प्रकृति के अनोेखे वातावरण में रंग ही जाएगा। बारहों महीने यहां पर ठंडी बयार चलती है इसलिए मेघालय को पूर्व का स्कॉटलंड कहा जाता है। इन पर्वत शृंखला से सफेद झरने, प्रपात बहते हैं। हरी भरी घाटियां देख कर लगता है कि धरती ने हरा वस्त्र धारण किया है।

तन-मन प्रफुल्लित होता है, बहुत सारे फोटो खींचने चाहिए ऐसा लगता है। शिलांग से ३५ किलोमीटर पर आरोवा केव्हजू है। ये गुफाएं सुंदर हैं। वन्यजीवों के अवशेष इन गुफाओं में देखे जा सकते हैं। वन्यजीवों की छाप (मुहर) पत्थरों पर पायी जाती हैं। चेरापूंजी की मौसमी केव्हज् यानी लाईमस्टोन की गुफाएं बेहतरीन हैं। हर चूने के पत्थर को प्राकृतिक रूप से विशिष्ट आकार प्राप्त है। उदारणार्थ गणेशमूर्ति का आकार, हाथी का पैर, बंदर का हाथी की सूंड का आकार, शंख का आकार प्राप्त है। विविध आकार वाले चूने के पत्थर इन मौसमी केव्हज में दिखाई पड़ते हैं। मेघालय के खासी हिल्स पर फैले घने जंगलों को धार्मिक महत्व प्राप्त है। मेघालय को ऑर्किड्स राज्य भी कहा जाता है। मेघालय के जंगलों में देवदार, फर्न, पाईन, बांबू पाए जाते हैं। ये जंगल दुनियाभर में विख्यात हैं। मेघालय के लोग आतिथ्यशील हैं। दाल चावल, मोभोज-फारसी की सब्जी जैसे विविध व्यंजन बनाए जाते हैं। खासी, जैंटिया व गारो जनजातियों में बुनाई करना, मिट्टी के विविध बर्तन बनाना, लकड़ी पर कारीगरी करना तथा उसकी अलग-अलग वस्तुएं बनाना इत्यादि काम किए जाते हैं। मेघालय राज्य का दर्शनीय स्थल शिलांग है। चेरापूंजी, मेघालय का प्राकृतिक वैभव यानी डबलरुट ब्रिज, सिंगल रुट ब्रिज, माडलॉग क्लीनेस्ट विलेज, डावकी रिवर, पारदर्शी पानी की नदी -हरा नीला पानी जिसकी पारदर्शिता के कारण बारह फुट गहरा तल दिखाई देता है, तथा सफेद लाल, हरे छोटे-छोटे पत्थर दिखते हैं। डावकी नदी का पानी बहुत मीठा है। इस नदी से आगे बांग्ला देश की सीमा है। शिलांग से मांफलांग का जंगल २४ कि.मी. पर है। स्थानीय लोग इस जंगल को पवित्र जंगल मानते हैं। मेघालय राज्य के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम है।

मेघालय से आगे तेजपुर मार्ग से हम अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करते हैं। यहां जाने के लिए इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है। यह परमिट (प्रवेशपत्र) हमें गुवाहाटी में अरुणाचल राज्य की कचहरी में मिलता है। भारत में कश्मीर को नंदनवन कहा जाता है। वैसा ही सुंदर अरुणाचल राज्य उत्तर-पूर्व की ओर बसा है। इस पदेश को देवों का प्रदेश भी कहा जाता है। इसकी प्राकृतिक सुंदरता की ओर पर्यटक आकर्षित होते हैं। कहीं पर घने जंगल तो कहीं तवांग जैसा बर्फिला प्रदेश। हिमालय अलग रूप में नजर आता है। उस प्रदेश से बहने वाली कामेंग नदी की कलकल आवाज के कारण प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लग जाते हैं। इस प्रदेश का हिमालय यानी भालुक पोंग-बोमडीला-दिरांग, सेला-तवांग-वाय-जंक्शन का सारा सफर रोमांचकारी है। दिरांग से आकाश को छूने वाले हिमशिखर देख कर आंखों में प्रसन्नता छा जाती है। पर्यटकों के लिए और भी आकर्षण का केंद्र हैं अरुणाचल प्रदेश की राजधानी का शहर इटानगर। चौदहवीं सदी में मायापुरी के हिंदू राजा रामचंद्र ने यह किला बनाया। यह ईटों का किला १० वर्ग किमी पर विस्तारित है। पूरा किला ईटों से बनाया गया है। यहां का गंगासागर लेक, नेहरू संग्रहालय, बौद्ध मॉनेस्ट्रीज और स्टेट म्यूजियम पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

अरुणाचल प्रदेश से वापस आकर हम असम के शिवसागर सिलीगुड़ी, दिसापुर मार्ग से एक और राज्य में प्रवेश करते है-वह राज्य है मणिपुर।
नदियों, सरोवरों, अनेकों जलप्रपातों से अत्यंत समृद्ध उपजाऊ भूमि वाले मणिपुर राज्य में घने जंगल तो हैं ही, साथ-साथ हमें यहां दुर्लभ प्राणी-पक्षी देखने को मिलते हैं। यहां के गावों का जनजीवन प्रकृति के साथ मिल कर धीमी गति से चलता है। राधा कृष्ण को विहार करने हेतु सुंदर भूमि चाहिए थी, साक्षात भगवान शिव ने शेष फन की नागमणि पर स्थित यह भूमि खास राधा कृष्ण के लिए निर्माण की, ऐसा संदर्भ पौराणिक कथाओं में मिलता है। मणिपुर नाम इसी वजह से पड़ा है। इस भूमि को ‘सना लैपा’ यानी सुवर्णभूमि भी कहा जाता है। शायद राधा कृष्ण की कथा के कारण ही इस राज्य की रासलीला नृत्य शैली विख्यात है। यहां का गोविन्दजी मंदिर अत्यंत पवित्र और प्रसन्न है। मणिपुर की राजधानी इंफाल है। नेहरूजी ने इस भूमि को रत्नभूमि कहा है। मणिपुर-इंफाल का इमा बाजार देखने लायक है। यह बाजार महिलाएं ही चलाती हैं। यहां का इस्कॉन कृष्ण मंदिर भी दर्शनीय है। इंफाल से ८० कि.मी. की दूरी पर बसा है मोग्यांग गांव, जहां नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने ब्रिटिशों के काल में पहली बार तिरंगा फहराया था। यहां पर उनका स्मारक और म्यूजियम है। यहां से नजदीक मणिपुर का लोकताक सरोवर है। यह अति सुंदर है। भारत के उत्तर पूर्व के ये राज्य शौकीन पर्यटकों को अपनी ओर बस आकर्षित करते हैं।

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