हिंदी विवेक : we work for better world...

समस्त महाजन संस्था गांवों में स्वावलंबन लाने की दिशा में कार्य कर देश की प्रगति में अपना बहुमूल्य योगदान देने की इच्छा रखती है। स्वयंसेवी संगठनों के माध्यम से यह कार्य सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

देश का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अथवा व्यवसायिक विश्लेषण करते समय बहुधा एक बात पर विशेष जोर दिया जाता है कि, ‘हमारा देश एक कृषि प्रधान और गांवों का देश हैं‘ परन्तु आजादी के बाद से ही देश की सरकारों ने कृषि व गांव को हमेशा ही दोयम दर्जे की मान्यता दे रखी है। गरीबी दूर करने की कोशिश में लगातार औद्योगीकरण और शहरीकरण के विस्तार पर ही ज्यादा ध्यान दिया दिया गया। नतीजा बिलकुल साफ है। आज देश का बहुतायत हिस्सा सूखे की चपेट में है।

उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश, बिहार हो या उड़ीसा, अनियमित वर्षा और जल संसाधनों की कमी से पूरा देश जूझ रहा है लेकिन पिछले कई वर्षों से इस मामले में महाराष्ट्र की स्थिति काफी भयावह हो गई है। अगर हम देश की भौगोलिक रचना पर ध्यान दें तो जहां उत्तर प्रदेश में कायदे की बारिश होती है, खेती भी वर्षानुकूल होती है पर स्थिति भयावह है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीचो बीच स्थित बुंदेलखंड में हर दूसरे साल सूखा पड़ रहा है। विदर्भ, मराठवाड़ा समेत तमाम क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं ।

कारण साफ है। एक तरफ जहां यूपी में जल संयोजन के तमाम साधन, मसलन तालाब, कुएं पट गए और लोग पूरी तरह से भूमिगत जल पर आश्रित हो गए। वहीं महाराष्ट्र में औद्योगिक खेती और जल संसाधनों का खत्म हो जाना प्रमुख कारण रहा। कमोबेश यही स्थिति देश के अन्य हिस्सों की भी रही। लेकिन पिछली सभी सरकारों ने इस समस्या का कोई ठोस उपचार खोजने की कोशिश नहीं की। ऐसे समय में देश भर के किसानों की पानी की समस्या का स्थाई हल खोजने की दिशा में एक संस्था आगे आई जिसका नाम है, समस्त महाजन संस्था।

संस्था ने गांवों की जल समस्या लंबे समय तक हल करने की दृष्टि सेे विचार किया। पानी की स्थायी व्यवस्था के लिए शिरूर, पाटोदा जैसे ५ सूखाग्रस्त गांवों में तालाब खुदवाने का काम प्रारंभ किया। लोगों के पास काम भी नहीं था। अकाल की इस समस्या के निवारण के लिए लोगों को साथ लेकर उन्हें मजदूरी का काम भी दिया ताकि बेरोजगारी की समस्या भी हल हो। गांव का तालाब होने की वजह से गांव के लोग ही काम करने लगे। उन्हें प्रतिदिन की २५० रुपए मजदूरी मिलने लगी। पहले दिन का अनुभव लेकर गांव के आसपास के लगभग १०० लोग इस कार्य से जुड़ गए। संस्था ने पहले दिन २५० रुपये मजदूरी दी। दूसरे दिन २५० रुपये का चारा दिया। तीसरे दिन २५० का अनाज दिया। आगे जब तक उन गांवों में तालाब खुदाई का काम चलता रहा संस्था ने स्थानीय गांव वालों की सहभागिता से ही संपूर्ण कार्य किया।

हर गांव में खर्च की सीमा १० लाख रुपए निर्धारित की गई थी। ४० दिन में तालाब खुदाई का काम पूरा करना था। लोग स्वाभिमान से जुड़ गए । लोगों के अंदर यह भावना जागृत हुई कि हम अपने गांव के तालाब की खुदाई कर रहे हैं। धीरे-धीरे १२५ गांवों में तालाब खुदाई का कार्य पूरा कर लिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बारिश में तालाब लबालब भर गए। पानी का रिसाव जमीन में होने के कारण गांव के कुएं पानी से पूरी तरह भर गए। सातारा जिले के शिरूर-पाटोड़ा परिसर में १२५ गांवों में समस्त महाजन ने खुशहाली लाने का काम किया है। यह प्रोजेक्ट पूरा होने पर समाज में एक जागृति आ गई।

