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पर्यावरण, वन्य एवं अन्य प्राणियों की सेवा, सुरक्षा और चिकित्सा में अपना जीवन समर्पित करने वाले तथा जानवरों की संवेदना, पीड़ा व प्रेम की मूक भाषा समझने वाले  पशुप्रेमी श्री गणेश नायक ने ‘हिंदी विवेक’ को दिए विशेष साक्षात्कार में इस विषय के महत्वपूर्ण मुद्दों को रेखांकित किया है। पेश है उनसे हुई विस्तृत बातचीत के प्रमुख अंश-

प कहते हैं कि आप जो भी करते हैं वह केवल पशुओं के लिए करते हैं। यह प्रेरणा आपको कब और कैसे मिली?

मेरे माता-पिता पशुपालन प्रेमी हैं। उनमें जानवरों के प्रति अधिक संवेदना है इसलिए उन्होंने अपने घर में ही कुत्ते, बिल्ली, गधे आदि पशुओ को पाल रखा था। बचपन से मैं उनके साथ ही पला- बड़ा हूं। जानवरों का निश्छल प्रेम, उनकी भावनाओं, उनके सुख-दुख और उनकी पीड़ा का मैं साक्षी रहा हूं। मानव कल्याण के लिए अनेक सामाजिक संगठन देश भर में कार्यरत हैं, किंतु जानवरों के कल्याण व उनकी सेवा के बारे में सोचने वाले अथवा कुछ करने वाले नगण्य हैं। बोलने वालों की तो सभी सुनते हैं किंतु मूक प्राणियों की दर्द भरी चीख-पुकार सुनने वाला कोई दिखाई नहीं देता। मैंने अपने माता-पिता के पशु प्रेम से प्रेरणा लेकर युवा अवस्था में ही यह तय कर लिया था कि जो भी करूंगा वह केवल जानवरों के लिए ही करूंगा। जंगल, जानवर, वृक्षारोपण और पर्यावरण के लिए कुछ करने का विचार बचपन से ही मेरे मन-मस्तिष्क में पैठ बना चुका था। यही विचार आज मेरा जुनून बन गया है।

वन्य जीवों के प्रति प्रेम की भावना अधिकतर लोगों में होती है किंतु उनके हित में कुछ करने की भावना कहीं दिखाई नहीं देती। आप जानवरों के लिए सेंटर चला रहे हैं, उनकी निःस्वार्थ सेवा कर रहे हैं। यह सब कैसे कर पा रहे हैं आप?

कभी-कभी हमारे जीवन में ऐसे हालात आते हैं जिसे देख कर हमारा दिल दहल जाता है और उस घटना का हमारे मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसे किसी सड़क पर दुर्घटना का शिकार हुए व्यक्ति को अस्पताल ले जाया जाता है; लेकिन यदि सड़क पर किसी जानवर की दुर्घटना हो जाए और वह घायल अवस्था में भले दर्द से कराहता रहे फिर भी कोई उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आता। ऐसा ही कुछ दृश्य देख कर और उसके बारे में सोच कर मेरे मन में जानवरों के लिए कुछ करने की इच्छा प्रबल हुई। जानवरों की संवेदना और उनके मूक प्रेम की भाषा को समझने के कारण मैं उनके लिए कुछ कर पा रहा हूं। इससे मुझे अपार आत्मिक सुख-शांति मिलती है।

जानवरों की सेवा हेतु क्या आपने आजीवन पूर्णकालीन समय देने का संकल्प लिया है?

मैंने जानवरों की आजीवन सेवा करने का संकल्प लिया है परंतु पूर्णकालीन समय देने का संकल्प नहीं किया है। मेरा भी परिवार है, परिवार के भरण-पोषण हेतु मैं काम करता हूं। मेरा एक छोटा सा व्यवसाय है, उसी के माध्यम से मैं अपने परिवार का पालन पोषण करता हूं। काम करने के बाद जो समय मिलता है वह जानवरों के लिए मैंने समर्पित किया है।

प्राणियों के प्रति भारतीयों का क्या दृष्टिकोण है?

