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आज सिया की विदाई थी, अपने माता पिता से दूर इन पहाड़ी घुमाउदार सड़कों से गुज़रते हुए बहुत सी बातें सोच रही थी। थोड़ा दुख था मन् में क्योंकि माँ पिताजी का साथ अब हर क्षण नहीं होगा , लेकिन एक अनोखी मुस्कुराहट बार बार अधरों पर बिखर जाती – कारण – ‘उत्तम’। बार-बार टैक्सी के शीशे में उनकी वही प्यारी सी सूरत दिख ही जाती थी। सिया के लिए कोई भी सफ़र आज तक इतना लुभावना नही था।

टैक्सी के चारों ओर चिपके उन रंगबिरंगे काग़ज़ों पे लिखा -“सिया संग उत्तम” पढ़कर ऐसा लग रहा था जैसे अपने नाम के साथ कुछ ईश्वर से जोड़ लिया है मैंने। साथ-साथ उन पहाड़ी रास्तों पे सफ़र करते हुए आख़िर दोनों अपनी मंज़िल तक पहुँच ही गए।

ढोल, बाजे, खूब सारे बाराती और प्रसिद्ध पहाड़ी छोलयारों के साथ उत्तम सिया घर ले आये थे। सिया ने जब उस घर की दहलीज़ पर भीतर जाने के लिए, अपना दाहिना पैर आगे बढ़ाया तो जाने क्यों उसकी आँखें नम हो आईं। उस घर को देखते ही,    बहुत कुछ एक पल में ही उसकी नज़रों में उतर आया। आखिर उसने उत्तम को वहां तब से देखा था जब वे दोनों छटी कक्षा में पढ़ते थे।

सिया उत्तम के घर बहुत आया करती थी, अपनी बुआ के साथ। उत्तम से बात नहीं होती थी, वो तो बस बुआ की साड़ी का पल्लू पकड़ के उनके बगल में ही सोफे पर बैठी रहती थी।  बुआ उत्तम की दादी से बातें करने में इतनी मसरूफ रहतीं थीं कि बीच में शायद सांसें भी एक आदा बार कम ही लेती होंगी। इसी बीच सिया की आंखें उस छोटे से तीन कमरों के पहाड़ी मकान को बड़ी बारीकी से देखती थीं। ये ही उसका समय बिताने का साधन होता था वहाँ।

सोफे पे बैठकर जब वो दाहिने हाथ की ओर देखती तो एक दरवाजे से अपनी स्टडी टेबल पे कुछ न कुछ लिखता पढ़ता उत्तम उसे दिख ही जाता था।

दादी के आर्डर और बुआ की डांट के प्रभाव से उस कमरे में एक बार जाने का अवसर सिया को प्राप्त हुआ।  हमेशा की तरह दोनों बातें कर रहीं थीं, और अचानक दादी को याद आया कि उत्तम के लिए दूध गरम करके गिलास में रखा था, अब रख दिया था लेकिन दिया ही नहीं था उसे, कहीं ठंडा न हो जाए ! उन्होंने रसोई से चौके पर बैठे-बैठे ही बुआ को ग्लास थमा कर कहा – “उत्तम को देना है”। बुआ ने रसोई की दहलीज़ के किनारे लगे सोफे पे बैठे-बैठे ही ग्लास मुझे थमा दिया, और कहा- “उत्तम को देना है”।

मैंने मना कर दिया, आखिर मैं नवीं की छात्रा थी, बड़ी हो चुकी थी, ऐसे कैसे किसी भी लड़के के कमरे में चली जाऊं। पिछले चार वर्षोँ से इस घर में आती थी लेकिन कभी उस कमरे में नहीं गई। चरित्र भी कोई चीज़ होती है।  लेकिन मेरे मन में उमड़ रही बातें भला ज़ुबां पे आ सकती थीं क्या ? मैंने तो बस सर हिलाकर मना किया था।। दोनों ने मिलकर मुझे क्यों इतना डाँठा, सच अभी तक समझ नहीं आया । लेकिन उस समय इतना ज़रूर समझ आया कि मैं  नवीं कक्षा में थी ज़रूर लेकिन अभी बच्ची ही थी।

दूध लेकर अंदर गई तो मुझे देखते ही उत्तम ऐसे सिर नीचे करके बैठ गए जैसे क्लास टीचर दूध का गिलास देने आई हो। उस समय तो बहुत हंसी आई मुझे, सोचा इस बुधु के कमरे में आने से सकुचा रही थी मैं? मगर आज सोचती हूँ, की वाक़ई उत्तम तब से ही बहुत सरल थे। सीधे सच्चे।

जब दहलीज़ तक पहुंची थी तो उन्हें अपने स्टडी टेबल पर ऐसे बैठे पाया जैसे कोई महाबली शाशक अपने सिंहासन पर बैठा अपने राज्य और परिवार पर न्यौछावर होने की योजना बना रहा हो। जैसे लिख रहा हो,  ये दीवारें, ये फर्श, ये खिडकियों के कुंडे भी मेरी निगरानी में हैं। ज़रा संभल कर प्रवेश करना तुम जो भी हो। और जैसे ही दरवाज़े पे उनकी नजर पड़ी, या शायद सीधे मुझपर, तो फिर वही किसी बालक की सी मासूमियत लिए चुप से नज़रें झुका लीं।

सिया जानती थी कि उत्तम के लिये उस घर का क्या महत्व था। उस घर पे जान देते थे उत्तम। रंग रोगन भी पिछले माह स्वयं किया था उन्होंने। सहेजना, सजाना, संजोना इसी घर के लिए, इसी घर के लोगों के लिए था। छोटा सा, तीन कमरों का पहाड़ी मकान, मैं क्या जानती थी, कि यही मकान मेरी गृहस्थी का वाहक होगा। मेरे वैवाहिक जीवन का प्रथम साथी। और वो बाहर से जो केवल दरवाज़े से झांक के देखा करती थी , वही कमरा मेरे सपनों का आशियां होगा।

अब मैं भी  इस घर का हिस्सा थी। उत्तम के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण- सोच के ही जी भर आया।

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