२०१६ में मराठवाड़ा परिसर एक बार फिर भीषण अकाल की चपेट में आ गया। संस्था के अध्यक्ष गिरीश भाई शाह और उनके शुभचिंतकों ने एक बार फिर अपनी कमर कसी पर इस बार अल्पकालिक नहीं बल्कि निरंतर १० साल तक चलने वाला और सूखे की समस्या से पूरी तरह निपटने की दिशा में कार्य शुरू कर दिया। सभी लोगों ने मानसिक तैयारी की। १० जेसीबी खरीदे। उन जेसीबी से काम शुरू किया। साथ में ४७ पोकलेन किराए से लिए और काम प्रारंभ किया। निरंतर ४६ गांवों में ४० दिन तक अनवरत तालाब खुदाई का काम किया गया। परिणाम यह आ गया कि सारे तालाब लबालब हो गए। खेती अच्छी हुई। आज उन गावों के किसान अपनी उपज से प्रति एकड़ ३०,००० रूपये मुनाफा ले रहे हैं। जहां-जहां अच्छी बारिश अच्छी हुई वहां सोयाबीन, गन्ना की भरपूर उपज हो रही है। उन गावों के किसानों ने २०१६ में लगभग ३० करोड़ कमाए जबकि समस्त महाजन संस्था द्वारा उस हिस्से के विकास के लिए ३२ लाख खर्च किया गया। ३२ लाख के सामने ३० करोड़ का सालाना फायदा बहुत बड़ा है। यह संस्था के कार्य की अति प्रशंसनीय उपलब्धि है।

अब संस्था गांवों में स्वावलंबन लाने की दिशा में कार्य कर देश की प्रगति में अपना बहुमूल्य योगदान देने की इच्छा रखती है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत देश के ग्राम्य विकास के लिए ५५ हजार करोड़ रुपये लगाने वाले हैं। ५५ हजार करोड़ में ६ लाख गांव समृद्ध नहीं होंगे तथा सभी गांवों तक पहुंचने की व्यवस्था भी सरकार के पास नहीं है। पर स्वयंसेवी संगठनों (छॠज)के माधयम से यह कार्य सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

समस्त महाजन की योजना यह है कि यदि संस्था को सरकार का सहयोग मिलता है तो वे १००० पोकलेन खरीदेंगे जिसकी कीमत लगभग ५०० करोड़रुपए होंगे। एक जिले में लगभग १००० तक गांव होते हैं, एक गांव का काम करने में २० से २५ दिन लगते हैं। १००० पोकलेन एक साथ १००० गावों का काम करेंगे तो एक महीने में पूरे जिले के ज्यादातर गांवों का काम हो जाएगा। जिसमें तालाब, नाले, कुएं खोदे जाएंगे या साफ किए जाएंगे। संस्था द्वारा खरीदी मशीनों के लिए ग्राम पंचायत से डीजल और ड्राइवर की सहायता ली जाएगी ताकि संस्था पर कम बोझ पड़े और ग्राम सभा में उस विकास कार्य के प्रति लगाव भी पैदा किया जा सके। संस्था ने इस दिशा में पहल करते हुए राज्य के मुखिया देवेंद्र फडणवीस से बात की और उनकी तरफ से आश्वासन मिला है कि जल्द ही सरकार इसपर कोई फैसला लेगी और उन्हें भरपूर सहायता दी जाएगी। कुछ ऐसी ही बात उत्तर प्रदेश के मुखिया आदित्यनाथ योगी जी ने भी कही है। नई और साफ-सुथरी सरकार के आने के बाद अब वहां के लोगों मे भी एक जल संयोजन के प्रति एक आस जगी है जो कि वर्तमान प्रदेश सरकार और ‘समस्त महाजन संस्था‘ के माध्यम से फलीभूत होगी।

आपकी प्रतिक्रिया...

Close Menu