भारतीयों का दृष्टिकोण प्राणियों के प्रति सदा से ही सुखद, आनंददायक एवं सकारात्मक रहा है। हमारे अधिकतर देवी – देवताओं के वाहन पशु-पक्षी हैं। भारतीय दर्शन शास्त्र में पंच महाभूतों से बने सभी प्रणियों एवं प्रकृति को उचित स्थान प्राप्त है। इसलिए भारतीय जनमानस में आज भी सभी प्राणियों के प्रति श्रध्दा का भाव है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जिस देश में भगवान के साथ अनेक प्राणियों की पूजा होती हो, उसी देश में प्राणियों के साथ भेदभाव, हिंसा और उनकी हत्या की जाती है। जानवरों को बचाने एवं उसकी सहायता करने के बजाए लोग उसे नजरअंदाज करते हैं।

जानवरों के साथ भेदभाव क्यों होता है?

जानवरों के निवास स्थान जंगल को तबाह कर कंक्रीट का जंगल आधुनिक युग में विकसित किया गया है और निरंतर किया जा रहा है। मनुष्य के स्वार्थ एवं लालच के कारण जानवरों के साथ अन्याय व भेदभाव होता है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप हिंस्र पशु मानव बस्ती में आते हैं और उनका शिकार कर एक संदेश देते हैं कि हमारे घर (जंगल) में घुसपैठ मत करो। महाराष्ट्र में अवनी शेरनी का मामला उदाहरणीय है, जिसने दर्जनों लोगों को मार डाला था।

जानवरों की रक्षा हेतु आपने किस तरह परियोजना की शुरूआत की और इस दौरान कौन सी मुश्किलों का आपको सामना करना पड़ा?

परियोजना की शुरुआत करने के पूर्व बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब हम सहयोग के लिए लोगों के पास जाते थे तो कई लोगों ने नकारात्मक व निराशाजनक टिप्पणी की कि इंसानों के रहने-खाने एवं जीने में इतनी दिक्कतें हैं और आप जानवरों की बात करते हैं! फिर भी हम हताशा की बातों को दरकिनार कर अपने लक्ष्य को लेकर काम करते रहे। 100 दरवाजों पर जाने के बाद 10 दरवाजे ऐसे थे जिन्होंने हमें सहायता की। उनमें रतन टाटा भी शामिल हैं। उन्होंने हमारे कार्य को सराहा और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इसके बाद मेरी पूज्य माता जी की सहमति से हमने वर्ष 2010 में ए.एम.टी.एम. रिहैबिलिटेशन सेंटर नामक ट्रस्ट की स्थापना की और लायसेंस लेकर परियोजना की शुरूआत की। हमारे क्षेत्र के लोग इस परियोजना को देखने बेहद कम संख्या में आते थे। जब विदेशी लोग अधिक आने लगे तब सभी हमारे कार्यों की सराहना करने लगे।

परियोजना के अंतर्गत आप जानवरों के हित में किस तरह का सेवा कार्य कर रहे हैं?

उपनगर मालाड में चलाई जा रही इस परियोजना में सर्वप्रथम हम जानवरों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने हेतु उनकी नसबंदी करते हैं। इसके बाद वर्ष में एक बार उन्हें वैक्सिन लगवाते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य उत्तम रहता है और वे बीमारियों से बचते हैं। सड़क पर घूमते आवारा कुत्तों को हम पाल कर उन्हें प्रशिक्षित करते हैं और किसी घर में दत्तक के रूप में देते हैं।

इसके अलावा जानवरों के प्रति संवेदनशीलता एवं जागरूकता लाने के लिए हम मनपा स्कूलों, निजी स्कूलों एवं अन्य नेशनल-इंटरनेशनल स्कूलों में जाते हैं और उन्हें जानवरों का महत्व बताते हैं। ताकि आने वाली पीढ़ी जानवरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझें और उन्हें उचित सम्मान दें। अब तक हमने 8 वर्षों के दौरान लगभग 18 हजार जानवरों का इलाज किया है। जैसे इंसान अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रसित होता है उसी तरह जानवरों को भी विभिन्न प्रकार की बीमारियां होती हैं। उन बीमारियो से मुक्ति प्रदान करने के लिए हम उनका इलाज करते हैं। हमारे पास सभी प्रकार के जानवर लाए जाते हैं। विभिन्न जानवरों के ऑपरेशन भी किए जाते हैं। बूढ़े हो चुके जानवरों को लोग छोड़ देते हैं, ऐसे जानवरों को हम अपने सेंटर में लाकर उनकी देखभाल करते हैं।

आपके इस कार्य से फिल्मी जगत के अनेक सितारे और नामी-गिनामी हस्तियां जुड़ी हुई हैं, वे किस तरह से आपकी सहायता करते हैं?

फिल्मी दुनिया से अमिताभ बच्चन, टायगर श्राफ, कपिल शर्मा, रेखा जी, ओमंग कुमार और उनकी पत्नी वनिता आदि अनेक लोग सहयोगी के रूप में जुड़े हुए हैं। इस वर्ष श्री ओमंग कुमार जी ने 12 ऐसी पेंटिंग बनाईं, जिनमें जानवरों को हमने किस तरह बचाया यह दिखाया गया था और प्रदशर्नी लगा कर 12 पेंटिग को 12 लाख में बेचा तथा वह पैसा हमें आर्थिक सहयोग के रूप में प्रदान किया। इसके अलावा हमारे सभी कार्यक्रमों की जानकारी उक्त सभी कलाकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां अपने-अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर करते हैं और इस ट्रस्ट से जुड़ने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं। टाटा ग्रुप के रतन टाटा का मैं विशेष आभार मानता हूं और उनका अभिनंदन करता हूं क्योंकि उन्होंने हमें सब से अधिक सहायता प्रदान की। उनके विचारों से मैं बेहद प्रेरित हुआ हूं। उनका कहना है कि मानवता की रक्षा करना जितना जरूरी है उतना ही पर्यावरण, जंगल एवं जानवरों की रक्षा करना भी जरूरी है। तभी प्रकृति का संतुलन बना रहेगा।

‘एनिमल थेरेपी’ क्या है और इसका लाभ क्या है?

विदेशों में एनिमल थेरेपी बेहद लोकप्रिय है। भारत में इसका प्रचार-प्रसार न होने से अधिकतर लोग इसके लाभ से अनभिज्ञ हैं। हॉस्पिटल में मरणासन्न अवस्था में पहुंचे हुए मरीजों को भी एनिमल थेरेपी दी जाती है। उनके सामने कुत्ता एवं बिल्ली को ले जाया जाता है। कुछ समय कुत्तों-बिल्लियों के साथ बिताने से मरीजों का मन प्रसन्न हो जाता है। जब वे इनके साथ खेलते हैं, मस्ती करते हैं तब उन्हें अपने दुख-दर्द का भान भी नहीं रहता और सुखद आनंद का अनुभव करते हैं। हम भी कुछ कंपनियों एवं हॉस्पिटल में अपने 3-4 कुत्तों को ले जाते हैं। लंच के समय तब सभी लोग भोजन के उपरांत कुत्तों के साथ समय बिताना बेहद पसंद करते हैं। कोई कुत्तों के सिर पर हाथ फेरता है, कोई पैरों को सहलाता है, कोई छेड़खानी-मस्ती करता है, कुत्तों के साथ खेलने में सभी को बहुत मजा आता है। इस तरह से वे अपने काम के बोझ को हल्का करते हैं। कुछ ही समय में उनका टेंशन, डिप्रेशन, निराशा एवं उदासी दूर हो जाती है और वे फिर से नई ऊर्जा के साथ अपने काम में लग जाते हैं। तनावमुक्त जीवन जीने के लिए एनिमल थेरेपी या जानवरों के साथ वक्त गुजारना सब से बेहतर उपाय है।

कुछ वर्ष पूर्व मुंबई में सड़कों पर हाथियों को घुमा कर महावत उनसे भीख मंगवाते थे, जिससे हाथियों को बड़ी पीड़ा होती थी। इस पर आपने कैसे प्रतिबंध लगवाया?

हाथी को हमने मुंबई की सड़कों पर घूमते हुए कई बार देखा है किंतु किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि मुंबई की सड़कें चिलचिलाती धूप में कितनी गर्म तपन भरी होती है। एक दिन सूचना मिली कि मुलुंड में एक हथिनी गिर गई और उसे उठाने के लिए महावत ने उसे मारना शुरू किया लेकिन वह उठ नहीं पाई। श्री गणेश भगवान का गजमुख होने के कारण हाथी को लोग आस्था की नजर से देखते हैं। उस हथिनी को रोज लगभग 100 वडा पाव तथा अन्य खाद्य पदार्थ लोग खिलाते थे, जिससे उसका वजन 3 टन से बढ़ कर साढ़े पांच टन हो गया। वह अपने बढ़े हुए वजन के कारण अधिक चल नहीं पाई और गिर पड़ी। परिणाम स्वरूप 19 दिनों के बाद उसका देहांत हो गया। इस दौरान जब हम हथिनी का इलाज करने के लिए डॉक्टर को ढूंढ़ने लगे तब पता चला कि महाराष्ट्र सहित गुजरात और गोवा में हाथियों का कोई डॉक्टर ही नहीं है और हाथियों का इलाज केवल घरेलू नुस्खों द्वारा किया जाता है। तब हमने पश्चिम बंगाल से डॉक्टर को बुलवाया और बैंकाक के डॉक्टर से संपर्क किया और हथिनी को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर आवाहन किया, तब उस पर अमिताभ बच्चन जी ने ट्वीट किया कि भाई हाथी को बचाना है तो इस संस्था को मदद करो। तब कहीं जाकर लोग आगे आए। इसी समय प्राणियों के अधिकारों और उसे बचाने के लिए काम करने वाली संस्था ‘पेटा’ आगे आई। उन्होंने एक याचिका दायर की जिसमें हमने भी सहयोग किया। उसके फलस्वरूप मुंबई मनपा क्षेत्र में हाथियों से भीख मंगवाने पर प्रतिबंध लग गया। इसी तरह का प्रतिबंध देश के हर हिस्से में लगना चाहिए। उसके लिए हम प्रयासरत हैं।

रायगढ़ जिले के कोलाड़ में आप एक नई परियोजना शुरू करने की तैयारियों में लगे हुए हैं। इसकी क्या परिकल्पना है?

सभी प्रकार के जानवरों का इलाज करने तथा उनके रहने खाने की पर्याप्त व्यवस्था करने के लिए बड़ी जगह की आवश्यकता होती है। मुंबई में जगह नहीं मिलने के कारण हमने कोलाड़ क्षेत्र को चुना है। लगभग 17 एकड़ से लेकर 50 एकड़ तक की भूमि पर यह परियोजना लगाने की योजना बनाई गई है। इस परियोजना को अमलीजामा पहनाने के लिए हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। उक्त परियोजना के अंतर्गत विभिन्न प्राणियों की सेवा चिकित्सा की जाएगी। हमने एक पायलट प्रोजेक्ट बनाया है, जो पूरे देश के लिए रोल मॉडल बनेगा, ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है।

वेस्ट वाइल्ड लाइफ पर आप काम करने के इच्छुक हैं, इस विषय पर क्या आपको सरकार से सहयोग की अपेक्षा है?

जी हां, सरकार से सहयोग की अपेक्षा है क्योंकि इतने बड़े काम को सरकारी सहयोग के बिना करना बेहद मुश्किल है। यदि सरकार का साथ मिले तो मैं बहुत कुछ कर सकता हूं। इस काम को उचित सम्मान एवं प्रतिष्ठा सरकार के द्वारा ही मिल सकती है।

विभिन्न प्राणियों के इलाज हेतु क्या आपके हॉस्पिटल में मल्टी स्पेशलिटी सुविधाएं मौजूद हैं?

हां, बिल्कुल। प्राणियों के हर मर्ज के अनुसार विश्वस्तरीय मल्टी स्पेशलिटी सुविधाएं हमारे हॉस्पिटल में मौजूद हैं। हॉस्पिटल में आधुनिक उपकरण ही केवल 2 करोड़ रूपये के लगभग के हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस स्तर की सुविधाएं मिलती होंगी। हम सभी तरह के प्राणियों का इलाज बिल्कुल मुफ्त में करते हैं।

हिंस्र पशु जंगल से बाहर निकल कर ग्रामों व शहरों की ओर आ रहे हैं और मानव का शिकार कर रहे हैं। इस पर आपका क्या मत है?

मैंने पहले ही कहा कि मानव आज विकास के नाम पर जंगलों को नष्ट करता जा रहा है और जंगलों में अतिक्रमण कर वहां का वातावरण खराब कर रहा है। पहले की तुलना में जंगल सीमित होते जा रहे हैं। वृक्षों की कटाई और जानवरों को मार कर उनकी हड्डियों, दांतों, चमड़ों आदि की तस्करी वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से की जाती है। जिससे प्रकृति के नियमों का उल्लघंन हो रहा है। जंगलों का संवर्धन करने से जंगली प्राणी भोजन की तलाश में बाहर शहरों की तरफ नहीं जाएंगे।

वन्य प्राणियों के प्रति सामाजिक नजरिया बदलने का प्रयास आप कई वर्षों से कर रहे हैं, इसमें आपको कितनी सफलता मिली है?

हम किसी को कुछ करने का उपदेश नहीं देते हैं, बल्कि अपने आचार-विचार और कार्यों से सभी के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। जिससे लोग बेहद प्रभावित हो रहे हैं। यही हमारी सब से बड़ी ताकत है। पशु प्रेमी लोग लगातार हमसे जुड़ते जा रहे हैं और इस कार्य में हमें सहयोग कर रहे हैं। हमारे कार्यों की लोग दिल से सराहना करते हैं, तब हमें एहसास होता है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। लोगों से मिल रहे अपार जनसर्मथन एवं प्रोत्साहन से हम निश्चित रूप से यह कह सकते हैं कि हमें सफलता मिली है। हम हर चुनौतियों का सामना करते हुए उनमें से राह निकाल रहे हैं, इसलिए हम सफल भी हो रहे हैं।

आप जिस तरह की परियोजना चला रहे हैं, उसमें बड़ी मात्रा में धन की भी आवश्यकता होती है। इस सब का प्रबंध आप कैसे करते हैं?

हम अपने कार्य एवं योजना और विस्तार के लिए लोगों से मिलते जुलते रहते हैं। इस विषय में चर्चा करते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान जो भी पशु प्रेमी होते हैं या हमारे विषय वस्तु से सहमत होते हैं, वही लोग हमें आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। उसी आधार पर हम अपने कार्य का विस्तार करते हैं। हमें सहयोग देने वालों में रतन टाटा, अमिताभ बच्चन आदि दिग्गज हस्तियां भी शामिल हैं और ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी शादियों में मिले लिफाफे भी हमें दान स्वरूप दिए हैं।

आपको कौन-कौन से पुरस्कार मिले हैं?

मुझे समाज से बेतहाशा प्यार और सम्मान मिला है। मैं अपने कार्यों से संतुष्ट हूं और मुझे रात में बेहद अच्छी नींद आती है। मुझे पुरस्कारों की दौड़ में नहीं जाना है। मुझे अपने काम का दिखावा करना अच्छा नहीं लगता बल्कि केवल काम करना अच्छा लगता है। जो लोग जानवरों को अपने घर में रखना पसंद नहीं करते थे ऐसे लोग मुझ से प्रभावित होकर अपने-अपने घरों में अब पशुओं को पाल रहे हैं। मेरी सोच से जुड़ने वालों को ही मैं अपना सच्चा पुरस्कार मानता हूं। वैसे अमिताभ बच्चन जी ने मुझे वर्ष 2014 में ‘बेस्ट एनजीओ’ पुरस्कार देकर सम्मानित किया था।

जानवरों के बीच आपने काफी समय बिताया है, इस दौरान घटे कुछ ऐसे प्रसंग बताइए जिन्होंने आपको बेहद भावुक कर दिया हो?

बिजली नामक हथिनी गिर पड़ी थी और 19 दिनों के बाद उसने देह त्याग दिया। मैं उसे बचा नहीं पाया जिसका मुझे आज भी अफसोस है किंतु 19 दिन मैंने उसके साथ बिताया वह समय मेरे जिंदगी का सब से भावनात्मक समय था। बिजली हथिनी की एक बेटी थी जिसका नाम लक्ष्मी था। उस दौरान मां-बेटी का मैंने जो प्यार-दुलार और उनकी आत्मीयता देखी, उसे मैं कभी भुला नहीं पाऊंगा। वह मेरे लिए सदैव स्मरणीय रहेगा। इस नजारे को देख कर मैं सब से अधिक भावुक हो गया। आश्चर्य की बात यह है कि एक हथिनी (जानवर) को बचाने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियां एकजुट हो गईं और उन्होंने बिना अपनी-अपनी राजनीति किए सच्चे दिल से अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इससे स्पष्ट होता है कि मानव को एकजुट रखने में जानवर भी अहम् भूमिका निभा सकते हैं।

पर्यावरण की रक्षा हेतु आपने कितने वृक्षारोपण किए हैं?

पर्यावरण की रक्षा हेतु और आने वाले पीढ़ी को स्वच्छ प्राणवायु मिले इसके लिए 13,000 पौधों का रोपण किया। उनमें से 4 हजार पौधे नहीं जी पाए, पर 9 हजार वृक्ष तन कर खड़े हैं, जो सैकड़ों साल तक आने वाली पीढ़ी को प्राणवायु प्रदान करते रहेंगे।

आप जानवरों के देहांत के उपरांत उनका अंतिम संस्कार करना चाहते हैं, उसके पीछे आपके क्या विचार हैं?

जो भी व्यक्ति जानवरों को पालते हैं वे उनसे पुत्रवत व्यवहार करते हैं, या जो संतान से वंचित हैं ऐसे लोग कुत्तों को पालते हैं और उसका नामकरण करके उसे ही अपना पुत्र मानने लगते हैं। जब उन जानवरों का देहांत होता है तब उन्हें बड़ी पीड़ा होती है। वे अपना दुख-दर्द किसी को बता नहीं सकते। पुत्रवत मानने के कारण वे उनका अंतिम संस्कार कर उसे सम्मान देना चाहते हैं। जैसे भगवान श्रीराम ने जटायु नामक एक गिद्ध का मरणोपरांत अंतिम संस्कार किया था। इस मामले में मेरे मन में एक आइडिया आई। मैंने इसे पर्यावरण से जोड़ दिया। मेरा ऐसा प्रस्ताव है कि जिस किसी प्राणी का अंतिम संस्कार करना है उसे हमारे पास ले आए। हम उसे भूमि में दफन करेंगे और उस पर पौधा रोपण करेंगे। इस वृक्ष को हम आपके दिवंगत प्राणी का ही नाम देंगे। जिससे यह स्थान स्मरणीय हो जाएगा। और जब भी आपको याद आए, तब इस स्थान पर आकर अपनी यदि ताजा कर सकते हैं।

‘हिंदी विवेक’ के लाखो पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

‘हिंदी विवेक’ के सुधी पाठकों को मैं यही संदेश देना चाहूंगा कि जिस तरह हम अपना और अपने परिवार का ध्यान रखते हैं उसी तरह हमें अपने आस-पास रहने वाले अन्य प्राणियों का भी ध्यान रखना चाहिए और उसके साथ ही पयार्र्वरण को बचाने के लिए वृक्षारोपण अधिक संख्या में करना चाहिए। युवा शक्ति से मैं आग्रह करता हूं कि जल, जंगल, जमीन, वन्य प्राणी, पर्यावरण को बचाने के लिए आगे आए और अपना अमूल्य योगदान दें।

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